Test Examine

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारणों  का परीक्षण करते हुए यह स्पष्ट कीजिए कि, इस क्रान्ति के लिए लुई 16वाँ कहाँ तक उत्तरदायी था?

1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति के कारण

1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति एक ऐसी क्रान्ति थी जिसने आधुनिक विश्व के लोगों के प्राचीन व्यवस्था को बदलने के लिए प्रोत्साहित किया। इस क्रान्ति के माध्यम से स्वतंत्रता समानता एवं भाईचारे की भावना का नारा दिया गया। इसी क्रान्ति के फलस्वरूप राष्ट्रवाद, लोकतंत्रवाद और समाजवाद जैसी नवीन शक्तियों के अभ्युदय पर बल मिला। आधुनिक सैन्यवाद और तानाशाही भी इसी क्रान्ति का परिणाम थी। इस क्रान्ति के द्वारा फ्रांस की शासन प्रणाली में आमूल-चूल प्रिवर्तन देखने को मिला। इस क्रान्ति का विश्व इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। 1789 की क्रान्ति के पीछे तत्तकालीन दार्शनिकों का महत्त्वपूर्ण योगदान था। यदि हम इस क्रान्ति के कारणों पर विचार करें तो प्रत्येक क्रान्ति की पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। बिना करण के क्रान्तियाँ नहीं होती। इतिहास इसका प्रत्यक्ष गवाह है। इस क्रान्ति के पीछे मूलतः तीन कारण उत्तरदायी थे। प्रथम राजनीति कारण द्वितीय सामाजिक कारण और तृतीय आर्थिक कारण। यहाँ पर तीनों कारणों का क्रमवत संक्षिप्त विवेचन कर रहे हैं जो अग्रलिखित है :

(अ) राजनीतिक कारण

फ्रांस की सरकार राजतंत्रात्मक थी। उसमें अत्यधिक केन्द्रीयकरण था। फ्रांस की प्रतिनिधि संस्थाएँ या तो लुप्त हो गयी थीं या राजा के अधिकार में आ गई थीं। अतः राजा निरंकुश शासक हो गया था। उसका काम आज्ञा देना और प्रजा का काम आज्ञा का पालन करना था। सरकार लुई 15वें के समय में दुराचारी एवं अत्याचारी थी। इससे असन्तोष का फैलना स्वाभाविक था। राजा लालची एवं दुराचारी दरबारियों के हाथ की कठपुतली था। ‘लेटर डी कचैट’ नामक वारन्ट के जारी कर देने से किसी भी व्यक्ति को बन्दी बनाया जा सकता था। फ्रांस के राज्य क्रान्ति के राजनीतिक कारण निम्नलिखित थे- 

1. लुई सोलहवें का योगदान- फ्रांस में क्रांति का विस्फोट लुई सोलहवें के शासन काल में हुआ। उसके शासनकाल के प्रारंभ से ही फ्रांस की व्यवस्था जर्जर हो चली थी। अपव्यय तथा अनेकानेक युद्धों के कारण राष्ट्रीय ऋण का भार बहुत अधिक बढ़ गया था। बजट में प्रतिवर्ष घाटा हो रहा था और यह घाटा ऋण लेकर पूरा किया जा रहा था। अपव्यय की मात्रा बहुत अधिक बढ़ गई थी। राजकोष में आते ही रुपया बेढंगे तरीके से खर्च कर दिया जाता था। आय भी दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही थी। लुई सोलहवें को इस दुर्दशा का कुछ आभास मिल गया था। उसको समझ में नहीं आ रहा था कि राज्य की आय किस प्रकार बढ़ाई जाये जिससे घाटा पूरा होने लगे तथा ऋण न लेना पड़े। अतः उसने सिंहासन पर बैठते हीं अपने मंत्रिमण्डल में परिवर्तन करके योग्य व्यक्तियों को उसमें सम्मिलित किया। उसने आस्ट्रिया के पक्षपाती च्योजल, संसद विरोधी मशाल्ट तथा इसी प्रकार के कुछ अन्य मंत्रियों को मंत्रिपद से पृथक कर दिया और उसके स्थान पर मलेशर्स, बुर्गेन मोरेपस और तुर्जी आदि सुयोग्य लोगों को मंत्रिपद पर नियुक्त कर दिया। इन सब तक तुर्जों की नियुक्ति कर्को फ्रांसीसी समाज ने बहुत अधिक पसंद किया। लुई सोलहवें ने तुर्जों को वित्त का महानियन्ता नियुक्त किया। 

लुई सोलहवें जो 1774 ई० में अपने दादा लुई पन्द्रहवें के बाद फ्रांस का राजा बना था। उसने अपने चारित्रिक दोषों और भयंकर भूलों से फ्रांसीसी क्रान्ति को अवश्यम्भावी बना दिया था। आलोचकों का यह कथन कि अगर लुई दूरदर्शी, दृढ संकल्प वाला और चतुर सम्राट रहता तो यह क्रांति कुछ समय के लिए टाली जा सकती थी, बिल्कुल सत्य इतिहासकार डी टाकविले नेते तो क्रांति ते होने का सारा आरोप लुई सोलहवें पर ही लगाया है। अगर लुई के चारित्रिक दोषों को देखा जाये तो यह आरोप सही प्रतीत होता है।

लुई शराबी था, शिकारी था, शासन कला में बिल्कुल अनाड़ी था। उसने बीस वर्ष की उम्र में राजपद प्राप्त किया था। लेकिन उसे किसी प्रकार की की राजनीतिक शिक्षा नहीं मिली थी। इसलिये शासन के भार को देखकर वह घबड़ा उठता था। उसने स्वयं यह स्वीकार किया था- “ऐसा प्रतीत होता है कि सारा संसार मेरे ऊपर गिर रहा है। हे ईश्व! मेरा दायित्त्व इतना बड़ा है कि उन्होंने मुझे कुछ भी शिक्षा नहीं दी है।” यह सही है कि वह अपने उत्तरदायित्त्व को पहचानता था उसके हृदय मैं प्रजाहित की भावना थी और उसकी धारणायें यथार्थ थीं पर सफलता पाने के लिए जिन विशेषताओं की आवश्यक्ता थी वे उसमें नहीं थीं। उसने अपने ढंग से कभी भी काम नहीं किया। दरबारियों और रानी एन्वाएनेतु के दबाव में आकर ही वह गलत काम करने को विवश हो जाता था। वह बुद्धिमान पुरुषों की बात सुनने के लिए सदा ही तत्पर था पर अपनी चंचलता एवं ढुलमुल नीति के कारण उन परामर्शों के अनुसार कार्य नहीं कर पाता था। उसमें नेतृत्त्व का कोई भी गुण नहीं था। कहाँ खतरे की जंजीर लटकी हैं और उसे किस प्रकार दूर किया जाये वह यह नहीं जानता था। इस दुर्बल, ढुलमुल और डाँवाडोल नीति के चलते लुई सोलहवें को अपने प्राण तक गँवाने पड़े। लुई सोलहवें की अपनी रूपसी पत्नी एन्त्वाएनेत के सौन्दर्य-पाश में फंसकर अत्यन्त भोगी, विलासी बनने की प्रवृत्ति जिसके अंतर्गत उसने वन निर्माण कराये, टीलों में एकांत गुफायें बनवाई और उपवन में कामकुंज, मदन- मंदिरों का निर्माण कर उसने अपनी सेक्सजन्य कुंठाओं को ही जैसे सहलाया। उसकी पत्नी सदैव उसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाती रहती थी। वह अत्यधिक कामपिपासु थी तथा विलासप्रिय प्रसाधनों की खरीद में ही उसने करोड़ों रुपये खर्च कर डाले। फ्रांस की जनता ने ऐसी रानी को अस्वीकार कर दिया जिससे लुई सोलहवें की चतुर्दिक आलोचना होने लगी जो अंततः फ्रांसीसी क्रान्ति के रूप में जनता द्वारा विस्फोटित हुई।  

2. राजा की दानशीलता- राजा अनाप-शनाप खर्च करता था। नौकरियां एवं पेंशन भी मुक्त हस्त से दान देता था। लुई 16वें ने 15 वर्षों में लगभग 90 करोड़ डालर खर्च किये थे। राजदरबार में फलने-फूलने वालों के लिए वास्तव में वह स्वर्ण युग था।

3. दैवी- अधिकार सम्पन्न राजतन्त्र तथा या निरंकुशता – राजा का यह दावा था कि वह ईश्वर की इच्छा से प्रजा पर राज्य करता है और अपने कार्यों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी नहीं है। लुई 16वाँ कहा करता था, क्योंकि मैं चाहता हूँ इसलिए यह वैध है। अतः राजा स्वेच्छाचारी एवं निरंकुश था।

4. महलों की शान-शौकत एवं अपव्यय पेरिस से 12 मील दूर राजा का महल था। इसमें सैकड़ों करे, दालान, सत्कार गृह, अतिथि गृह आदि थे। इस प्रकार राजा के परिवार में 16 हजार नौकर थे, 2000 कृपापात्र कर्मचारी रहा करते थे जो दिन-रात रंग-रेलियों में अपना जीवन बिताते थे। अकेली रानी के 500 नौकर-चाकर थे। यह अंधाधुंध खर्च केवल 1789 में दो करोड़ डालर था। । यूरोप के लोग राज दरबार को राष्ट्र की कब्र कहते थे।” दूसरी ओर फ्रांस की जनता के पास पेट भरने के लिए भोजन भी भी नहीं था।

5. रानी का अपव्ययी होना-रानी बड़ी अपव्ययी थी। वह आस्ट्रेलिया की रानी गेरियो थैरोसा की पुत्री थी। वह राजनीतिक कार्यों में हस्तक्षेप करती और लुई की बुद्धि-भ्रष्ट रखती थी। रानी की नीति का यह फल राज्य परिवार वालों के लिए घातक सिद्ध हुआ तथा उसके रक्त से ही जनता की प्यास बुझी। रानी के व्यक्तिगत व्यय की कोई सीमा नहीं थी। उसके सैनिकों की संख्या भी असंख्य थी। उसका स्वभाव भी क्रूर था जिसके कारण उसको किसी भी मंत्री का सहयोग प्राप्त न हो सका था।

6. राज्य का दोषपूर्ण ढाँचा राज्य का शिखर जगमगाता एवं चकाचौंध करने वाला था। राज्य का ढांचा सड़ा गला था। राज्य की शासन-व्यवस्था पूर्णतः अव्यवस्थित थी। सरकारी ढांचे में कहीं कोई योजनाबद्ध व्यवस्था देखने को नहीं मिलती। कामों का बंटवारा भी ठीक नहीं था। अनेक काम ऐसे थे जिनका उत्तरदायित्त्व अनेक विभागों पर था। विभागों का संगठन पेचीदा था। राजा वर्सायी के राज-प्रासाद में रहकर मौज उड़ाता था। ।। इसलिए राज्य की ओर कम ध्यान ध्यान दे दे पाता था। 

7. नियमों में भेद- देश भर में अनेक नियम प्रचलित थे। कहीं कोई एक नियम न था। कर की दरें भी विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न थी। इसलिए व्यापार को बड़ी ठेस पहुँचती थी। हेजन ने लिखा है, “एक कस्बे में जो बात कानून की दृष्टि से सही मानी जाती थी वही बात उस स्थान से पाँच मील. से भी कम स्थित दूसरे कस्बे में नियम विरुद्ध और गैर-कानूनी समझी जाती थी। फ्रांस के विभिन्न भागों में लगभग चार सौ विभिन्न कानून प्रचलित थे।” नाप-तौल की प्रणाली भी एक-सी न थी।

8. स्थानीय संस्थाओं का पेरिस से नियंत्रण- फ्रांस में स्थानीय संस्थाओं का अभाव था राष्ट्रीय सरकार की भांति स्थानीय प्रशासन भी वर्सायी से ही नियन्त्रित होता था। यदि किसी गिरजाघर पर नई छत डालनी होती थी या किसी नदी पर नया पुल बनाना होता था तो उसका निर्णय भी पेरिस में ही होता था। इससे कार्यों में बह बहुत विलम्ब होता था। साधारण जनता परेशान थी। हेजन के अनुसार सारे राज्य में लालफीताशाही का बोलबाला था।

9. सेना में अव्यवस्था का बोल-बाला- अफसरों पर किये गये खर्च की मात्रा सैनिकों पर किये गये खर्च के बराबर होती थी। सैनिकों के लिए कठोर कानूनों की व्यवस्था थी, सेना में भी दो वर्ग थे-(1) उच्च वर्ग, (2) निम्न वर्ग। उच्च पदों पर कुलीन वर्ग के लोगों की ही नियुक्ति हो सकती थी। निम्न सैनिकों के लिये उन्नति का कोई मार्ग नहीं था। सैनिकों के रोज के दर्शन हमें क्रान्ति के समय देखने को मिलते थे।

10. दोषपूर्ण न्याय प्रणाली- निरंकुशवाद के सिद्धान्त के आधार पर राजा न्याय का उद्गम स्थल था। वह समस्त देश में अदालतों द्वारा न्याय करता था। प्राचीन व्यवस्था के आधार पर फ्रांस में न्याय के पदों का विक्रय होता न थी। कहीं जर्मनी का था। एकरूपीय विधान व्यवस्था विधान लागू था और कहीं रोमन का विधान प्रचलित था। अदालतों के फैसले भी पक्षपातपूर्ण पूर्ण होते होते थे।

11. विशेष अधिकार प्राप्त वर्ग का बोलबाला- राज्य के अतिरिक्त फ्रांस में उच्च वर्ग-प्रणाली न बड़े पादरियों को विशेष अधिकार प्राप्त थे जो जनता पर अत्याचार करने में व्यस्त रहते थे।

सामाजिक कारण के लिए क्लिक करे

Leave a comment