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महाभारत के अनुसार राजा के कर्तव्य क्या है

राजा के कर्तव्य

राजा को अपने कर्त्तव्यों की पूर्ति भली-भाँति करना अनिवार्य है। तभी सम्पूर्ण राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था कायम रह सकती है और राज्य की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा हो सकती है। राजा के धर्म का पालन करने पर ही समस्त प्रजाजन धर्म का पालन करते रहते हैं। राजा का प्रथम कार्य एवं कर्त्तव्य है सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखना, वर्णाश्रम धर्म का पालन कराना तथा स्वधर्म में मनुष्य को प्रवृत्त रखना। अगर सभी स्वधर्म तथा स्वकर्त्तव्यों का पालन करते रहते हैं हैं तो परिणाम यह होता है कि स्वर्णिम युग या सतयुग तथा इस प्रयास में तीन चौथाई पूर्णता पर त्रेता युग तथा इसकी आधी पूर्णता पर द्वापर युग का आगमन होता है किन्तु राजा के अकर्त्तव्यशील तथा अन्यायी होने पर वर्णशंकर उत्पन्न होते हैं एवं कलियुग आ जाता है। राजा का द्वितीय कार्य संरक्षण करना है जो व्यक्ति भूखे हों उनके लिए भोजन का प्रबन्ध राज्य की ओर से किया जाए, जो व्यक्ति गरीब हों आर्थिक सहायता उन्हें राज्य दे। राज्य को जनता के भौतिक विकास की ओर भी ध्यान देना चाहिए। राजा को चाहिए कि वह राज्य में कृषि का उत्पादन बढ़ावे। राज्य कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने ताकि प्रजाजनों में सुखसमृद्धि स्थापित हो कृषि को केवल वर्षा पर ही आधारित जानकर उसे असिंचित नहीं छोड़ देना चाहिए। अपितु, वे स्वयं बड़े-बड़े तालाब तथा झीलें, नहरें आदि खुदवायें ताकि सिंचाई का पूर्ण प्रबन्ध हो। कृषकों को बीज आदि भी राजा को देने चाहिए। अकाल के समय राहत देने के लिए राजा को तुरन्त कदम उठाना चाहिए। राजा को चौड़ी सड़कें बनवानी चाहिए। राजा को दान करते रहना चाहिए। राजा को अस्पताल खुलवाने चाहिए। उसे वैश्याघरों, जुआघरों, मयखानों आदि को अपने नियंत्रण में रखना चाहिए। महाभारत में इस प्रकार के जनहित कार्यों की विस्तृत रूपरेखा हमें मिलती है, जिसे राजा द्वारा राज्य के सामान्य जनों के हितार्थ करना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं है कि प्राचीन हिन्दू विचारकों ने महाभारत में जिस राज्य की कल्पना की थी वह लोक- कल्याणकारी राज्य कहा जा सकता है।

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