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नेहरू के अन्तर्राष्ट्रीयतावाद सम्बन्धी विचार

नेहरू के अन्तर्राष्ट्रीयतावाद एवं विश्वशान्ति सम्बन्धी अवधारणा विचार

पं० नेहरू अन्तर्राष्ट्रीयता एवं विश्व शान्ति के प्रबल समर्थक थे। वे राष्ट्रवादी के साथ- साथ अन्तर्राष्ट्रीय भी थे। भारतीय राष्ट्रवाद को विश्वराष्ट्रवाद का ही एक अंग मानते थे। इसी आधार पर बहुत से लोगों ने उन्हें राष्ट्रवादी कम तथा अन्तर्राष्ट्रवादी अधिक कहा। इसमें काफी सत्यता भी है। वे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, मानवता, विश्व शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के घोर समर्थक थे। उनके द्वारा कभी संकुचित राष्ट्रीयता का समर्थन नहीं किया गया। वे उदार राष्ट्रीयता में विश्वास करते थे। तभी तो वह समस्त विश्व को अपना राष्ट्र मानकर प्रेम करते थे। अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था कि “विश्व आज अन्तर्राष्ट्रीय है और केवल मनुष्य के विचार एक रुढ़ि पर आधारित है जिसकी आज कोई कीमत नहीं है। आज कोई भी राष्ट्र अकेला जीवन व्यतीत नहीं कर सकता। सभी राज्य एक-दूसरे पर निर्भर हैं।” अपनी इसी भावना के आधार पर सदैव उन्होंने विश्व शान्ति, मानवता, अन्तर्राष्ट्रीय कानून एवं संस्थाओं का समर्थन किया। उनके अन्तर्राष्ट्रीय एवं विश्व शान्ति सम्बन्धी विचारों की विवेचना हम निम्न आधारों पर कर सकते हैं। 

(1) नेहरू जी ने राष्ट्रीयता के साथ-साथ सदैव अन्तर्राष्ट्रीयता को भी महत्त्व दिया। उनकी राष्ट्रीय भावना व्यापक तथा उदार थी। वे संकुचित राष्ट्रीयता के आधार पर कभी भी निर्णय नहीं लेते थे। उन्होंने सदैव अन्तर्राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन दिया तथा विश्व शान्ति को बढ़ावा दिया। सत्य तो यह है कि “वे अन्तर्राष्ट्रवादी अधिक तथा राष्ट्रवादी कम थे।” 

(2) अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को महत्त्व तथा उनमें विश्वास का भाव भी नेहरू में जीवन पर्यन्त रहा। शान्ति तथा मानवता के पुजारी होने के नाते उन्होंने सदैव अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का महत्त्व प्रदान किया। इसी आधार पर वे संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व संगठन तथा राष्ट्र ध्वज मण्डल जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को सदैव महत्त्वपूर्ण माना। संयुक्त राष्ट्र मण्डलीय सम्मेलन में सदैव भाग लेते थे तथा उनकी उपयोगिता एवं सार्थकता पर जोर देते थे।

(3) पं० नेहरू द्वारा सदैव शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्त्व में भी पूर्ण सम्बन्धों तथा परस्पर सहयोग को महत्त्व प्रदान किया गया। इसी भावना के तहत उन्होंने अपने पड़ोसी देशों के साथ मधुर सम्बन्ध रखने का प्रयास किया। चीन तथा पाकिस्तान के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में चीन की सदैव वकालत की परन्तु दोनों ने ही पं० नेहरू की भावना को सदैव ठेस पहुंचाई। उन्होंने पंचशील सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया तथा शान्तिपूर्ण सह अस्तित्त्व को महत्त्व दिया।

(4) अपनी इस भावना के आधार पर उन्होंने सदैव प्रत्येक प्रकार के उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद तथा संरक्षणवाद की आलोचना की। प्रायः प्रमुख अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से उन्होंने इन गलत सिद्धान्तों तथा साम्राज्यवादी नीति का विरोध किया। उन्होंने कभी भी बड़ी शक्तियों की नाराजगी की परवाह इस सम्बन्ध में नहीं की।

(5) विश्वशान्ति की स्थापना तथा अन्तर्राष्ट्रीय विवादों एवं समस्याओं के निराकरण में पं० नेहरू ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में कोरिया कांगो, मिश्र तथा अन्य विस्फोटक समस्याओं के निराकरण में योग दिया। उनका शीत युद्ध की भयंकता को कम करने में भी प्रमुख योगदान रहा। इस प्रकार पं० नेहरू ने सदैव अपनी अन्तर्राष्ट्रीयता पर विश्व शान्ति सहयोग तथा सद्भावना की स्थापना में सक्रिय सहयोग दिया। वे सच्चे अर्थों में मानवता तथा विश्व शान्ति के पुजारी थे। उन्होंने इस क्षेत्र में अहम् भूमिका निभाई।

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