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कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित राज्य के कार्यक्षेत्र

भारतीय राजनीति में कौटिल्य का नाम अमर है। वे एक कुशल राजनीतिज्ञ थे। उन्होंने राजनीति में सिद्धान्त एवं व्यवहार दोनों पक्षों का निरूपण किया। इतिहासकारों ने कौटिल्य को चाणक्य विष्णुगुप्त, पक्षिल स्वामी, वात्स्यायन, कुटिल आदि नामों से समलंकृत किया है। कौटिल्य का राजनीतिशास्त्र में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र’ के कारण है। अर्थशास्त्र में अन्य विषयों के साथ राजनीतिशास्त्र से सम्बन्धित समस्त विषयों का विस्तृत वर्णन किया गया है। कौटिल्य ने नन्द वंश का अन्त कर चन्द्रगुप्त को राजा बनाया था। उन्होंने अर्थशास्त्र का प्रणयन चन्द्रगुप्त के लिए ही किया था। अर्थशास्त्र में एक स्थान पर उल्लेख किया गया है कि जितने बड़े परिश्रम के साथ शास्त्र और शास्त्र के द्वारा नन्दराज के हाथों में नीहित पृथ्वी का रुद्वार किया है, उसी ने इस शास्त्र की रचना की है। कौटिल्य ने उसके समय में तथा उसके पूर्व प्रचलित सभी शास्त्रों का अध्ययन करने के उपरान्त अर्थशास्त्र की रचना की। अर्थशास्त्र में इस ग्रन्थ की रचना के सम्बन्ध में लिखा गया है कि “समस्त शास्त्रों का अध्ययन करके तथा स्वयं उनको व्यवहार में प्रयोग करके कौटिल्य ने नरेन्द्र के लिए इस शास्त्र की रचना की।”

कौटिल्य ने अपने शास्त्र के नामकरण के सम्बन्ध में लिखा है कि मनुष्यों के आपसी सम्बन्धों को अर्थ कहते हैं तथा जिस स्थानों में मनुष्य रहते हैं उनको भी अर्थ कहते हैं इसके फलस्वरूप उस भूमि में निवास करने वाले मनुष्यों का पालन-पोषण तथा उन मनुष्यों के पारस्परिक व्यवहार सम्बन्धी विषयों को अर्थशास्त्र कहते हैं।

कौटिल्य का राजदर्शन-

कौटिल्य अर्थ प्रधान विचारों के प्रणेता थे परन्तु उनका राजनीतिक विचारकों के मध्य एक विशिष्ट स्थान है। उनके राजनीतिक विचारों में धर्म की प्रधानता है। उनके राजनीतिक चिन्तन में नैतिकता के दर्शन होते हैं। उन्होंने जितना महत्त्व कर्त्तव्य पक्ष को दिया उतना अधिकार पक्ष को नहीं। उन्होंने राज्य को अनिवार्य माना है तथा पूर्व प्रचलित परम्परा के अनुसार राज्य के सात अंगों की व्याख्या की है। वे राज्य को सावयव मानते थे तथा उसकी उत्पत्ति में दैवी सिद्धान्त के समर्थक थे। कौटिल्य के पूर्व राज्य का लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संवर्धन करना है। कौटिल्य के अनुसार “धर्म और अर्थ और काम इन तीनों में अर्थ प्रधान है, धर्म और काम अर्थ पर निर्भर है।” उन्होंने राजा के कार्य क्षेत्र का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उनके अनुसार “सुख का मूल धर्म है। धर्म का मूल अर्थ है और अर्थ का मूल राज्य है।” उनके दर्शन के विभिन्न विषयों का संक्षिप्त विवरण निम्नवत् है।

राज्य (राजा) के कार्य

कौटिल्य ने राज्य के इन उद्देश्यों के आधार पर ही उसके कार्यों का निर्धारण किया है। उनके अनुसार राज्य के निम्नलिखित कार्य हैं-

1. क्षेत्र और विस्तार-

कौटिल्य ने राज्य के सावयवी रूप में विश्वास व्यक्त किया है अर्थात् उनके अनुसार राज्य एक सावयव है। सावयव (शारीरिक अंगों) की तरह उसकी प्रकृति भी विकासशील है अतः राज्य का पहला कार्य अपने क्षेत्र का विस्तार करना है। किस तरह क्षेत्र विस्तार करना तथा पराजित देश के राजा और उसकी प्रजा एवं सेना के साथ कैसा व्यवहार होना चाहिए, इसके बारे में उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ में विस्तारपूर्वक लिखा है। 

2. लोक कल्याण-

प्रजा के सुख एवं हित तथा उसकी प्रगति के लिए कार्य करना राज्य का महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो उसे प्रजा से कर लेने का कोई अधिकार नहीं है। उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक सम्बन्धों की रक्षा, बूढ़े, रोगी, अपंग, गरीब एवं दुखी प्राणियों की सहायता तथा शिक्षा की समुचित व्यवस्था को राज्य य के लोक कल्याणकारी कार्यों के अन्तर्गत रखा है।

3. शांति एवं व्यवस्था तथा बाह्य एवं आन्तरिक सुरक्षा-

कौटिल्य के अनुसार राज्य रहित समाज में व्याप्त अशांति, अराजकता एवं अव्यवस्था की स्थिति समाप्त करने के लिये राज्य की उत्पत्ति हुई। इससे स्पष्ट है कि समाज में शाँति एवं व्यवस्था की स्थापना राज्य का सर्वप्रमुख कार्य है। इसके लिए उन्होंने ‘अर्थशास्त्र’ में अनेक उपाय बताये हैं। उन्होंने इसके लिये सैन्य बल तथा गुप्तचर विभाग की स्थापना और उसकी कार्य प्रणाली पर विशेष बल दिया है। इसी के साथ उन्होंने ने यह भी कहा है कि गुप्तचर विभाग को इस बात का पता लगाते रहना चाहिये कि राज्य की नीतियों का जनता पर कैसा प्रभाव पड़ा है तो वह उसकी कितनी समर्थक है। शांति एवं व्यवस्था के साथ-साथ उन्होंने राज्य की बाह्य आक्रमण की सुरक्षा को भी राज्य का महत्त्वपूर्ण कार्य बताया है। उनके अनुसार राजा को साम, दाम, दण्ड, एवं भेद तथा सेना, दुर्ग और पुलों आदि के निर्माण के माध्यम से राज्य की सुरक्षा की पर्याप्त व्यवस्था करनी चाहिए।

4. आर्थिक विकास सम्बन्धी कार्य-

‘कौटिल्य’ के अनुसार उद्योग-धंधों तथा कृषि आदि के विकास से ही राज्य खुशहाल होता तथा प्रजा के हितों की रक्षा होती है अतः इनका विकास तथा इन पर नियंत्रण रखना उसका महत्त्वपूर्ण कार्य है। उन्होंने पशुपालन, कृषि और वाणिज्य के लिए विशेष विभागों की स्थापना तथा विदेशी व्यापार और राष्ट्रीय उत्पादन में संतुलन का सुझाव दिया है।

5. वर्णाश्रम धर्म के पालन की व्यवस्था –

अन्य भारतीय विचारकों की तरह कौटिल्य ने भी वर्णाश्रम धर्म को ही सामाजिक संघटन का आधार माना है। उन्होंने राज्य के विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों के अन्तर्गत इस धर्म के पालन की व्यवस्था का भी समावेश किया है। उन्होंने कहा है कि राज्य को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये कि लोग वर्णाश्रम धर्म का पालन कर सकें।

कौटिल्य ने राज्य के जिन कार्यों अथवा कर्त्तव्यों का उल्लेख किया है उनकी विवेचना से स्पष्ट हो जाता है कि वह व्यक्तिवादी एवं निरंकुश नहीं अपित लोक कल्याणकारी राज्य में विश्वास करते हैं। 

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