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तत्सम तद्भव शब्द और परिभाषा

UPPSC HINDI

तत्सम शब्द:- 

किसी भी भाषा के मूल शब्दों को तत्सम शब्द कहते हैं। हिन्दी की मातृ भाषा संस्कृत होने के कारण संस्कृत भाषा के जो शब्द मूल रूप में ही हिन्दी भाषा में प्रयुक्त होते हैं, वे तत्सम शब्द कहलाते हैं। उदाहरण:- आम्र (आम), खर्पर (खपड़ा, खप्पर), तिक्त (तीता), त्वरित (तुरन्त) इत्यादि ।

तद्भव शब्दः-  

संस्कृत के मूल शब्द (तत्सम) की विकृति से उत्पन्न जो शब्द हिन्दी भाषा में प्रयुक्त होते हैं, उन्हें तद्भव कहते हैं। उदाहरणः- आग (अग्नि), फूल (पुष्प), पिया (प्रिय) आदि ।

तत्सम और तद्भव शब्दों को पहचानने के कुछ सामान्य नियम-

तत्सम शब्दों में ‘ष’ (मूर्धन्य) वर्ण का प्रयोग होता है। जैसे- किसान – कृषक, असीस – आशीष

तत्सम शब्दों में ‘ऋ’ की मात्रा का प्रयोग होता है। जैसे – कचहरी – कृतगृह, झनकार – झंकृत

तत्सम शब्दों में ‘र’ की मात्रा का प्रयोग होता है। जैसे – आम- आम्र, ताँबा – ताम्र

तत्सम शब्दों में प्रायः ‘र’ के स्थान पर ‘ण’ वर्ण का प्रयोग होता है। जैसे – अमचूर – आम्रचूर्ण, अरपन – अर्पण 

तत्सम शब्दों में प्रायः ‘त्र’ का प्रयोग होता है। जैसे – कपूत – कुपुत्र, जहाँ – यत्र, चीता – चित्रक

तत्सम शब्दों में प्रायः ‘प्र’ का प्रयोग होता है। जैसे- पिया – प्रिय, पहला- प्रथम, पहर- प्रहर

तत्सम शब्दों के पीछे ‘क्ष’ वर्ण का प्रयोग होता है और तद्भव शब्दों के पीछे ‘ख’ या ‘छ’ शब्द का प्रयोग होता है। जैसे- पंछी- पक्षी

तत्सम शब्दों में ‘श्र’ का प्रयोग होता है और तद्भव शब्दों में ‘स’ का प्रयोग हो जाता है। जैसे– धन्नासेठी – धन्न श्रेष्ठी 

तत्सम शब्दों में ‘श’ (तालव्य) का प्रयोग होता है और तद्भव शब्दों में ‘स’ (दन्त्य) का प्रयोग हो जाता है । जैसे– दिया सलाई- दीपशलाका, अंस- अंश 

तत्सम शब्दों में ‘व’ का प्रयोग होता है और तद्भव शब्दों में ‘ब’ का प्रयोग होता है। जैसे – बन – वन 

जिस शब्द में चन्द्रबिन्दु का प्रयोग हो, वह निश्चय ही तद्भव शब्द होगा। जैसे-

तद्भव तत्सम
कुआँ कूप
आँवलाआमलक
आँसू    अश्रु
आँख अक्षि
गँवारग्रामीण / ग्रामकाट
भौंरा भ्रमर

यदि चन्द्रबिंदु के विपरीत शब्द में अनुस्वार अथवा पंचम वर्ण (ङ, ञ, ण, न, म) का प्रयोग हो, तो वह तत्सम शब्द होगा। जैसे

तत्समतद्भव
चन्द्रचाँद
अंकआँक
कंटककाँटा
अंगरक्षकअँगरखा
अंधकारअँधेरा
बंधबाँध

कभी-कभी तत्सम शब्द में आए हुए ‘ष’ / ‘ष’ (मूर्धन्य) का तद्भव में ‘स’ (दन्त्य) या लोप हो जाता है। जैसे-

तत्समतद्भव
अष्टादशअठारह
आशीषआसीस
कृषाण / कृषककिसान
वेशभेस
अग्निष्ठिकाअँगीठी
अष्टक्रीडाअठखेली/ अष्टकेलि (* अष्ट)
अषाढ़असाढ़
अष्टआठ
पृष्ठपीठ
कृष्णकिसन
अँगुष्ठ
अँगूठा 

यदि तत्सम शब्द ‘स्थ’ / ‘स्त’ से प्रारम्भ हो, तो तद्भव में उसके स्थान पर केवल ‘थ’ ‘स’ वर्ण ही रह जाता है। जैसे-

तत्समतद्भव
स्तम्भथंभ
स्तोकथोड़ा
स्तनथन
स्थिरथिर
स्थलथल
स्थानथान / ठाँव
स्तम्भनथामना
सुस्थिर (सुः स्थिर)सुथर 

कभी-कभी यह नियम शब्द के मध्य में आये वर्ण पर भी लागू हो जाता है । जैसे-

तत्समतद्भव
हस्तहाथ, हथौड़ा
पुस्तिकापोथी
हस्तिहाथी

तत्सम शब्द ‘थ’ वर्ण से और तद्भव शब्द ‘य’ / ‘व’ वर्ण से कभी-भी प्रारम्भ नहीं होते। परन्तु कुछ अपवाद मिल जाते हैं। जैसे-

तत्समतद्भव
एषयह
अन्रयहाँ
विक्षोभविछोह / वियोग
थुत्कार / थूत्कारथूकना
एवम्यों
असौवह

यदि र वर्ण किसी शब्द के ऊपर (रेफ) या नीचे आए, तो वह तत्सम शब्द ही होगा। जैसे-

तत्समतद्भव
कर्पटकपड़ा
गदर्भगधा
कर्मकरम / काम
चक्रवाकचकवा
धर्मधरम
नर्मनरम
आम्रआम
उष्ट्रऊँट
खर्जूरखजूर

यदि क्ष, त्र, ज्ञ, श्र, श्रृ, ऋ, द्य जैसे संयुक्त व्यंजनों का प्रयोग शब्द में हुआ हो, तो वह सदैव तत्सम होगा। जैसे-

तत्सम तद्भव
ऋक्षरीछ
घृतघी
श्रावणसावन
आँसूअश्रु
गृहघर
चित्रकचीता
कीदृशकैसा
विशेष- ‘ऋ’ वर्ण का प्रयोग केवल तत्सम शब्दो में ही होता है, ‘ऋ’ ध्वनि हिन्दी में समाप्त हो चुकी है।

यदि तालव्य ‘श’ का प्रयोग हुआ हो, तो तत्सम और दन्त्य ‘स’ का प्रयोग हुआ हो, तो वह तद्भव शब्द होगा। जैसे-

तत्समतद्भव
स्पर्शपरस
आश्विनआसोज (आसिन)
शाकसाग
दशदस
आदेशआयमु
परशुफरसा
शिरसिर
शीर्षसीस
शिलासिल
शून्यसुन्न

कभी ‘स्’ वर्ण का तद्भव रूप में ‘स’ अथवा लुप्त हो जाता है। जैसे-

तत्समतद्भव
आलस्यआलस
कस्सकिस
स्पर्शपरस
स्फुटनफूटना
स्फटिकफिटकरी
स्वर्णकार सुनार
हास्यहँसी
अस्थिहड्डी
कांस्याकारकसेरा
उत्साहउछाह

अधिकांशतः आधे-अधूरे एवं संयुक्त वर्णों का प्रयोग तत्सम शब्दों में ही होता है। जैसे-

तत्समतद्भव
पृच्छनपूछना
पार्श्वपास
वन्ध्यबाँझ
उद्वर्तनउबटन
गर्गरगागर
भ्रातृव्यभतीजा
मंजिष्ठमजीठ
श्वश्रृसास
शिम्बासेम
चतुष्षष्ठिचौंसठ
तिरश्चतिरछा
द्विसृतदूसरा
अनुत्थअनूठा
अलग्नअलग
कोअपिकोई
मृत्तिकामिट्टी
अभ्यन्तरभीतर
सार्द्धसाढ़े
अधःस्थितिहेठी

यदि शब्द ‘व’ वर्ण से प्रारम्भ हुआ हो, तो वह तत्सम और ‘ब’ से प्रारम्भ हुआ हो, तो वह तद्भव शब्द होगा। जैसे-

तत्समतद्भव
वानरबंदर
वधूबहू
वर्करबकरा
वर्धनबढ़ना
वासगृहबसेरा
वत्सबच्चा / बझड़ा
वरयात्राबारात
वचनबैन
वामनबौना
वृश्चिकबिच्छू 
बालुकाबालू
बिन्दुबिंदी
बहिरबाहर / वाह्य
असौवह
विक्षोभविछोह
बलीवर्दबैल
बदरीबेर
बिल्वबेल

तत्सम शब्दों में आये कुछ वर्णों का तद्भव शब्दों में निम्नवत् रूप में परिवर्तन हो जाता है- क्ष-छ /च्छ /ख, ज्ञ-ज, त्र-त, य-ज, श्रृ / श्र-सा जैसे-

तत्समतद्भव
अक्षरआखर / अच्छर
श्रापशाप
क्षतिछति
योगीजोगी
क्षेत्रखेत
नक्षत्रनखत
युक्तिजुक्ति /जुगति
जजमानयजमान
ज्ञानजान
श्रेष्ठिसेठ

कभी-कभी तत्सम एवं तद्भव दोनों शब्दों में अथवा केवल तद्भव में ही अनुस्वार का प्रयोग पाया जाता है। जैसे-

तत्समतद्भव
पक्षीपंछी
पक्षपंख
नग्ननंग / नंगा
कंकणकंगन
कंकतीकंघी
दंशडंक
एरंडीअंडी
ननां पतिनंदोई
पंक्तिपंगत

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