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स्वामी विवेकानन्द के राजनीतिक विचार

जिस समय राष्ट्र उदासीनता, निष्क्रियता और निराशा में डूबा हुआ था, उस समय स्वामी विवेकानन्द ने भारत के राष्ट्रवाद की नैतिक नींव को सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही दृष्टि से सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। स्वामी विवेकानन्द एक अध्यात्मवादी और महान् सृजनात्मक विभूति थे। भारत के नैतिक तथा सामाजिक पुनरुद्धार के लिए उन्होंने एक अनुप्रेरित कार्यकर्त्ता के रूप में अपना सम्पूर्ण जीवन समाप्त किया। यदि राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन और गोखले का विश्वास था कि इंग्लैण्ड का भारत में एक विशेष ध्येय है, तो दयानन्द और गाँधी की भाँति विवेकानन्द की आस्था थी कि भारत का पश्चिम के लिए एक विशिष्ट संदेश है।

राजनीतिक विचार

राष्ट्रवाद सम्बन्धी विचार- 

विवेकानन्द का विचार था कि प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में एक सर्वव्यापक सिद्धान्त होता है जिससे कि सम्पूर्ण राष्ट्र के जीवन का मार्गदर्शन होता है। उनका विश्वास था कि भारत के इतिहास में धर्म बड़ा ही महत्त्वपूर्ण एवं मार्गदर्शन सिद्धान्त रहा है। उनके शब्दों में “हर राष्ट्र का, जिस प्रकार कि संगीत में एक मुख्य स्वर होता है एक केन्द्रीय विषय होता है जिनके ऊपर बाकी अन्य चीजें आधारित रहती हैं। हर राष्ट्र का अपना एक निश्चित लक्ष्य होता है। इसके अतिरिक्त हर वस्तु गौण है। भारत का विशिष्ट उद्देश्य धर्म है, सामाजिक क्षमता तथा अन्य दूसरी वस्तु गौण है।”

विवेकानन्द ने ने राष्ट्रवाद की की उस आध्यात्मिक धारणा की आधारशिला रखी जिसका बाद में विपिनचन्द्र पाल एवं श्री अरविन्द घोष ने समर्थन किया वे भी लिखते हैं-“धर्म भारत के राष्ट्रीय जीवन का मुख्य अंग होना चाहिए।”

उन्होंने अनुभव किया कि राष्ट्र के भविष्य की महानता का आधार उसकी अतीत की महानता होनी चाहिए। अतीत को भुला देने का अर्थ होगा राष्ट्र के समग्र स्वरूप का नष्ट हो जाना। वे कहा करते थे कि धर्म ही निरन्तर भारतीय जीवन का आधार रहा है, इसलिये सभी सुधार धर्म के माध्यम से ही किये जाने चाहिए, तभी देश की बहुसंख्यक जनता उन्हें अंगीकार कर सकेगी। अतः राष्ट्रवाद का आध्यात्मिक अथवा धार्मिक सिद्धान्त राजनैतिक चिन्तन को विवेकानन्द की प्रथम महत्त्वपूर्ण देन कहा जा सकता है।

स्वतन्त्रता सम्बन्धी विचार- 

स्वामी जी ने स्वतन्त्रता का जो रूप प्रस्तुत किया वह सीमित न होकर बड़ा ही विस्तृत रूप था। उनका कहना था कि सम्पूर्ण विश्व अपना अनवरत गति के द्वारा मुख्यतः स्वतंत्रता की ही खोज कर रहा है। लन्दन में एक भाषण में उन्होंने कहा था कि यह विश्व क्या है ? स्वतंत्रता में इसका उदय होता है और स्वतंत्रता पर ही वह अवलम्बित है। विवेकानन्द आध्यात्मिक स्वतंत्रता अथवा माया के बन्धनों और प्रलोभनों से मुक्ति के ही समर्थक नहीं थे बल्कि वे मनुष्य के लिए भौतिक अथवा बाह्य स्वतंत्रता भी चाहते थे। वे मनुष्य के प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्तों को मानते थे। प्राकृतिक अधिकारों के सम्बन्ध में उन्होंने लिखा है कि “स्वतंत्रता का निश्चय ही यह अर्थ नहीं है कि यदि मैं और आप किसी की सम्पत्ति को हड्पना चाहें तो हमें ऐसा करने से न रोका जाये, किन्तु प्राकृतिक अधिकार का अर्थ यह है कि हमें अपने शरीर, बुद्धि, धन का प्रयोग अपनी इच्छानुसार करने दिया जाय और हम दूसरों को कोई हानि नहीं पहुँचायें और समाज के सभी सदस्यों को धन, शिक्षा तथा ज्ञान प्राप्त करने का समान अधिकार हो। विवेकानन्द के अनुसार स्वतंत्रता उपनिषदों का मुख्य सिद्धान्त था। विवेकानन्द की यह भी आशा थी कि जिस स्वतंत्रता का उदय अमेरिका में 4 जुलाई, 1776 ई० को हुआ था वह किसी भी दिन समस्त विश्व में प्रतिष्ठित हो जाएगी। 

आत्मसम्मान व स्वावलम्बन पर विवेकानन्द के विचार-

वेकानन्द मनुष्य के नैतिक गुणों व व्यक्ति के गौरव के पोषक थे। राष्ट्र का निर्माण, व्यक्तियों की इकाइयों के मिलने से होता है, अतः यदि इन इकाइयों में अच्छे गुणों का विकास होगा-मानव में सम्मान और पुरुषत्व की भावना का जागरण होगा तभी राष्ट्र सच्चे रूप में शक्तिशाली बन सकेगा। विवेकानन्द नै कई अवसरों पर स्पष्ट घोषणा करते हुए कहा- “मानव स्वभाव के गौरव को कभी न भूलो। हममें से प्रत्येक व्यक्ति यह घोषणा करे कि मैं ही परमेश्वर हूँ जिससे बड़ा न कोई हुआ है और न होगा। क्राइस्ट और बुद्ध उस असीम महासागर की तरंगें मात्र हैं। जो मैं हूँ।” विवेकानन्द ने मनुष्य को स्वाधीनता के उच्चतम रूप का प्रतिनिधि मानते हुए उसके गौरव में गंभीरतम आस्था प्रकट की है तथा व्यक्ति के आत्मगौरव की वृद्धि हेतु उसे स्वावलम्बी बनने पर बल प्रदान किया है तथा उसे शक्ति संचित करने एवम् निर्भय होने की बात कही है।

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