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दयानन्द सरस्वती के सामाजिक विचार

स्वामी दयानन्द मूल रूप से एक राजनीतिक चिन्तक न होकर एक महान् दार्शनिक तथा धार्मिक एवं सामाजिक विचारक थे। स्वामी जी का मानना था जब तक भारत में फैली सामाजिक कुरितियों का अन्त नहीं होगा, तब तक भारत का विकास सम्भव नहीं है। साथ ही उनका यह मानना था सुधार की इस प्रक्रिया में आवश्यक सभी साधन व समाग्री भारत के प्राचीन गौरवमयी संस्कृति में मौजूद हैं। समाज से सम्बन्धित उनके दृष्टिकोण को अग्रलिखित शीर्षकों के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है-

(1) वर्ण व्यवस्था के प्रबल पोषक-

स्वामी जी वर्ण व्यवस्था के प्रबल पोषक थे किन्तु उन्होंने जन्म को वर्ण व्यवस्था का आधार नहीं माना। कर्म व गुण पर आधारित व्यवस्था रखने से सभी मानव अपनी उन्नति का प्रयास करेंगे क्योंकि उत्तम वर्ण वालों को यह भय रहेगा ‘यदि हमारी सन्तानें गुणहीन रहीं तो शूद्र कहलायेगी।

(2) आश्रम व्यवस्था का समर्थन

दयानन्द ने वेदों द्वारा प्रस्तावित आश्रम व्यवस्था का समर्थन किया है। वेदों के चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास, का उल्लेख है। ये आश्रम व्यक्ति के श्रेष्ठतम गुणों के विकास की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।

(3) विवाह व पुनर्विवाह सम्बन्धी विचार-

दयानन्द दविवाह के सम्बन्ध में स्त्री- पुरुष की सहमति को आवश्यक मानते थे। उन्होंने पुनर्विवाह का विरोध किया क्योंकि ये पारिवारिक क्लेश उत्पन्न करते हैं। इससे विवाह की मर्यादा व प्रेम नष्ट हो जाते हैं तथा पतिव्रत तथा स्त्रीव्रत धर्म का भी नाश हो जाता है।

(4) छूआछूत का विरोध-

मनुष्य होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए। समस्त मानव जाति की समानता में विश्वास रखने के कारण ही दयानन्द ने शूद्रों को भी वेद पढ़ने और यज्ञोपवीत धारण करने का अधिकार दिया।

(5) नारी उत्थान के समर्थक-

वैदिककाल के सामाजिक ढाँचे के आधार पर दयानन्द सरस्वती ने स्त्रियों को सामाज के उच्च स्थान दिलाने का प्रयत्न किया। उन्होंने बहुविवाह, बाल-विवाह और पर्दा प्रथा का घोर विरोध किया तथा स्त्री शिक्षा पर अत्यधिक बल दिया। स्वामी जी का मत था, “नारी न केवल गृहस्थ जीवन की आधारशिला है वरन् वह युग निर्मात्री भी है। अतः उसका सुशिक्षित, सभ्य और संस्कृति होना अनिवार्य है।”

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