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दयानन्द स्वरस्वती के राजनीतिक विचार

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राजनीतिक विचारकों की भांति राजनीतिक सिद्धान्तों की व्याख्या नहीं की लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थियों के प्रति वे पूर्णतः सजग थे। समय – समय पर उन्होंने अपने भाषणों तथा लेखों में तथा अपने ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में राजनीतिक के सम्बन्ध में जो कुछ कहा और लिखा उसी को सामूहिक रूप से उनका राजनीतिक चिन्तन कहा जा सकता है। उनके प्रमुख राजनीतिक विचारों को अग्रलिखित शीर्षकों के आधार पर व्यक्त किया जा सकता है- 

भारतीय राष्ट्रवाद – 

महर्षि दयानन्द संन्यासी तो अवश्य थे परन्तु उनके जीवन का लक्ष्य केवल निजी मोक्ष-प्राप्ति तथा आराधना और चिन्तन नहीं था। वे सच्चे कर्मयोगी थे। समाज और मानव का कल्याण उनके कार्यक्षेत्र में विशेष महत्व रखते थे। अतः यह असम्भव था कि राष्ट्र धर्म की ओर उनका ध्यान न जाता ‘भूखे भजन न होई गोपाला’ तो सभी जानते हैं परन्तु स्वामी जी ने इस ओर भी ध्यान दिया कि परतंत्र मनुष्य के धर्म-परायण तथा सदाचारी और सत्यनिष्ठ होने में भी अनेक बाधाएँ उपस्थित रहती हैं। मुसलमान काल में हिन्दू धर्म पर अत्याचार तथा उसका विनाश, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की असफलता के पश्चात् की दशा और ईसाई धर्म प्रचारकों के कार्यकलाप और शासन की ओर से उनकी सहायता के फलस्वरूप समाज और धर्म की जो हानि हो रही थी उसे देखकर स्वामी जी ने अनुभव किया कि धर्म ही सब प्रकार की विपत्तियों से रक्षा कर सकता है। अतः उनके धार्मिक पुनर्जागरण के प्रयास में राष्ट्रीय पुनर्जागरण का दूरगामी प्रभाव भी था, उनके विचार से पारस्परिक फूट, शिक्षा की कमी, जीवन मैं शुद्धता का अभाव, धर्म से विमुखता तथा धार्मिक एवम् सामाजिक कुरीतियों के कारण भारत का पतन हुआ था। भारतीय सामाजिक तथा राष्ट्रीय भावना एवं चरित्र की स्वामी जी के द्वारा चतुर्दिक उन्नति को लक्ष्य करके ही गाँधी ने उन्हें बारम्बार आदर एवम् श्रद्धा के साथ प्रणाम किया। स्वामी जी के लिए रवीन्द्र का यह कथन अक्षरशः सत्य है- 

“वे ऐसा बौद्धिक जागरण चाहते थे जो आधुनिक युग की प्रगतिशील भावना के साथ सामन्जस्य स्थापित कर सके और साथ ही देश के उस गौरवशाली अतीत के साथ अटूट सम्बन्ध बनाए रख सके। जिसमें भारत ने अपने व्यक्तित्व का कार्य तथा चिन्तन की स्वतंत्रता में और आध्यात्मिक साक्षात्कार के निर्मल प्रकाश के रूप में व्यक्त किया था।”

स्वराज्य का उद्घोष- 

‘स्वशासन’ तथा ‘स्वराज्य’ की पुकार सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द के द्वारा उठाई गई थी। उन्होंने यह उद्घोष उस समय किया था जब कोई भी व्यक्ति यह साहस नहीं कर सकता था कि ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध कुछ कहे। उनका यह शक्तिशाली तथा निर्भीक कथन ही सर्वप्रथम भारत के वायुमण्डल में गूँजा था। विदेशी सरकार चाहे सब प्रकार से धार्मिक, पक्षपातों से मुक्त तथा देशी व विदेशी लोगों के प्रति निष्पक्ष ही क्यों न हो, लोगों को पूर्ण रूप से सन्तुष्टि प्रदान नहीं कर सकती।

स्वामी जी के ये सभी विचार राष्ट्रवादी थे। भारत पर गर्व करो, प्राचीन वैदिक संस्कृति का अनुसरण करो तथा भारत को फिर कर से उन्नत करने का प्रयास करो। इन्हीं विचारों का स्वामी दयानन्द ने सम्पूर्ण जनता में प्रचार किया जिससे लोगों के मन में विदेशी शासन के प्रति आक्रोश उत्पन्न हुआ और आगे चलकर स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए पृष्ठभूमि तैयार हुई। राष्ट्रीय चेतना की भावना को जागृत करने में भारत के प्राचीन वैभव एवं शौर्य के प्रति जनता को शिक्षित करके स्वामी दयानन्द ने महत्वपूर्ण कार्य किया था। वेलेटाइन शिरोल ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि स्वामी दयानन्द की शिक्षाएँ महान राष्ट्रवाद से ओतप्रोत थीं। उनका यह कथन स्मरणीय है-“दयानन्द की शिक्षाओं का महत्वपूर्ण प्रवाह हिन्दूवाद को सुधारने की अपेक्षा इसे सक्रिय विरोध के क्रम में रखना था जिससे कि यह विदेशी प्रवाहों को रोक सके जो कि उनके विचार में इसे अराष्ट्रीय बनाने की धमकी दे रहे थे।”

विदेशी वस्तुओं का प्रेम- 

स्वामी दयानन्द ने ही उस राष्ट्रीयता की भावना को उभारा था जिसे आगे चलकर गांधीजी ने बढ़ाया। स्वामी जी का मत था कि स्वदेशी राज्य ही सर्वोत्तम है। स्वधर्म, स्वराज्य, स्वदेशी वस्तुएँ और स्वभाषा आदि सभी से सम्बन्ध में उनके जो विचार थे उनसे समाज में स्वराज्य की भावना पुष्ट हुई। उन्होंने जनता को इस बात के लिए समझाया एवं प्रोत्साहित किया कि सब लोग विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करें और देश में बने खादी के कपड़े पहनें। जोधपुर के तत्कालीन नरेश स्वामी दयानन्द के विचारों से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग आरम्भ कर दिया और विदेशी वस्तुओं का परित्याग कर दिया। 

आदर्श शासन प्रणाली : लोकतंत्र का समर्थन 

अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने उसे लोकतंत्र के निर्माण, स्वरूप, शासन तथा न्याय सम्बन्धी धारणाओं की विवेचना की है जिसकी वे भारत में स्थापना करना चाहते थे। वह उनका आदर्श लोकतंत्र था। स्वामी जी के चिन्तन, मनन और व्यवहार में वे तीनों आदर्श समान रूप से देखे जाते हैं जिन पर वर्तमान लोकतंत्र आधारित है। वे स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्त्व है। स्वामी जी ने जिस लोकतंत्र की कल्पना की थी उसमें यह व्यवस्था है कि जनसाधारण स्वतंत्रता को समान आधार पर भोग सके। प्रत्येक व्यक्ति को अपने सभी उचित कार्यों के लिए पूर्ण स्वतंत्रता है। कोई शक्ति इसमें बाधक नहीं हो सकती। स्वामी जी ने एकाधिकारवाद एवं विशेषाधिकारवाद की प्रवृत्तियों को स्वीकार नही किया जिससे कि समानता आ सके। उनका लोकतंत्र प्रत्येक वर्ग, धर्म, जाति तथा लिंग के लिए मान है और उसमें यह नितान्त आवश्यक है कि समानता के आदर्श पर सभी आचरण करें। स्वामी जी भ्रातृत्व की भावना को आवश्यक मानते थे जिससे सामाजिक जीवन गतिशील बना रहे। उनके लोकतंत्र के प्रारूप का मूल स्रोत ‘मनुस्मृति’ है जिसकी शिक्षा के अनुसार ही उन्होंने यह व्यवस्था रखी है कि राज्य व्यवस्था में सभासदों तथा मंत्रियों का आचरण मर्यादित हो। नैतिकता के आधार पर धार्मिक मान्यताओं का समर्थन भी ‘मनुस्मृति’ के अनुकूल ही है।

जागरूक राजतंत्र का समर्थन स्वामी दयानन्द के द्वारा स्वीकृत राजतंत्र भी ‘मनुस्मृति’ पर ही आधारित है। धर्म के प्रति श्रद्धा उनके लिए सर्वप्रथम महत्त्व की वस्तु है। इसीलिए उन्होंने राजा को धर्म के अनुकूल आचरण करने की प्रेरणा दी। राजतंत्र को मर्यादित करने के लिए ही स्वामी जी ने यह बात सर्वोच्च रखी है कि राजा के निश्चित गुण अपरिहार्य हैं। उन्होंने जो यह आवश्यक बताया है कि राजा का कर्त्तव्य है कि वह जनता की इच्छा के आधार पर कार्य करे वह इसलिए कि राजतंत्र जागरूक रहे और राज्य मद द में कर्त्तव्यच्युत न हो जाय। अपितु राजतंत्र को सीमाबद्ध तथा निरंकुशता से मुक्त रखने के विचार से स्वामी जी ने तीन अलग-अलग सभाओं की व्यवस्था दी है जो क्रमशः शासन, कानून और न्याय की देख-रेख करें।

ग्राम प्रशासन तथा न्याय व्यवस्था का निर्धारण- 

स्वामी दयानन्द का मत था कि यदि ग्राम को राज्य की इकाई निर्धारित किया जायेगा तो प्रशासन में सुविधा रहेगी। उनकी इस ग्राम-राज्य की कल्पना भी मनुस्मृति पर ही आधारित है। इस सम्बन्ध में ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में दिए गए उनके विचारों को समझ लेना ही उचित है। आगे चलकर स्वामी जी ने ग्राम-राज्य की भावना के आधार पर ही गाँधी ने अपने रामराज्य का लक्ष्य निर्धारित किया था। इस सम्बन्ध में सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है- “दो, तीन, पाँच या सौ ग्राभों के बीच एक प्रशासनिक कार्यालय रखना चाहिए जिससे काम चलाने हेतु पर्याप्त कर्मचारी होने चाहिए। एक ग्राम के अन्दर पहला, दस ग्रामों के ऊपर दूसरा, 20 ग्रामों पर तीसरा, सौ ग्रामों के ऊपर चौथा तथा एक हजार ग्रामों की ऊपर पाँचवाँ कर्मचारी नियुक्त होना चाहिए।”

राष्ट्रभाषा हिन्दी का समर्थन- 

स्वामी दयानन्द का जन्म गुजरात में हुआ था। स्वभावतः उन्हें अपनी प्रान्तीय भाषा, गुजराती विशेष प्रिय थी। परन्तु उनकी दृष्टि में केवल प्रान्त नहीं, पूरा राष्ट्र था। वे सम्पूर्ण के प्रतिनिधि थे तथा उनका दृष्टिकोण संकुचित न होकर बड़ा व्यापक था। अपने राष्ट्रवादी सिद्धान्त के अनुसार वे स्वराज्य, स्वधर्म और स्वभाषा सभी को पूरे भारत के परिवेश में देखते थे। अतः उन्होंने राष्ट्रीय भावना से प्रेरित होकर तथा राष्ट्रीयता को प्रोत्साहित करने हेतु अपनी समस्त टीकायें तथा ग्रन्थ राष्ट्रभाषा हिन्दी में ही लिखे।

अन्तर्राष्ट्रीयता का पोषण-

स्वधर्म और स्वराष्ट्र के प्रबल समर्थक थे स्वामी दयानन्द परन्तु उससे उनके हृदय में किंचित भी संकुचित दृष्टिकोण नहीं पनपा था। वे सभी धर्मों के प्रति प्रेम रखते थे तथा अन्तर्राष्ट्रीय सद्भाव से भरे थे। वे सभी धर्मावलम्बियों को समुचित आदर . करते थे। ईसाई, मुसलमान तथा सूफी मत के अनुयायी उनकी दृष्टि में सब समान थे। चमूपति ने सत्य ही लिखा है कि, “महर्षि दयानन्द धार्मिक एकता के आधार पर विश्व एकता चाहते थे। अपने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने देश के धार्मिक नेताओं से विचार-विमर्श किए।”

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