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स्वदेशी आन्दोलन की प्रगति अथवा प्रसार

7 अगस्त, 1905 ई० की कलकत्ता टाउन हाल की बैठक में ऐतिहासिक बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नामक के बहिष्कार की अपील की। इधर सरकार द्वारा यह घोषणा कर दी गई कि बंग भंग 16 अक्टूबर, 1905 ई० से लागू होगा, इस घोषणा ने आग में घी का कार्य किया। सितम्बर 1904 ई० से सितम्बर 1905 ई० तक के मध्य कलकत्ता से बाहर कई जिलों में ब्रिटिश कपड़ों की बिक्री से आय 5 से 15 गुना तक कम हो गई। 16 अक्टूबर, 1905 का दिन पूरे बंगाल में शोक दिवस के रूप में मनाया गया। लोग सड़कों पर वन्दे मातरम् का नारा लगाते हुए निकल पड़े। विशाल जनसमुदाय को आनन्द मोहन बोस एवं सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने सम्बोधित किया, विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई।

स्वदेशी आन्दोलन शनैः शनैः सम्पूर्ण भारत में फैल गया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने बम्बई एवं पूना में आन्दोलन का नेतृत्त्व संभाला, अजीत सिंह एवं लाला लाजपत राय ने इसे पंजाब एवं उत्तर प्रदेश में नेतृत्त्व प्रदान किया, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने आन्दोलन को सम्बल प्रादन किया। तिलक, लाला लाजपत राय एवं विपिन चन्द्र पाल ने इसे जनसंघर्ष का रूप प्रदान करने का प्रयत्न किया। उनके लिए विभाजन का विरोध अब गौड़ हो गया, वे तो इस आन्दोलन को स्वराज्य के प्राप्ति से जोड़ना चाहते थे किन्तु उदारवादी इसे इतना आगे नहीं ले जाना चाहते थे। फलतः कांग्रेस में स्वदेशी आन्दोलन को लेकर सूरत अधिवेश में फूट पड़ गई। किन्तु बंगाल में आन्दोलन पर उग्रवादियों का प्रभुत्त्व स्थापित हो गया। उग्रवादी स्वदेशी आन्दोलन को व्यापक रूप प्रदान करना चाहते थे। इस हेतु बहिष्कार आन्दोलन को असहयोग एवं शान्तिपूर्ण प्रतिरोध तक ले जाना वे आवश्यक मानते थे। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार ही पर्याप्त न था। अब सरकारी स्कूलों, अदालतों, उपाधियों एवं नौकरियों के बहिष्कार की बात कही जाने लगी। हड़ताल तो मानो रोजमर्रा का कार्यक्रम बन गया।

स्वदेशी आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में यह भी उल्लेखनीय है कि इसके प्रचार के लिए पारम्परिक त्यौहारों, धार्मिक मेलों, लोक परम्पराओं आदि का सहारा लिया गया। तिलक ने शिवाजी महोत्सव एवं गणेश महोत्सव को अपने उद्देश्य की प्राप्ति का साधन बनाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि शीघ्र ही जनमानस में नवचेतना की लहर छा गई। किन्तु 1908 ई० के मध्य तक आन्दोलन शिथिल पड़ गया।

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