Test Examine

स्वदेशी आन्दोलन के मूलभूत कारण

स्वदेशी आन्दोलन का सामान्य परिचय

भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत स्वदेशी आन्दोलन के साथ हुई। इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नूतन शक्ति एवं दिशा प्रदान की। आन्दोलन महज राजनीतिक दायरे तक ही सीमित नहीं था अपितु इसने साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, उद्योग तथा जीवन के विविध क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। समाज का प्रत्येक वर्ग स्वदेशी आन्दोलन से जुड़ गया।

स्वदेशी आन्दोलन के मूलभूत कारण

यह सत्य है कि स्वदेशी आन्दोलन की शुरुआत बंग-भंग के विरोध में 7 अगस्त, 1905 ई० को कलकत्ता के टाउन हाल में एक बैठक में इसकी विधिवत् घोषणा के पश्चात् आरम्भ हुआ, किन्तु यदि परीक्षण किया जाए तो इस आन्दोलन की पृष्ठभूमि तो ब्रिटिश शासन की आर्थिक शोषण की प्रवृत्ति ने तैयार कर दी थी। स्वयं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मंच से उसके जन्म के कुछ ही बाद विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार एवं स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग की बात कही जाने लगी थी। 1893 ई० के लाहौर के कांग्रेस अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय ने कहा था, “वे कोरी और जुलाहे कहाँ है? वे लोग कहाँ हैं जो विभिन्न प्रकार के उद्योग चलाकर और माल बनाकर जीवन-यापन करते थे और वे माल कहाँ हैं जो प्रतिवर्ष इंग्लैण्ड तथा अन्य यूरोपीय देशों को भेजे जाते थे।” 1906 ई० में कलकत्ता अधिवेशन में मालवीयजी ने कहा, “कच्चा माल हमारे देश से बाहर जाता है और तैयार माल बनकर वापस आता है। अगर हम स्वतंत्र होते तो संरक्षण का सहारा लेते।” वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था जितनी जर्जरित हो चुकी थी उससे थोड़ी राहत के लिए यह सोचा जाने लगा कि विदेशी व्यापार के स्थान पर स्वदेशी व्यापार को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

इस विदेशी सरकार के विरोध में ज्वाला तैयार हो रही थी कि बंगाल के विभाजन की घोषणा (19 जुलाई 1905) ई० ने विभाजन विरोधी भारतीयों को आक्रोश से भर दिया। अब इसके विरोध में बंगाल में 7 अगस्त, 1905 ई० को स्वदेशी आन्दोलन की विधिवत् घोषणा कर दी गई।

Leave a comment