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धर्मनिपेक्षता पर नेहरु के विचार 

नेहरू जी धार्मिक कट्टरता के घोर विरोधी थे। आत्मा एवं परमात्मा के सन्दर्भ में विचार करने का उनके पास वक्त ही नहीं था। वे हिन्दू परिवार में जन्म लेने के बाद भी हिन्दू धर्म के पचड़े से दूरी बनाये रखा। वे सर्वधर्म समानता पर बल देते थे। पं० नेहरू ने इतिहास का गहन अध्ययन किया था। वे इतिहास के विकासवादी सिद्धान्त में पूर्ण आस्था रखते थे। भारतीय इतिहास के अध्ययन के उपरान्त उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला- “भारत ने अपने धार्मिक विद्वेष एवं साम्प्रदायिक फूट से अपनी गौरवमयी संस्कृति को बड़ी हानि पहुँचायी है।

नेहरू जी धर्म निरपेक्षता अथवा पंथनिरपेक्षता के कट्टर समर्थक थे। कुछ लोक धर्म निरपेक्षता का आशय धर्महीनता, विधर्मता एवं नास्तिकता से लगाते हैं, 

पं० जवाहर लाल नेहरू अपने धर्म निरपेक्षता को परिभाषित करते हुए लिखा है-

“मेरी धर्म निरपेक्षता का आशय धर्महीनता से कदापि नहीं है। इसका आशय है सर्वधर्म सम्भाव तथा सभी व्यक्ति के समान अवसर है चाहे कोई व्यक्ति किसी धर्म को मानने वाला ही क्यों न हो। इसलिए हमें मस्तिष्क में अपनी संस्कृति के इस आवश्यक पक्ष को सदैव ध्यान में रखना चाहिए जिसका वर्तमान भारत में सर्वाधिक महत्त्व है।
नेहरू जी ने धर्म-निरपेक्षता का अर्थ स्पष्ट करते हुए आगे लिखा है कि सभी धर्मों को पूर्ण स्वाधीनता दी जाये, राज्य किसी धर्म के मामले में हस्तक्षेप न करे। 1951 में उन्होंने कहा कि सभी धर्मों को संरक्षण तथा ‘एक धर्म को दूसरे के विरुद्ध प्रोत्साहन न देना’ साथ-साथ ‘राज्य को अपना कोई धर्म न रखना ही धर्म-निरपेक्षता है।” उन्होंने घोषणा की कि “इस देश में किसी भी प्रकार की साम्प्रदायिकता सहन न करेंगे। हम एक ऐसे स्वतंत्र धर्म निरपेक्ष राज्य का निर्माण कर रहे हैं जिसमें प्रत्येक धर्म तथा मत को पूरी स्वतन्त्रता तथा समान आदरभाव प्राप्त होगा और प्रत्येक नागरिक को समान स्वतंत्रता तथा समान अवसर की सुविधा होगी।”
महात्मा गाँधी ने धर्म का सार नेहरू जी को बताया था। नेहरू जी सत्य को ही धर्म और सत्य को ही ईश्वर मानते थे पर वे अन्धविश्वासी न थे। वे प्राचीन रूढ़ियों एवं प्रथाओं का पालन करना धर्म नहीं मानते थे। जीवन के प्रति उनका प्रेम पूर्ण वैज्ञानिक था। उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि “भारत में तथा अन्यत्र भी धर्म या कर्म से कम संघटित धर्म को देख कर मुझे अत्यन्त घृणा होती है, और मैंने प्रायः इसकी भर्त्सना की है, तथा इसको पूर्णतया नष्ट कर देने की इच्छा की है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने प्रायः सदैव अन्धविश्वास, प्रतिक्रिया, शोषण और विशेष हितों को प्रश्रय दिया है।”

नेहरू जी के धर्म का आशय सत्य की खोज करना था। उनके अनुसार, “यदि धर्म का आशय पूर्ण निष्ठा के साथ सत्य की खोज करना, सत्य के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर देने को उद्यत रहना है तो उन्हें इस धर्म की महान सेना का एक मजबूत सिपाही बनने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होगी।” नेहरू जी धर्म को मानते थे परन्तु उनके धर्म में पाखण्ड कोई स्थान न था। उन्होंने किसी व्यक्ति से अधार्मिक बनने के लिए नहीं कहा। वह धर्म को जीवन की एक आवश्यकता मानते थे। उन्होंने कहा था कि-“धर्म में वह तत्त्व है जो मानव के हृदय की आन्तरिक अभिलाषा को तृप्त करने की शक्ति रखता है। यदि धर्म में यह गुण न होता तो वह इस प्रकार की महान् शक्ति कभी नहीं बन पाता और असंख्य व्याकुल आत्माओं को शान्ति और सान्त्वना नही दे पाता।” नेहरू जी के धर्म का अर्थ संकीर्णता, सहिष्णुता तथा रूढ़िवादिता से रहित था तथा वह उसे सच्चा एवं वैज्ञानिक आधार पर मानते थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि “मैं कोई धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ परन्तु मैं किसी वस्तु में विश्वास करता हूँ आप उसे धर्म कह सकते हैं या जो कुछ चाहे कह सकते हैं या मनुष्य को उसके सामान्य स्तर को ऊँचा उठाती है और मनुष्य के व्यक्तित्त्व को आध्यात्मिक गुण तथा नैतिक गहराई का एक नवीन प्रमाण प्रदान करती है। अब जो भी व्यक्ति मनुष्य को उसकी क्षुद्रताओं से ऊपर उठाने में सहायता देता है, चाहे वह कोई देवता हो अथवा पाषाण प्रतिमा हो, वह शुभ है और उसे ठुकराया नहीं जाना चाहिए।”

नेहरू जी ने धर्म-निरपेक्ष राज्य एवं धर्म-निरपेक्षता की अत्यन्त उदार व्याख्या की है।

 उन्होंने धर्म-निरपेक्षीकरण का प्रक्रिया का सामाजिक जीवन के अन्य क्षेत्रों में क्रियान्वित करने का प्रयास किया है। उसकी यह प्रबल इच्छा थी कि व्यक्ति अपने सामाजिक नियमों में, विवाह में, उत्तराधिकारी सम्बन्धी नियमों में दीवानी एवं फौजदारी न्याय में तथा अन्य इसी प्रकार की बातों में धार्मिक विश्वासों में ऊपर उठे। वे सम्पूर्ण भारत के लिए एक सा नियम एक कानून ‘बनाना चाहते थे। नेहरू के सपनों के भारत की झलक हमें भारतीय संविधान में दिखती है। 

 नेहरु जी ने के जी मश्रुवाला को पात्र में लिखा –

”मैं देखता हूं कि जो लोग कभी कांग्रेस के स्तंभ हुआ करते थे, आज सांप्रदायिकता ने उनके दिलो-दिमाग पर कब्जा कर लिया है. यह एक किस्म का लकवा है, जिसमें मरीज को पता तक नहीं चलता कि वह लकवाग्रस्त है. मस्जिद और मंदिर के मामले में जो कुछ भी अयोध्या में हुआ, वह बहुत बुरा है. लेकिन सबसे बुरी बात यह है कि यह सब चीजें हुईं और हमारे अपने लोगों की मंजूरी से हुईं और वे लगातार यह काम कर रहे हैं.” जवाहरलाल नेहरू, 17 अप्रैल 1950

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