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राष्ट्रवाद पर नेहरू के विचार

जवाहर लाल नेहरू ने देश को एक सन्तुलित, संयमशील और आदर्श राष्ट्रवाद के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। राष्ट्रीयता सम्बन्धी उनकी मान्यता संकुचित नहीं थी। उनका कहना था कि मातृभूमि के प्रति भावुकता से भरे सम्बन्ध को ‘राष्ट्रीयता’ कहते हैं। उन्होंने कहा “हिन्दुस्तान मेरे खून में समाया हुआ है और उसमें बहुत कुछ ऐसी बात है जो मुझे स्वभावतः उकसाती है।” पर मातृभूमि के प्रति नेहरू जी का प्यार अन्धा नहीं था। मानवता के कल्याण में नेहरू भारत के कल्याण का दर्शन करते थे। वे टैगोर के समन्वयात्मक, विश्ववाद और विश्व-बन्धुत्व की भावना से प्रभावित थे।

नेहरू जी का विचार था कि राष्ट्रीयता एक परम्परागत शक्ति है जिसे प्रत्येक देशवासी स्वेच्छा से स्वीकार करता है। लोगों को यह नहीं समझना चाहिए कि राष्ट्रीयता की भावनाएँ उन पर लादी जा रही हैं, क्योंकि राष्ट्रीयता को नेहरू जी ने एक भावात्मक वस्तु बताया और विश्वास प्रकट किया कि विदेशी शासन के दौरान राष्ट्रीयता की भावना अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है तथा राष्ट्रीय आन्दोलन को गतिशील बनाए रखने के लिए शक्तिशाली प्रेरणा का काम करती है। 

नेहरू जी को धार्मिक राष्ट्रवाद से सहानुभूति नहीं थी। दयानन्द, विवेकानन्द, विपिन चन्द्र पाल और अरविन्द के राष्ट्रवाद सम्बन्धी धार्मिक दृष्टिकोण में उन्हें कोई आकर्षण नहीं था। ‘धार्मिक राष्ट्रीयता’ की धारणा उन्हें बेहूदा लगती थी। नेहरू जी को यह जानकर दुःख हुआ था और तब उन्होंने कहा था कि “यदि राष्ट्रीयता का आधार धर्म है तो भारत में न केवल दो वरन् तमाम राष्ट्र मौजूद है। भारत की राष्ट्रीयता न हिन्दू राष्ट्रीयता है न मुस्लिम वरन् यह विशुद्ध भारतीय है।”

नेहरू जी यद्यपि संशयवादी थे, लेकिन अत्यधिक भावुक और संवेदनशील होने के नाते उन्हें भारत माता को रोमांचपूर्ण आदर्श ने अत्यधितक प्रभावित किया। उनके लिए राष्ट्रवाद वास्तव में आत्मविचार का ही एक रूप था। उन्हीं के शब्दों में, “राष्ट्रवाद तत्वतः अतीत की उपलब्धियों परम्पराओं और अनुभवों की सामूहिक स्मृति है और राष्ट्रवाद जितना शक्तिशाली आज है उतना कभी नहीं था। जब कभी संकट आया है, तभी राष्ट्रवादी भावना का उत्थान हुआ है और लोगों ने अपनी परम्पराओं से शक्ति तथा सान्त्वना प्राप्त किया है। अतीत और राष्ट्र

का पुनरान्वेषण वर्तमान युग की एक आश्चर्यजनक प्रगति है।” नेहरू जी ने राष्ट्रीय आत्म-निर्णय के सिद्धान्त पर अत्यधिक बल दिया और

साम्राज्यवाद का प्रबल विरोध किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए संघर्षशील देश में एक स्वस्थ शक्ति होती है, लेकिन देश के स्वतंत्र हो जाने के बाद वही राष्ट्रीयता प्रतिक्रियावादी और संकीर्ण भी बन सकती है। अतः ऐसी संकीर्ण राष्ट्रीयता से सदैव बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद के नाम पर धर्म, जाति और संस्कृति का सहारा नहीं लेना चाहिए। नेहरू जी ने एक सच्चे राष्ट्रवादी के रूप में हर देश की आजादी को समर्थन दिया। उन्होंने कहा- “हर गुलाम देश के लिए राष्ट्रवाद की भावना से ओतप्रोत होना सर्वथा स्वाभाविक है।” पुनश्च, “एक पराधीन देश के लिए शान्ति का कोई अर्थ नहीं है, क्योंकि शान्ति तो स्वतंत्रता के बाद ही स्थापित हो सकती है। इसलिए साम्राज्यों को मिटाना ही चाहिए। उनका जमाना बीत चुका है।” उनका यह विश्वास आजीवन बना रहा कि उग्र राष्ट्रवाद मानव हृदय को संकीर्ण बना देती है तथा देशभक्ति की भावना को इतना उभार देता है कि देशों में अलग-अलग रहने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती हैं। उग्र राष्ट्रवाद से जातीयवाद, राष्ट्रों के प्रति घृणा, साम्राज्यवाद, युद्धवाद आदि बुराइयों का जन्म होता है।

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