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राजा राम मोहन राय के राजनीतिक एवं सामाजिक विचार

राजा राम मोहन रॉय

राजा राममोहन राय परम्परागत सामाजिक परिवेश में जन्में एवं पले-बढ़े भारतीय विद्वान् थे, परन्तु उनकी शिक्षा-दीक्षा एवं परिवेश पाश्चात्य आदर्शों से प्रभावित थी। इसी कारण वश उनके चिन्तन में उदारवादी के समस्त तत्त्वों-मानववाद, विवेकवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवीय गरिमा, एवं अस्तित्त्व की महत्ता तथा लोकतन्त्र आदि की प्रभावी उपस्थिति के दर्शन होते हैं। इन्हीं प्रभावों ने राजा राममोहन राय को तत्कालीन भारतीय समाज की कुरीतियों का समालोचन एवं परिष्करण करने के लिए प्रेरित किया जो तत्त्कालीन ब्रिटिश भारत में केवल सोची जा सकती थी।राजा राममोहन राय का मानना था भारत में ब्रिटिश सत्ता का होना भारतीय सामाजिक प्रगति की दृष्टि से वरदान सदृश है। उनका कहना था भारतीय लोगों का सर्वांगीण विकास ब्रिटिश सत्ता में ही संभव है।

राजा राममोहन राय आधुनिक भारतीय चिन्तन का सिरमौर (जनक)

Modern Indian Political Thinker Raja Ram Mohan Roy राजा राममोहन राय को आधुनिक भारतीय चिन्तन का सिरमौर (जनक) नवजागरण का अग्रदूत, सुधार आन्दोलनों का प्रवर्तक, आधुनिक भारत का जनक, पुनर्जागरण का जनक एवं नव प्रभात का तारा आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। सोफिया फालेट “उन्हें ऐसे पुल के रूप में स्वीकार करते हैं जिसके ऊपर होकर भारत अपने असीम अतीत से लेकर अज्ञात जित | भविष्य की ओर अग्रसर होता है।” वास्तव में राजा राममोहन राय आधुनिकता के प्रवर्तकों में अपने पृथक् थे जिन्होंने ने केवल सृजनात्मक सुधारवाद का झण्डा गाड़ा बल्कि जिन्होंने भारतीय चिन्तन में आधुनिक प्रवृत्ति और प्रभाव को गुणात्मक स्वर प्रदान किया। उनका चिन्तन कोरा पिता शून्यवादी न था बल्कि उन्होंने व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत किये। गोरी (ब्रिटिश) सरकार का व्यापक साम्राज्यवादी योजना के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सुधार की माँग की। उन्होंने अकर्मण्यता, भाग्यवाद, विघटन आदि के विरोध में प्रबल आवाज उठाई और देश की दलित तथा विघटित सामाजिक व्यवस्था को झकझोर दिया। यही कारण है कि उनको भारतीय के इतिहास में आधुनिक युग का अग्रदूत कहा जाता है।

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* राजा राममोहन राय के सामाजिक सुधार Raja Ram Mohan Roy Social Reforms 

राजा राममोहन राय एक महान् समाज सुधारक थे। उस समय के समाज में दुर्भाग्य से अनेक बुराइयाँ घर कर गई थीं। इनके सामाजिक विचार बड़े महत्वपूर्ण हैं जो कि इस प्रकार हैं-

मूर्ति पूजा का विरोध क्यों करते थे राजा राम मोहन रॉय –

सर्वप्रथम राजा राममोहन राय का ध्यान मूर्ति पूजा की ओर गया। मूर्ति पूजा के आरम्भ होने का कारण यह था कि ब्रह्म के प्रत्यक्ष ज्ञान को असम्भव जानकार मूर्ति-पूजा का सहारा लिया गया था और उसे आवश्यक समझा गया था, परन्तु उसके उत्तर में राजा राममोहन राय का उपनिषद सम्मत तर्क यह था कि केवल आत्मा की पूजा करनी चाहिए। उनका कहना था कि उपनिषद किसी भी दशा में असम्भव बात करने की प्रेरणा नहीं देते। मूर्ति- पूजा के स्थान पर शुद्ध पूजा का उन्होंने सदैव समर्थन किया है। श्रद्धा, विचार के प्रति उचित है मूर्ति के प्रति श्रद्धा से कोई लाभ नहीं।

जातिगत संकीर्णताओं का विरोध-

राजा राममोहन राय ने जातीय भेदभाव और ऊँच- नीच की भावना का डटकर विरोध किया। उनका निश्चित मत था कि जाति के आधार पर किसी को श्रेष्ठ अथवा हेय मानना पूर्णतया अनुचित और अन्यायपूर्ण है। कोई व्यक्ति अपनी उपलब्धियों, गुणों एवं मान्यताओं के आधार पर ही श्रेष्ठ माना जाना चाहिए।

परम्पराओं के अन्धानुकरण का विरोध-

प्रायः सभी समाजों में जो कोई कार्य एक समय किसी विशेष परिस्थिति में हो जाता है, आगे भी बिना विचार किए लोग तद्नुसार आचरण करने लगते हैं। यही है अन्धानुकरण, हिन्दू समाज भी इस सम्बन्ध में कोई अपवाद नहीं था परन्तु विवेक के आधार पर जो श्रद्धा है, वही उचित होती है। जो लोग अन्धे होकर श्रद्धा करते हैं उनमें विवेक रहता ही नहीं और फलतः वे सही रूप से कार्य करने से सफल नहीं हो पाते। राजाराम मोहन राय को यह तर्क एकदम सत्य प्रतीत हुआ था और इसी तर्क पर उनका अन्धानुकरण का विरोध आधारित था।

नारी के उत्थान का समर्थन- 

जहाँ नारी की पूजा हो वहाँ देवताओं का वास बताया गया है परन्तु क्रूर और कामुक मुसलमानों के भारत में आने के उपरान्त यहाँ नारी की दशा हीन हो गई। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को बन्द कराने व अन्य कुरीतियों हेतु आन्दोलन छेड्ने का निश्चय कर लिया। राजा राममोहन राय ने निष्ठापूर्वक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए आन्दोलन को दिनों दिन तीव्रतर किया। अन्त में 4 दिसम्बर, 1829 ई० को वे अपने प्रयास में सफल हुए। लार्ड विलियम बैंटिक की सरकार ने सती प्रथा को अवैध तथा गैर कानूनी घोषित कर दिया। केवल सती प्रथा को रुकवाने तक ही राजा राममोहन राय ने अपने कार्य की इतिश्री नहीं समझ ली। कुछ काल से समाज में नारी की जो हीन दशा हो गई थी. उसे सुधारने के लिए। वे सतत् प्रयत्नशील रहे। उन्होंने स्त्री शिक्षा और विधवा विवाह का समर्थन किया। साथ ही पति की सम्पत्ति में स्त्रियों के अधिकार को भी उन्होंने पूर्ण समर्थन दिया। उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण करके ही देश का पुनर्जागरण आगे बढ़ा।

राजा राममोहन राय के राजनीतिक विचार Political Thought of Raja Ram Mohan Roy 

स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार-

राजा राममोहन राय का मत था कि राजनीतिक क्षेत्र में पुरुष एवम् नारी के अधिकार समान होने चाहिए। राजा राममोहन राय का स्वतंत्रता प्रेम का दृष्टिकोण संकुचित नहीं था। उन्हें केवल भारत की स्वतंत्रता ही प्रिय नहीं थी। मनुष्य मात्र को स्वतंत्र देखकर वे प्रसन्न होते थे। जब स्पेन में संवैधानिक शासन की स्थापना के समाचार मिले तो राजा राममोहन राय इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने कलकत्ता के टाउनहाल में एक सार्वजनिक भोज दिया और जब यह समाचार मिला कि नेपल्स के नागरिकों पर शासक ने प्रतिबन्ध लगा दिए हैं तो उन्हें बड़ी खिन्नता हुई। यह स्वतंत्रता-प्रेम राजा राममोहन राय की राजनीति का सार्वभौमिक अंग था। स्वतंत्रता के प्रति उन्हें गहरा लगाव था । अन्तर्राष्ट्रीय स्वतंत्रता ही उनको मुख्य रूप से प्रिय थी और इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए वे आत्मानुशासन को मुख्य साधन मानते थे। वे व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के लिए स्वतंत्रता को आवश्यक एवम् महत्वपूर्ण मानते थे।

प्रेस तथा विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार-

राजा राममोहन राय विचारों की अभिव्यक्ति तथा प्रेस की स्वतंत्रता को पूर्ण रूप से आवश्यक मानते थे। उन्हें इन पर कोई बन्धन स्वीकार नहीं था। प्रथम बंगाल पत्र ‘संवाद कौमुदी’ का सम्पादन 1819 ई० में स्वयं उन्होंने ही किया था। तदन्तर 1822 ई० में उन्होंने ‘मिरात-उल-अखबार’ नाम से एक फारसी पत्र का प्रकाशन भी आरम्भ किया। इस प्रकार हम देखते हैं कि राम मोहन राय ने भारतीय पत्रकारिता की नींव डाली।

प्रशासन सम्बन्धी विचार

राजा राममोहन राय के मन में समाज सुधार एवम् पुनर्जागरण से सम्बन्धित कई विचार थे परन्तु वे मानते थे कि केवल एक व्यक्ति ही सब कुछ नहीं कर सकता। भले ही उसे समाज का पूरा सहयोग भी प्राप्त हो। वे उदारवादी व्यक्ति थे और इस पर बल देते थे कि व्यक्ति को स्वतंत्रता एवं अन्य आवश्यक अधिकार मिलने चाहिए परन्तु वे इस सब कार्य में राज्य की सक्रियता को आवश्यक समझते थे। वे चाहते थे कि राज्य ऐसे कार्य करे जिनसे नागरिकों के जीवन में आने वाली बाधायें दूर हों। तभी जनसाधारण का जीवन सुखी बन सकता था। उन्होंने 1831 ई० में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के “बोर्ड ऑफ कन्ट्रोल” के समक्ष प्रशासन सुधार की दृष्टि से निम्नलिखित प्रस्ताव रखे-

1. शिक्षित भारतीयों को प्रशासनिक तथा ऊँचे-ऊँचे पदों पर नियुक्त किया जाये। 2. न्याय और प्रशासन विभागों को अलग-अलग रखा जाय।

3. सदर दीवानी अदालत को ‘हैवियस कार्पस रिट’ देने का अधिकार देकर नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा की जाय।

4. न्याय विभाग में पंचायत और जूरी पद्धति का प्रयोग किया जाय।

5. जमींदारों से लगान की दरें कम कराई जावें।

6. किसानों को कृषि सुधार की शिक्षा दी जाय और उनको भूमि पर मौरूसी अधिकार प्रदान किया जाए।
7. भारत को कुछ मामलों में स्वतन्त्रता प्रदान की जाय।

8. फारसी के स्थान पर अंग्रेजी को राजभाषा बनाया जाय। 9. भारत सरकार का प्रशासनिक व्यय कम किया जाय।

10. नया कानून बनाने से पूर्व जनमत को जान लिया जाय।

न्याय एवं समानता सम्बन्धी विचार-

राजा राममोहन राय पहले तो अंग्रेजों के न्याय का विरोध ही करते थे परन्तु कुछ समय पश्चात् वे उससे प्रभावित हुए और उसका समर्थन करने लगे परन्तु इस विचार परिवर्तन का यह अर्थ नहीं था कि वे पूर्ण रूप से अंग्रेजों के न्याय को स्वीकार कर बैठे थे। 1827 ई० का जूरी एक्ट ही पक्षपात पूर्ण था एवम् भेदभाव को बढ़ावा देता था। इसके अनुसार किसी हिन्दू या मुसलमान जज को किसी ईसाई के मुकदमें को सुनने के अधिकार से वंचित किया गया था। राजा राममोहन राय ने इस ऐक्ट का विरोध किया। उन्होंने इसके विरोध में 5 जून, 1829 ई० को ब्रिटिश संसद के समक्ष एक स्मृति पत्र प्रस्तुत किया। प्रवर समिति की प्रार्थना पर राय ने प्रचलित न्यायिक और न्यायव्यवस्था की विवेचना की। अपने सुझाव एवं प्रस्ताव प्रस्तुत किये तथा अंग्रेजी शासन के अनुचित नियमों की आलोचना की।

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