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मनु स्मृति के राजनीतिक एवं सामाजिक विचार

प्राचीन भारत के उपलब्ध साहित्य में वेदों के पश्चात् मनुस्मृति का स्थान सबसे उच्चकोटि का है। इसको मनुस्मृति, मनुसंहिता, मानव धर्मशास्त्र आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। इस ग्रंथ को प्राचीन व्यवस्था में आधारभूत माना जाता है। याज्ञवल्क्य स्मृति, मनुस्मृति और महाभारत इन सभी का प्राचीन राजनीतिक व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण स्थान है। है। मनु के इस ग्रंथ का घटना काल 200 ई० पू० से 300 ई० पू० तक का निर्धारित किया जाता है। मनु ने समाज धर्म और राजनीति के अन्दर एकरूपता स्थापित करने के लिए इस बारह अध्याय वाले ग्रन्थ की रचना की। इसके अन्दर सदाचार, धर्मोपदेश, वर्णाश्रम, पद्धति का विस्तृत विवरण आदि सभी बातें विस्तार से मिलती हैं। इस ग्रन्थ के सातवें एवं आठवें अध्याय राजनीति के विचार से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं जिनमें कि राजा की नीतियों (साम, दाम, दण्ड और भेद) का विस्तार से विवेचन किया गया है।

मनु के इस ग्रंथ का समकालीन समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। तत्त्कालीन समाज में वर्णाश्रम पद्धति का खूब पालन हुआ है। इस व्यवस्था ने समाज में बहुत हद तक चारों वर्णों के अन्तर्गत सन्तुलन उत्पन्न किया। मनु का ग्रंथ संसार की मूलभूत चीज ‘धर्म’ को लेकर आगे चलता है, ‘धारणात् धर्म’ (जो धारण किया जाये वही धर्म है) इस प्रकार इस क्षण भंगुर एवं निराधार जगत् में धर्म ही एक आधार है, वास्तव में मनु ने धर्म, समाज एवं राज्य में एकरूपता स्थापित करने की दृष्टि से अनेक नियमों की स्थापना की थी।

राजपद या राजा- मनस्मृति के अनुसार सृष्टि रचना के पश्चात् प्रजा की रक्षा करना परम आवश्यक था। अतः मनु ने राजधर्म को प्रतिपादित करते समय यह अनुभव किया संसार के कल्यार्थ एक ऐसे योग्य व्यक्ति की आवश्यकता है जो शक्तिशाली दण्ड का सम्यक प्रयोग करने में समर्थवान हो। दण्ड का प्रयोग करने हेतु जिस व्यक्ति का निर्माण किया गया, उसको मनु ने ‘राजा’ की संज्ञा से सम्बोधित किया है। यह व्यक्ति प्रजा को रंजन करने वाला होता था और उसके पद को ‘राजपद’ से सम्बोधित किया गया।

राजा की सर्वोच्च सत्ता – मनु के अनुसार राजा एक सर्वोच्च सत्ता है। राजा को वैदिक काल के प्रारम्भ में दैवी गुणों से सम्पन्न नहीं माना जाता था, उसका पद पूर्णरूपेण लौकिक था। मनु के अनुसार राजा को क्षमा, दया, क्रोध, युद्ध और मैत्री समयानुसार करनी पड़ती थी। वह देश, काल आदि का ठीक प्रकार से अध्ययन करके अपराधी को उसके अपराध के अनुसार दण्ड देता था। जो अग्नि को कुचलता है, अग्नि उसे दाह कर देती है, पर जो व्यक्ति नीतिविरुद्ध आचरण करते हैं, उसके कुल को, धनसहित, राजा समाप्त (नष्ट) कर सकता है ऐसा मनु का मत था।

दण्ड- मनु ने राज्य में ‘दण्ड’ को सर्वोच्च स्थान प्रदान किया है। उनके अनुसार दण्ड ही वास्तव में राजा है क्योंकि केवल दण्ड की सहायता से ही राजा समाज में शांति स्थापित करता। है। राजा का कार्य है कि वह सज्जन व्यक्तियों की रक्षा करे और दुष्ट व्यक्तियों का दमन करे। दण्डनीति के भली-भाँति उपयोग किये जाने से राज्य का सर्वदा अभ्युदय होता है और अनुचित प्रयोग से राजा तक स्वयं नष्ट हो जाता है।

राजा का उदय- मनु ने राजा की उत्पत्ति में दैवी सिद्धान्त को प्रतिपादित किया है। मनु के अनुसार राज्य के विभिन्न 7 अंग एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। सम्पूर्ण संसार के कल्याण के लिए ईश्वर ने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण और कुबेर आदि देवताओं के अंश को लेकर राजा का सृजन किया।

राजा को चाहिए कि वह सर्वत्र पूजनीय कार्यों को करे। मनु का कथन है कि राजा को दुष्टों का दमन करने वाला अवश्य होना चाहिये।

राजा के लिए अपेक्षित गुण- राजा को व्यसनों से रहित एवं संयमी होना चाहिये। उसे सदा ही अपनी इन्द्रियों के ऊपर विजय प्राप्त करने वाला होना चाहिए। राजा को चाहिए कि काम और क्रोध के द्वारा उत्पन्न होने वाले अनेक व्यसनों के अन्तर्गत वह न फँसे। राजा के मोहाशक्त हो जाने पर प्रजाहित की तो बात ही क्या है, राजा स्वयं अपने को भूल जाता है-

राजा को चाहिए कि वह प्रजा के कल्याण की कामना अपने हृदय में रखे। उसको इस प्रकार के कोई कार्य न करने चाहिए कि प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी प्रकार से प्रजा का अहित हो सके। इस प्रकार मनु के अनुसार राजा स्वयं अपने गुणों के आधार पर ही उन्नति या अवनति करता जाता है। जो राजा प्रजा के सुख को अपना सुख माने और प्रजा के दुःख से दुःखी हो, ऐसा राजा उत्तम होता है।

धर्म एवं दण्ड – मनु के अनुसार राजनीति में दण्डनीति और धर्म का विशेष स्थान है। धर्म वह तीक्ष्ण नेत्र है जो कि राजा को को सत्-असत् का ज्ञान कराया करती है और इसके द्वारा राजा को अपने कर्तव्य का ज्ञान होता है। दूसरी मुख्य वस्तु दण्ड है जिसके द्वारा राजा को अपना कार्य करने की शक्ति प्राप्त होती है। दण्ड के बिना धर्म स्थापित नहीं हो सकता है।

राजा की सहायता के लिए, उसके उत्पन्न होने से पूर्व ही ईश्वर ने दण्ड का सृजन किया था। दण्ड के द्वारा ही, प्राणिमात्र को उनके मार्ग पर रखने में राजा सफलता प्राप्त कर पाता है। राजा को चाहिए कि वह देश तथा काल आदि तथ्यों का सम्यक् विवेचन करने के उपरान्त ही दण्ड का उपयोग करे। दण्ड के उचित प्रकार से प्रयुक्त होने ने से से प्रजा प्रसन्न होती है और अनुचित होने पर उसमें असंतोष फैलता है। राजा के लिए इस महान् तेज वाले दण्ड का उपयोग करना कठिन होता है। धर्म से विचलित राजा का यही दण्ड सर्वनाश कर डालता है। दण्ड ही सारी प्रजा को आशा प्रदान करता तथा वही सबकी रक्षा करता है। जब सब निद्रामग्न होते हैं तब दण्ड जागता है।

दण्ड को धारण करने वाले व्यक्ति पवित्रात्मा एवं सत्यप्रतिज्ञ होने चाहिए।

राजा के कर्त्तव्य- मनु के अनुसार राजा को धन, धान्य, सेना, जल आदि से परिपूर्ण दुर्ग में सुरक्षित निवास करना चाहिए। राजा स्वजातीय गुणसम्पन्न कुलीन नारी से विवाह करे। उसे धर्मपूर्वक यज्ञ व दान आदि का आयोजन करना चाहिए। उसे प्रजा से पिता के समान न्यायपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। प्रजा से उचित कर वसूल करना चाहिए। सेना, दुर्ग, कोष व राज्य संचालन के लिए विश्वस्त, योग्य व विवेकशील व्यक्तियों की नियुक्ति करनी चाहिए तथा स्वयं समस्त कार्य का निरीक्षण करते रहना चाहिए। युद्ध संचालन में शिथिल नहीं होना चाहिए तथा राज्य विस्तार के लिए समस्त साधन जुटाना चाहिए। मंत्रियों के साथ सद्व्यवहार करना चाहिए तथा गुप्तचर व्यवस्था सुदृढ़ रखनी चाहिए। अन्त में मनु कहता है कि र राजा बगुले के समान अर्थचिन्तन करें। सिंह के स समान पराक्रम प्रदर्शित करे, भेड़िये के समान शत्रु को नष्ट करे और शत्रु द्वारा घिर जाने पर खरगोश के समान उसके घेरे से निकलने में सक्षम हो।

मन्त्रिपरिषद्- मनु के अनुसार राजा को राज्य कार्य में मंत्रियों से सलाह अवश्य लेनी चाहिए। मंत्री दण्ड प्रयोग में आगे जाते हैं अतः उनकी नियुक्ति में विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। केवल गुणवान व्यक्ति ही इस पद पर नियुक्त किये जाने चाहिए। मंत्रियों के गुणों के विषय में मनु ने कहा है-

श्रेष्ठ गुणों से युक्त व्यक्ति जो परीक्षा में उत्तीर्ण हो, केवल वह मंत्री के पद पर नियुक्त किये जाने चाहिए। मनु ने कहा है कि राजा को इन भिन्न-भिन्न विभागों के मंत्रियों से एकत्रित तथा पृथक् -पृथक् रूप से सलाह लेनी चाहिए।

मंत्रिपरिषद्- की नियुक्ति के विषय में अनेकानेक सिद्धान्त प्रचलित थे जैसे कि परम्परागत सिद्धांत, योग्यता सिद्धांत, परीक्षा सिद्धांत और उद्देश्य आदि का सिद्धांत। उक्त सिद्धांत के आधार पर ही मंत्रियों का निर्वाचन किया जाता था।

मंत्रियों की योग्यता का परीक्षण करके उनके विशेष योग्यता वाले कार्य को किया जाता था। मंत्रियों को वही कार्य सौंपा जाता था जिनको कि वे सुगमतापूर्वक कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त राजा को योग्य राजदूतों की भी नियुक्त करना चाहिए। मनु ने उनकी योग्यताओं आदि का वर्णन किया है।

दुर्ग रचना- मनु ने प्रत्येक विषय जो कि राजनीति से सम्बन्धित था उस पर प्रकाश डाला। उन्होंने दुर्ग निर्माण के विषय में कहा है कि राजा को उस स्थान पर दुर्ग को निर्मित कराना चाहिए जहाँ पर पृथ्वी, जल, धन-धान्य एवं वनों से परिपूरित हो तथा जहाँ शत्रु सुगमता से आक्रमण न कर सके। 

ग्राम की सीमा का निर्धारण- मनुस्मृति में गाँव की सीमा को निर्धारित करने के विषय में कहा गया है-

पीपल, बट, पलाश, सेम और साल आदि वृक्षों से या अन्य दूध वाले वृक्षों से गाँव की सीमा को अंकित करना चाहिए। गाँव की सीमायें इस प्रकार बनाई जानी चाहिए कि वे शीघ्र नष्ट न होने पायें।

न्याय- मनुस्मृति में न्याय व धर्म का सुन्दर उल्लेख मिलता है।

मनु के अनुसार- वेद, स्मृति, साधुओं का आचरण और आत्म-संतुष्टि चीजें धर्म के आधार के रूप में मनु ने बतलाई। इसके अतिरिक्त उस समय एक धर्म सभा भी होती थी जिसमें अध्यक्ष पद पर आसीन होकर पंडितों से परामर्श लेता था और उसी के आधार पर वह न्याय करता था। राजा मनु के विचार से न्याय सदैव धर्म के आधार पर किया जाना चाहिए। उनका कथन है कि जो राजा या सभासद न्याय करते समय धर्म का आश्रय लेकर कार्य नहीं करता, उसका स्वयं का अधर्म के द्वारा नाश हो जाता है। सभासद को स्वयं धर्मज्ञ होना चाहिए एवं किसी विषय पर निर्णय देते समय उसको उस विषय का निष्पक्ष रूप में पहले से अध्ययन कर लेना चाहिए, न्याय में पक्षपात करने वाला राजा पाप का भागी होता है।

धर्मासन पर बैठने वाले व्यक्ति को कुशलतापूर्वक न्याय का कार्य करना चाहिए। मनु ने न्याय के विषय में साक्षियों पर काफी जोर दिया है। प्रत्येक न्यायकर्ता को न्याय में साक्षियों को महत्त्व देना चाहिए। यह साक्षी लिखित, मुक्त और साक्ष्य प्रमाण के रूप में हो सकती है। इसके अतिरिक्त दिव्य प्रमाण को भी ध्यान में रखना चाहिए। वैसे तो राजा को प्रमाण पर जोर देना ही चाहिए पर यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि असत्य, कोढ़ी, सेवकों एवं शत्रुओं के प्रमाणों को मान्यता नहीं प्रदान की जानी चाहिए। 

राजा को काफी सोच समझकर दण्ड देना चाहिए। मनुस्मृति में तो यहाँ तक कहा गया है कि यदि राजा अनुचित दण्ड देता है तो उसे स्वयं दण्डित किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के अभियोग जैसा कि अवैध क्रय-विक्रय, संविदाभंग, स्वामी- भूत्य के झगड़े आदि का उल्लेख मनु ने किया है जो कि सामान्यतः न्यायालय में आकर उपस्थित होते थे।

राजकीय कर और कोष- राजा को राज्य के विकासार्थ अर्थ की आवश्यकता होती है। इस प्रकार कोष ही राजा के विकास का आधार बन जाता है। मनु के अनुसार राज्य की सप्त प्रकृतियों में से एक कोष भी है। राजा कोष की वृद्धि के लिए जनता से अनेकानेक कर प्राप्त करता था। राजा को करों का अधिक बोझ जनता पर नहीं डालना चाहिए। अधिक करों से जनता शोषित होकर असन्तुष्ट हो जाती है। मनु के अनुसार राजा को भूमि कर, दण्ड से प्राप्त आय, नदी, नावों, नालों आदि पर कर लगाने तथा व्यापारियों से करों के रूप में धन लेना चाहिए। इसके अतिरिक्त बिक्री की वस्तुएँ जैसे-धान्य, सुवर्ण, मधु, घी, सुगन्धित पदार्थ, फल-फूल, खाल और मिट्टी के बर्तन आदि चीजों पर भी उचित कर लिया जाना चाहिए।

अन्य देशों से सम्बन्ध (पर राष्ट्र सम्बन्ध)- मनु ने जिन अन्तर्राष्ट्रीय तत्त्वों का वर्णन किया है, राजा को उन्हीं, आसन, यान, सन्धि, विग्रह, दूधभाव और संश्रय का सहारा लेकर अन्य देशों से सम्बन्ध स्थापित करना चाहिए। 

इन्हीं गुणों को कौटिल्य ने भी ग्राह्य माना है। मनु के विचार से राजा को आवश्यकतानुसार युद्ध का भी आश्रय ले लेना चाहिए। मनु का विचार था कि ‘शत्रु राज्य’ को हर प्रकार से पीड़ित कर दिया जाना चाहिए। उसके सभी साधनों एवं जलवायु तक को दूषित कर दिया जाना चाहिए। मनु के अनुसार शत्रु राज्य को समूल नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। राजा को चाहिए कि अपने पराजित राजा के स्थान पर किसी व्यक्ति को शक्ति को आसीन करके उससे मैत्री सम्बन्ध स्थापित कर ले। इस प्रकार मनु ने राजनीति के हर एक अंग पर अपने विचार प्रकट किये जो कि यह सिद्ध करता है कि मनु एक अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी विचारक थे, जिनकी पैनी दृष्टि में मानव से सम्बन्धित सामाजिक संस्थाओं तथा राजनीतिक संस्थाओं का कोई भी पहलू अछूता न रहा। 

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