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बौद्ध धर्म के राजनीतिक सिद्धान्त

बौद्ध धर्म एवं राजनीतिक चिन्तन

छठीं शताब्दी ई० पू० में धार्मिक क्रान्ति के परिणाम स्वरूप जैन धर्म के समान एक अन्य धर्म का उदय हुआ जिसे बौद्ध धर्म के नाम से जाना जाता है। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध थे। महात्मा बुद्ध ने तत्तकालीन ब्राह्मण धर्म की व्यवस्था पर अपने विचारों से कुठाराघात किया तथा जाति व्यवस्था के विरोध तथा नैतिक मूल्यों पर जोर देते हुए नूतन सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया।

बौद्ध धर्म के राजनीतिक सिद्धान्त

महात्मा गौतम बुद्ध ने अपने समस्त उपदेश मानव जाति के कल्याण हेतु सर में दिये। उनके उपदेश क्रियात्मक सरल एवं सुबोध भाषा एवं व्यावहारिक हैं।। त्रिपिटक के मूल अंश में बौद्ध धर्म के सिद्धान्त प्राप्त होते है जिससे विदित होता है कि उनका सम्पूर्ण सिद्धान्त नैतिकता पर आधारित है जिसे हम निम्नलिखित रूप में देख सकते हैं-

चार आर्य सत्य-बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य निम्नांकित हैं-

(क) दुःख- सम्पूर्ण मानव जाति दुःखी है। चारों ओर दुःख है। महात्मा बुद्ध का कथन है कि “जन्म भी दुःख है, वृद्धावस्था भी दुःख है, रोग भी दुःख है, म मरण भी दुःख ब है, अप्रिय मिलन भी दुःख है, प्रिय के वियोग में दुःख है, इच्छित वस्तु की प्राप्ति व अप्राप्ति भी दुःख है।”

(ख) दुःख समुदय- यह सम्पूर्ण संसार जो दुःखी है इसका कारण क्या है? महात्मा बुद्ध का कधन है कि दुःख का मूल कारण तृष्णा है और इसी तृष्णा के कारण मनुष्य अनेक प्रकार के दुष्कर कार्य करता है।

(ग) दुःख निरोध- जिस प्रकार से यह संसार दुःखी है, दुःख का कारण तृष्णा है। उसी प्रकार दुःख से छुटकारा भी सम्भव है। तृष्णा का अन्त हो जाने पर मनुष्य का दुःख दूर हो जाता है और उसे निर्वाण प्राप्त हो जाता है।

(घ) दुःख निरोध मार्ग- दुःख दूर करने के लिये महात्मा गौतम बुद्ध ने अष्टांगिक मार्ग भी बताया है। सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वाणी, सम्यक् कर्मान्त, सम्यक् आजीव, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति एवं सम्यक् समाधि। इनके द्वारा मनुष्य अपने जीवन में सफल हो सकता है और उसे निर्वाण की प्राप्ति हो सकती है।

चार स्मृति प्रस्थान

(क) काया में कायानुपश्यना शरीर के प्रत्येक अंग को जागरूक रखना चाहिये। 

(ख) वेदना में वेदनानुपश्यना-सुख में बहुत अधिक प्रफुल्लित नहीं होना चाहिये और न दुःख में अधिक दुःखी होना चाहिये बल्कि दुःख और सुख दोनों में समान रहना चाहिये। 

(ग) चित्त में चित्तानुपश्यना-चित्त में ईर्ष्या-द्वेष नहीं आना चाहिये। 

(घ) धर्म में धर्मानुपश्यना-मन, कर्म, वचन से शुद्ध होकर धर्म का कार्य किया जा सकता है।

चार सम्यक् प्रधान

(क) प्रथम प्रधान-खराब संस्कारों को उत्पन्न न होने देना चाहिये।

(ख) द्वितीय प्रधान-यदि किसी कारणवश खराब संस्कार उत्पन्न भी हो जाये तो उनका विनाश कर देना चाहिये।

(ग) तृतीय प्रधान-अच्छे संस्कारों को हमेशा उत्पन्न करना चाहिये।

(घ) चतुर्थ प्रधान-जो अच्छे संस्कार उत्पन्न हो गये हों उनकी रक्षा करनी चाहिये।

चार ऋद्धिपाद-बौद्ध धर्म में चार ऋद्धिपाद बताये गये हैं-

1. धन्य, 2. बीच, 3. विमर्श, 4. चित्त।

पाँच इन्द्रियाँ-बौद्ध धर्म में निम्नांकित 5 इन्द्रियों पर अत्यधिक बल दिया गया है-

(क) श्रद्धा बल,

(ख) वीर्य बल,

(ग) स्मृति बल,

(घ) समाधि बल,

(ङ) प्रज्ञा बल।

सात बोध्यांग-बोध्यांग दो शब्दों के योग से बना है-बोधित्त्व (ज्ञान) अंग अर्थात् वे अंग जो ज्ञान प्राप्ति में सहायक होते हैं। यह निम्न हैं-

(क) स्मृति,

(ख) धर्म विषय,

(ग) वीर्य,

(घ) प्रीति,

(ङ) प्रश्रृब्धि,

(च) समाधि,

(छ) उपेक्षा।

अष्टांगिक मार्ग

(1) सम्यक् दृष्टि, (2) सम्यक् संकल्प, (3) सम्यक् वाणी, (4) सम्यक् कर्मान्त, (5) सम्यक् आजीव, (6) सम्यक् व्यायाम, (7) सम्यक् स्मृति (8) सम्यक् समाधि। इस प्रकार चार स्मृति प्रस्थान, चार सम्यक् प्रधान, चार ऋद्धिपाद, पाँच इंद्रिय, पाँच बल, सात बोध्यांग एवं अष्टांगिक मार्ग, ये महात्मा बुद्ध के कुल सैंतीस सिद्धान्त हैं। 

इसके अलावा गौतम बुद्ध ने अपने उपदेशों में आचरण पर विशेष, बल दिया है। उन्होंने दस आचरण का पालन आवश्यक बताया है-

(1) अहिंसा 

(2) सत्य  

(3) अस्तेय (चोरी न करना) 

(4) अपरिग्रह 

(5) ब्रह्मचर्य

(6) नृत्य-गान का त्याग, 

(7) सुगन्धित पदार्थों का त्याग 

(8) असमय भोजन का त्याग 

(9) कोमल शैय्या का त्याग 

(10) कंचन एवं कामिनी का त्याग। 

अतः बौद्ध धर्म के अन्य सिद्धान्तों में कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास तथा निर्वाण प्राप्ति पर भी बल दिया गया है। 

बौद्ध धर्म अपनी जन्म भूमि से प्रायः लुप्त प्राय हो गया है फिर भी इस धर्म ने भारतीय जीवन में राजनीतिक एवं सामाजिक एकता स्थापित करने के अतिरिक्त भारतीय धर्म एवं संस्कृति को सुदूर देशों तक पहुँचाया। आज भी यह विश्व के कई देशों में महत्त्वपूर्ण धर्म के रूप प्रतिष्ठित है।

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