Test Examine

महाभारत के अनुसार राज्य की उत्पत्ति

राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में महाभारत में यह कहा गया है कि सृष्टि के बहुत दिनों तक लोग सद् कार्य में लीन रहते थे तथा शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे। परन्तु धीरे-धीरे लोग काम, दीर्घ लोभ, मोह एवं स्वार्थ के वशीभूत होने लगे। उन्हें कृत्याकृत तथा धर्माधर्म का ज्ञान न रहा। तब देवता भयभीत होकर पितामह ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने यह सुनकर एक शास्त्र की रचना की जिसमें धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया था। इस नीति को भी उन्होंने दण्ड नीति का नाम दिया। इस ग्रन्थ की रचना के पश्चात् उन्होंने अपने मानस-पुत्र विरजिस को राजा बनाया, जनता ने उसे अपना राजा स्वीकार किया। छठी पीढी में वेणु राजा बना, जो धर्मानुकूल आचरण नहीं करता था। ब्राह्मणों तथा ऋषियों ने उसे मार दिया और उसके पुत्र पृथु को राजा बनाया। पृथु से समस्त जनता खुश थी। उसने पृथ्वी का दोहन किया तथा अपनी जनता का धर्मपूर्वक पालन किया।

शान्ति पर्व के 67वें अध्याय में राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो वर्णन मिलता है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि इस युग में राज्य की उत्पत्ति अनुबंध अथवा सहमति के द्वारा द्वारा हुई थी। काफी समय तक अराजकता की स्थिति रहने के पश्चात् राज्य की उत्पत्ति हुई। लोगों की प्रार्थना पर ब्रह्मा ने मनु को राजा बनाया। जनता ने मनु को सहर्ष राजा स्वीकार कर लिया।

राज्य का स्वरूप-

महाभारत में राज्य के सात अंग आत्मा, सेवक, कोष, दण्ड, मित्र, जनपद एवं पुर बताये गए हैं। । राजा का कर्त्तव्य है कि वह सप्तांग युक्त राज्य का धर्मपूर्वक प्रतिपालन करे। । राज्य के उद्देश्य के बारे में भीष्म ने कहा है कि “राजा (राज्य) का ध्येय प्रजा की रक्षा करना तथा सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखना है।”

महाभारत में अराजक- तत्त्व का भी वर्णन आया है। अराजक तत्त्व से तात्पर्य उस राज्य से है जो शासक से शून्य हो परन्तु ऐसे राज्य को राज्य की संज्ञा देना भी उचित नहीं है। महाभारत में भी रामायण काल की भाँति राज्य को सप्तांगी कहा गया है। शांतिपर्व में कहा गया है कि राजा को राज्य के सातों अंगों, आत्मा, सेवक, कोष, दण्ड, मित्र, जनपद और पुर का प्रतिपालन करना चाहिए। इसके अतिरिक्त महाभारत में राजतंत्रीय राज्यों का वर्णन है। इस युग में छोटे तथा बड़े दोनों ही प्रकार के राज्य पाये जाते थे। बड़े-बड़े राजाओं को सम्राट कहा जाता था। छोटे आकार वाले राज्यों की संख्या अधिक थी तथा ये सम्राटों को कर दिया करते थे।

महाभारत में गण- राज्यों का भी उल्लेख मिलता है। कई गण-राज्यों का संयुक्त शासन ‘संघात गण’ भी होता था। अन्धक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज गण-राज्य थे जिन्होंने अपने ‘संघात गण’ में संगठित किया था। इसके प्रमुख कृष्ण थे।

राजपद उत्तराधिकार-

महाभारत युग से पूर्व ही राजा का पद आनुवांशिक बन गया था तथापि उसमें प्रजा की अनुमति लेनी होती थी। राजा शान्तनु तथा महाराज ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्रों की अपेक्षा अपने कनिष्ठ पुत्रों को राज्य का उत्तराधिकारी बनाया था। यह अपवाद थे अन्यथा सामान्य रूप से ज्येष्ठ पुत्र ही गद्दी पर बैठता था। यदि ज्येष्ठ पुत्र किसी कारणवश गद्दी पर बैठने में अयोग्य होता था जो अन्य पुत्रों को गद्दी पर बिठाया जाता था। कहीं-कहीं ऐसा भी वर्णन है कि जनता की अनुमति से राजा का चयन किया जाता था।

राजा की प्रकृति-

शांतिपर्व में राजा की अत्यधिक महत्ता बताने के पश्चात् महाभारत रचनाकार की लेखनी राजा की प्रकृति बतलाने के लिए भी चली। उनके मतानुसार, “राजा कोई साधारण मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य नहीं है। वह एक पवित्र देवात्मा है जो दण्डनीति का ज्ञान ग्रहण करके पृथ्वी पर आता है। वह इन्द्र है, यम है, धर्म है। विभिन्न अवसरों पर विभिन्न रूप धारण करने वाला है। कभी वह अग्नि हो जाता है, कभी आदित्य, कभी मृत्यु, कभी वैसरावण और कभी यम।’ राजा की आज्ञा का उल्लंघन हो जाने पर, मनुष्य राजा के उपहारों से वंचित हो जाता है। जो मनुष्य राजाज्ञा मानता है वह इस लोक तथा परलोक में भी लाभों को प्राप्त करता है। राजा की आज्ञा ही सर्वोच्च है। “जिस प्रकार वैदिक बलिदानों में अग्निहोत्र सर्वप्रथम है, जैसे कि मंत्रों में गायत्री मंत्र सर्वप्रथम है तथा जिस प्रकार जलाशयों में समुद्र प्रथम होता है (उसी प्रकार) मनुष्यों में राजा प्रथम होता है।” इस प्रकार से राजा की प्रकृति बतलायी गयी है तथा महाभारत में उसकी महिमा का बखान किया गया है। 

राजा के गुण-

राजा को संयमी होना चाहिए। राजा की तुलना बसन्त ऋतु के सूर्य से की गई है अर्थात् समतापी होना चाहिए। राजा को समय पड़ने पर वज्र की भाँति कठोर तथा अबोध बालक की भाँति नम्र होना आवश्यक है। अपने सुखों की, वैभव की जनहित हेतु तिलांजलि देने वाला राजा ही सच्चे अर्थों में उत्तम राजा होता है। राजा को निष्पक्ष, न्यायी, सत्यवादी होना चाहिए। महाभारत में स्पष्ट लिखा हुआ है कि यदि राजा की नीति में सत्यता तथा संरक्षण का अभाव होता है तो वह आज्ञा मनवाने का अधिकार खो देता है। एक राजा को सच्चाई के साथ जनता की एक दिन भी रक्षा करने के लिए जो पुरस्कार प्राप्त होते हैं वह दस हजार वर्षों तक टिकता है।

राजा के कार्य-

राजा को अपने कर्त्तव्यों की पूर्ति भली-भाँति करना अनिवार्य है। तभी सम्पूर्ण राज्य में शान्ति एवं व्यवस्था कायम रह सकती है और राज्य की बाह्य आक्रमण से सुरक्षा हो सकती है। राजा के धर्म का पालन करने पर ही समस्त प्रजाजन धर्म का पालन करते रहते हैं। राजा का प्रथम कार्य एवं कर्त्तव्य है सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखना, वर्णाश्रम धर्म का पालन कराना तथा स्वधर्म में मनुष्य को प्रवृत्त रखना। अगर सभी स्वधर्म तथा स्वकर्त्तव्यों का पालन करते रहते हैं हैं तो परिणाम यह होता है कि स्वर्णिम युग या सतयुग तथा इस प्रयास में तीन चौथाई पूर्णता पर त्रेता युग तथा इसकी आधी पूर्णता पर द्वापर युग का आगमन होता है किन्तु राजा के अकर्त्तव्यशील तथा अन्यायी होने पर वर्णशंकर उत्पन्न होते हैं एवं कलियुग आ जाता है। राजा का द्वितीय कार्य संरक्षण करना है जो व्यक्ति भूखे हों उनके लिए भोजन का प्रबन्ध राज्य की ओर से किया जाए, जो व्यक्ति गरीब हों आर्थिक सहायता उन्हें राज्य दे। राज्य को जनता के भौतिक विकास की ओर भी ध्यान देना चाहिए। राजा को चाहिए कि वह राज्य में कृषि का उत्पादन बढ़ावे। राज्य कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बने ताकि प्रजाजनों में सुखसमृद्धि स्थापित हो कृषि को केवल वर्षा पर ही आधारित जानकर उसे असिंचित नहीं छोड़ देना चाहिए। अपितु, वे स्वयं बड़े-बड़े तालाब तथा झीलें, नहरें आदि खुदवायें ताकि सिंचाई का पूर्ण प्रबन्ध हो। कृषकों को बीज आदि भी राजा को देने चाहिए। अकाल के समय राहत देने के लिए राजा को तुरन्त कदम उठाना चाहिए। राजा को चौड़ी सड़कें बनवानी चाहिए। राजा को दान करते रहना चाहिए। राजा को अस्पताल खुलवाने चाहिए। उसे वैश्याघरों, जुआघरों, मयखानों आदि को अपने नियंत्रण में रखना चाहिए। महाभारत में इस प्रकार के जनहित कार्यों की विस्तृत रूपरेखा हमें मिलती है, जिसे राजा द्वारा राज्य के सामान्य जनों के हितार्थ करना चाहिए। इसमें सन्देह नहीं है कि प्राचीन हिन्दू विचारकों ने महाभारत में जिस राज्य की कल्पना की थी वह लोक- कल्याणकारी राज्य कहा जा सकता है।

कर प्रणाली-

अर्थ को राज्य की नाड़ी बतलाया गया है। महाभारत में कहा गया है कि जनता को राजा से जो संरक्षण प्रदान होता है उसके प्रत्युत्तर में उसे (जनता को) राजा को ‘कर’ देना चाहिए। राजा कर के रूप में 1/6 भूमिकर यानि उपज का 1/6 भाग ले सकता था। इसके अतिरिक्त व्यापारियों को भी कर देने पड़ते थे। राज्य की आय बढ़ाने के उद्देश्य से सम्पन्न व्यक्तियों को अतिरिक्त कर भी देना पड़ता था। करों को वसूल करते समय राजा को इस तथ्य पर अवश्य नजर रखनी चाहिए कि जनता करों के बोझ को वहन करने में समर्थ भी है अथवा नहीं। महाभारत में कहा गया है कि राजा को बछड़े के समान ही राष्ट्र का दोहन करना चाहिए। महाभारत के 18वें अध्याय में विभिन्न प्रकार के करों का वर्णन मिलता है इसे-पशु कर, आकर कर (खनिज पदार्थों पर), नदी व जल स्थलों पर यात्री कर आदि नामों से पुकारा जाता था।

वैदेशिक नीति-

महाभारत में वैदेशिक नीति का एकदम स्वतंत्र विचार हम पाते हैं। अन्तर्राज्यीय सम्बन्धों में नैतिकता के सिद्धान्तों की अवहेलना की जा सकती थी। आत्मरक्षा तथा दूसरे के क्षेत्र पर अधिकार जमाना यह दो सिद्धान्त ही महाभारतकालीन वैदेशिक नीति के आधार को स्पष्ट करते हैं। शत्रु को शक्तिहीन करने हेतु साम, दाम, दण्ड-भेद, छल कपट सभी उपायों का प्रयोग कर लेना चाहिए। परास्त शत्रु हमेशा जागृत रहता है, अतः शत्रु को समूल नष्ट करना ही उत्तम है। 

युद्ध के नियम-

महाभारत काल में युद्ध के कुछ निश्चित नियम थे जिनके पालन न करने पर योद्धा निन्दा का पात्र बनता था। रथवान रथवान से, पैदल पैदल से, गदाधारी गदाधारी से ही युद्ध करता था। सायंकाल होते ही युद्ध बन्द कर दिया जाता था। निहत्थे व भागते हुए पर वार करना नियम के विरुद्ध था। गदा युद्ध में भीम द्वारा नियमों का उल्लंघन करने पर बलराम ने भीम की निन्दा की थी इसके साथ-साथ युद्ध जीतने के लिए छल-कपट का प्रयोग भी किया जाने लगा था। श्री कृष्ण की प्रेरणा से गुरु द्रोणाचार्य, जयद्रथ, दुर्योधन व अभिमन्यु आदि का वध इसके उदाहरण हैं।

न्याय व्यवस्था-

महाभारत में भीष्म कहते हैं कि ‘जहाँ विधि का शासन होता है वहाँ मनुष्य सुखी रहता है।’ विधि के चार स्रोतों का वर्णन मिलता है-देव सम्मत, आर्य सम्मत, लोक सम्मत व संस्था सम्मत। महाभारत के अनुसार जो राजा इन विधियों का पालन करते हैं उसे चारों आश्रमों से पुण्य प्राप्त होता है। वास्तव में चारों विधियों के पालन का अर्थ धर्म पालन करना था। दण्ड का स्वरूप आर्थिक दण्ड व शारीरिक दण्ड दोनों थे। राजा का सर्वाधिक व महत्त्वपूर्ण कार्य था कि वह न्याय दान करे तथा दण्ड व्यवस्था द्वारा राज्य में शान्ति स्थापित करे।

राजा एवं प्रजा का सम्बन्ध महाभारत में राजा एवं प्रजा का सम्बन्ध पिता व पुत्र के समान था। आजकल के समान प्रजा को स्वतंत्र अधिकार प्राप्त नहीं थे। राजा के कर्तव्य में ही प्रजा के अधिकार निहित थे। प्रजा की शासन में कोई आवाज नहीं थी परन्तु इसके बावजूद प्रजा अत्याचारी राजा का ज्यादा संगठित रूप से विरोध करती थी।

राजा का महत्त्व –

महाभारत में शांतिपर्व तथा यत्र-तत्र राजा को अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जिससे यह सिद्ध होता है कि महाभारत काल में राजा का पद अत्यन्त गरिमापूर्ण था। इसमें कहा गया है कि केवल राजा ही समस्त पृथ्वी पर शांति स्थापित कर सकता है। राजा के अभाव से शक्तिशाली जनों द्वारा निर्बल को लूट लिया जाता है तथा नष्ट कर दिया जाता है। इस प्रकार जंगल का कानून या मत्स्य-न्याय वाली स्थिति पुनः लागू हो जाती है। राजाविहीन राज्य में स्त्री, पुत्र, सम्पत्ति और परिवार असुरक्षित रहता है ऐसे राज्य में दुर्जनों द्वारा सज्जनों का जीवन कठिन बना दिया जाता है। अतः महाभारत में त में इस बात पर बल दिया गया है कि पहले अच्छे राजा का वरण करो फिर स्त्री का वरण करना चाहिए तत्पश्चात् ही सम्पत्ति और धन कमाना चाहिए।

राजनीतिक नैतिकता-

महाभारत काल में राजनीतिक नैतिकता, राज्य व्यवस्था और शासन प्रबन्ध एवं स्वाराज के लिए अत्यधिक आवश्यक और महत्त्वपूर्ण होती थी। महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार राजा ही प्राणियों का रक्षक व विनाशक होता था। ‘चरित्रेण राजन्ते इति राजा’ की मान्यता के अनुसार राजा में चारित्रिक गुणों का रहना आवश्यक माना जाता था। इन्हीं चारित्रिक गुणों की असाधारणता के कारण राजा को देव समान समझा जाता था। महाभारत के शंतिपर्व में राजनीति तथा मानवीय अस्वार का उपदेश दिया गया है। वस्तुतः महाभारत काल में राजवंशों के लिए जिस शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था थी, उसमें नैतिक शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था। तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था में गुरु से आशा की जाती थी कि वह शिष्य के नैतिक बल में वृद्धि करे, निष्पक्ष भावना से कार्य करे और अपने आचरण एवं व्यवहार से त्याग तथा नैतिक आदर्शों का पालन करे। महाभारत के अनुसार स्वयं गुरु को भी पवित्रता, नैतिकता और सदाचार के नियमों का पालन करना आवश्यक बताया गया है।

महाभारत काल में राजनीतिक दृष्टि से नैतिकता और सदाचार का सम्बन्ध राजा के मूल कार्यों से जुड़ा हुआ था। महाभारत में नैतिक आदर्शों और सत्य के पालन के लिए ‘भीष्म की प्रतिज्ञा’, युधिष्ठिर की अनेक स्थानों पर पराजय और कर्तव्य पालन के फलस्वरूप अनेक विपत्तियों का सामना करना पड़ा। इस सन्दर्भ में यह कहना समीचीन होगा कि सम्पूर्ण महाभारत का युद्ध पांडवों द्वारा नैतिक नियमों के पालन और सत्य की रक्षा करने का ही परिणाम था। नैतिक मान्यता के आधार पर ही महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य आदि ने कौरव- सेना की ओर से युद्ध किया। 

महाभारत काल का रण-

विधान भी पूर्णतः नैतिक था। क्षत्रिय यशोपार्जन, वीरगति तथा अपने स्वामी और अपने नेता के लिए युद्ध करते थे। तत्कालीन समय में युद्धकालीन कुछ नैतिक व्यवस्थाएँ थीं। पतित, कायर, स्त्री, स्त्रीनामधेय, नपुंसक, पराजित या घायल व्यक्ति, शरणागत, शस्त्रहीन, कवचहीन आदि पर प्रहार नहीं किया जाता था। युद्ध प्रायः दिन में होते थे एवं सूर्यास्त के बाद युद्ध बन्द कर दिया जाता था। नियमानुसार युद्ध की घोषणा होती थी। आक्रमण या प्रहार करने के पूर्व विरोधी अथवा शत्रु को सूचित करना नैतिक मान्यता थी। विश्वास देकर धोखा करना अथवा घबराहट में डालकर प्रहार करना अथवा छलना अनुचित माना जाता था परन्तु शत्रु-प्रदेश को नष्ट करना अथवा उसे अग्नि से भस्म कर देना नीतिपूर्ण माना जाता था। इसी प्रकार शत्रु की सेना में फूट डालना अथवा द्वेष फैलाकर उसकी शक्ति क्षीण कर देना राजनीति मानी जाती थी। कभी-कभी कूटनीति और छलनीति से भी शत्रु का दमन किया जाता था। महाभारत काल में युद्ध में पराजित व्यक्तिओं को कभी-कभी दास के रूप ४में परिणित कर दिया जाता था। यदि कोई विजेता अपने विरोधी या पराजित व्यक्तियों को कैद कर लेता था, तो वह एक निश्चित अवधि तक उसका दास रहता था। यदि विजेता ऐसे व्यक्ति को अपनी दासता से मुक्त कर देता था तो वह उसे गुरु या पिता के समान ही मानता था।

महाभारत में युद्ध में दुर्योधन ने अनीति, छल-कपट और कूटनीति आदि से अपने शत्रु पांडवों को पराजित करने और उनका सर्वनाश करने के लिए अनेक प्रयास किये। कृष्ण नै द्रोणाचार्य का वध कराने के लिए सत्यवादी युधिष्ठिर से मिथ्या भाषण कराया, कौरवों के सैनिकों तथा सेना अधिकारियों ने छल-कपट से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध किया। कूटनीति, छलनीति, अनीति के प्रयोग के बाद भी योद्धाओं और सैनिकों के कुछ युद्ध- सम्बन्धी नैतिक नियम थे जिन्हें तत्कालीन योद्धा पूर्णतः मानते और उसका पालन करते तो क्षत्रिय युद्ध करना अपना जातिगत कर्त्तव्य समझते थे और युद्धभूमि में युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त करना श्रेष्ठ धर्म मानते थे।

Leave a comment