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नेपोलियन फ्रांसीसी क्रान्ति का शिशु था।’ इस कथन का तर्क सहित। वर्णन।

नेपोलियन क्रान्ति पुत्र अथवा उसका विनाशक नेपोलियन ने एक बार कहा था कि “मैं ही क्रान्ति है” (I am the revolution) तथा दूसरे अवसर पर पुनः उसने कहा था कि “मैंने उसे नष्ट कर दिया।” (I have destroyed it)। येदि उसके कार्यों का मूल्यांकन किया जाय तो उसकी दोनों बातें सत्य प्रतीत होती हैं। वह क्रान्ति की उपज क्रान्ति का पुत्र था। साथ ही वह क्रान्ति विरोधी भी था, प्रतिक्रान्ति का प्रतीक था तथा क्रान्ति के विरुद्ध होने वाली प्रतिक्रिया का वास्तविक उत्तराधिकारी था।

स्वतन्त्रता, समानता तथा बन्धुघुत्त्व फ्रांसीसी क्रान्ति के ये तीन प्रमुख नारे थे। इनमें से नेपोलियन सीमित अर्थ में केवल ‘समानता’ का प्रतीक था। वह एक साधारण परिवार में पैदा हुआ था। यदि क्रान्ति नहीं त नहीं हुई रहती, समानता के सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं हुआ रहता, फ्रांस मैं सामंती पद्धति ही प्रचलित रहती तो सभी योग्यताओं के बावजूद भी नेपोलियन उस पद पर नहीं पहुँचता जिस पद पर (सम्राट के पद पर) वह 1804 में पहुँच गया था। उसका यह दावा था कि ” मैंने फ्रांस के राजमुकुट को धूल में पड़ा हुआ पाया और तलवार की नोक से उठाकर अपने सिर पर रख लिया।” बिल्कुल ठीक था। वास्तविकता भी यही है कि वह सम्राट इसलिए नहीं बन सका कि वह किसी सम्राट का पुत्र था अथवा ऐसे किसी परिवार में पैदा हुआ हु था, वरन् वह सम्राट इसलिए बन गया था कि उसमें योग्यता थी और सबसे बड़ा सुअवसर यह कि फ्रांस में ‘समानता’ कायम हो चुकी थी। वह समानता के सिद्धान्त का ज्वलंत प्रतीक था और इस दृष्टिकोण से उसे क्रान्ति पुत्र कहा जा सकता है।

लेकिन साथ ही उसे प्रतिक्रान्तिकारी या क्रान्ति को नष्ट करने वाला भी कहा जाता है। ‘समानता’ के अलावा फ्रांसीसी क्रान्ति के दो और नारे थे-स्वतन्त्रता या बन्धुत्त्व और नेपोलियन ने इन दोनों सिद्धान्तों का हनन किया।

उसने अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए सभी को राजनीतिक स्वतन्त्रता से वंचित कर दिया। समाचार पत्रों पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाए गए, विरोधियों को बिना उन पर मुकदमा चलाए जेल में बन्द कर दिया गया, तथा जनता को अभी तक जो स्वतन्त्रता प्राप्त थी वह सब छीन ली गयी। इस स्वतन्त्रता के नाम पर फ्रांस में कितने ही व्यक्तियों का खून हुआ। कांस्युलेट के समय जो संविधान बना उसमें वैयक्तिक स्वतन्त्रता को बड़ी खूबी के साथ समाप्त किया गया। वह स्वयं कहा करता था कि फ्रांस के लोगों ने स्वतन्त्रता से अधिक समानता को महत्त्व दिया है। अपनी विदेश नीति के फलस्वरूप उसने फ्रांस का गौरव बढ़ाया और देश के अन्दर शान्ति और व्यवस्था स्थापित की। जनता ये ही दोनों बातें चाहती थी। इसीलिए उसके स्वतन्त्रता छीनने के अधिकार को क्षमा कर दिया गया। अपने को ‘क्रान्तिपुत्र’ कहने वाले नेपोलियन ने मानवाधिकार की घोषणा की एक प्रमुख धारा को नष्ट करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया।

1810 के लगभग उसने फ्रांस को एक पुलिस राज्य का स्वरूप दे दिया था। उस समय एक कानून लागू किया जिसके किया जिसके अनुसार राज्य परिषद् के आदेश पर किसी भी व्यक्ति को बिना मुकद्मा चलाए जेल में बंद किया जा सकता था। थामसन के अनुसार यह पुरातन व्यवस्था के लातरे द लाशें को फिर से चालू करने के समान था। उसने दो सेंसर नियुक्त किए जिनकी पूर्व स्वीकृति के बिना फ्रांस में किसी भी पुस्तक का प्रकाशन, नाट्यशाला में अभिनय, पुस्तकों तथा समाचार-पत्रों का मुद्रण नहीं हो सकता था।

पुरातन व्यवस्था के अन्तर्गत फ्रांस में स्वायत्त शासन के स्थानीय शासकों का सर्वथा अभाव था सारे देश पर केन्द्रीय सरकार का पूर्ण नियन्त्रण था। क्रान्तिकारियों ने इस व्यवस्था की नष्ट कर दिया था और यह निश्चय किया था कि प्रान्तों, जिलों तथा कम्यूनों के अधिकारियों का निर्वाचन जनता करे। किन्तु स्वतन्त्रतावादी नेपोलियन ने। इस व्यवस्था का अन्त कर दिया और राज्य के सभी अधिकारियों की नियुक्ति कौंसल तथा बाद में सम्राट द्वारा होने लगी। सारा अधिकार एक व्यक्ति में केन्द्रित हो गया। सम्राट के रूप में जिस दिन नेपोलियन का राज्याभिषेक हुआ उस दिन को पेरिस की दीवारों पर एक पोस्टर छपा मिला जिसमें लिखा था, “फ्रांसीसी क्रान्ति का अन्तिम प्रतिनिधित्त्व निर्धन कोसिवान परिवार के लिए।” नेपोलियन के इस इस दावे पर कि वह क्रान्ति का सच्चा उत्तराधिकारी था, यह सबसे अच्छी टिप्पणी थी।

नेपोलियन एक निरंकुश शासक था। वस्तुतः जनता की ‘सार्वभौम सत्ता’ तथा ‘सामान्य इच्छा’ के सिद्धान्तों में नेपोलियन का कतई विश्वास नहीं था। इन सम्बन्धों में उसकी धारणा ही भिन्न थी। वह जनता की सार्वभौमिकता की दुहाई अवश्य देता था, लेकिन वह यह मानता था कि सार्वभौमिकता वाल्टेयर के ईश्वर के समान है।

सम्राट बनकर नेपोलियन ने क्रान्ति की अन्त्येष्टि ही कर डाली। फ्रांस में गणराज्य की स्थापना क्रान्ति की बहुत बड़ी सफलता थी और इस महान् सफलता का नेपोलियन ने अपनी महत्त्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिए सफाया कर डाला। क्या रॉसपियर और दांते जैसे देशभक्तों ने इसलिए अपनी जान दे दी थी कि कोर्सिका का यह नवयुवक गणराज्य का अन्त कर बर्बो राजवंश के स्थान पर अपना राजवंश कायम करेगा। इस दृष्टि से नेपोलियन घोर प्रतिक्रियावादर्दी था। विश्व बन्धुत्त्व क्रान्ति का तीसरा सिद्धान्त था। क्रान्ति के आरम्भ में ही कहा गया था कि “फ्रांसीसी राष्ट्र प्रादेशिक लाभों के लिए युद्ध का सहारा लेने के सिद्धान्त का परित्याग करता है और संसार के सभी लोगों के साथ भाई-चारे के सिद्धान्त पर आधारित जीवन बसर करने का ऐलान करता है।” लेकिन नेपोलियन ने क्या किया जब तक फ्रांस का अधिपतित् रहा, यूरोप को युद्ध में फसाये रहा। वेस्टफेलिया की संधि के पश्चात् यूरोप में इस सिद्धान्त को मान्यता मिल गई थी कि कोई भी राज्य किसी दूसरे सार्वभौमिक राज्य के के मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा। (यद्यपि नेपोलियन से पहले ही शुरू किए जा चुके थे लेकिन ये अकारण नहीं थे-क्रान्ति को सुरक्षित रखने के लिए ये आवश्यक थे। युद्ध शुरू करने की जिम्मेदारी हम क्रान्तिकारियों पर नहीं मढ़ सकते)। फ्रांस की जनता अपने राजा की हत्या कर रही थी, अपनी शासन पद्धति बदल रही थी, इसमें आस्ट्रिया के सम्राट को हस्तक्षेप करने का क्या अधिकार था। फिलनिप्स की घोषणा या बुन्सविक के ड्यूक की घोषणा किसी भी राष्ट्र को उत्तेजित कर सकते थे। यदि फ्रांस की क्रान्ति से यूरोप के निरंकुशतन्त्र को भय था तो उसके विरोध में उपाय करने का उन्हें पूरा अधिकार था लेकिन अपनी सीमाओं के अन्दर ही बाहर नहीं।

नेपोलियन द्वारा किया जाने वाला युद्ध प्रथमतः साम्राज्यवादी था जिसका उद्देश्य लई चौदहवें की नीति का अनुसरण करके फ्रांस को एक प्राकृतिक सीमा प्रदान करना था। 

द्वितीयत यह नेपोलियन की गलत महत्त्वाकाँक्षा का परिणाम भी था। वह विश्व-विजयी बनने का स्वप्न भी देखा करता था तथा आधुनिक युग का सीजर व सिकन्दर बनना चाहता था। 1802 में नेपोलियन ने कहा था “फ्रांस या तो यूरोप का सर्वश्रेष्ठ देश बनेगा अथवा धूल में मिल जायेगा। मैं तभी तक शान्ति बनाये रखूंगा जब तक मेरे पड़ोसी शान्ति बनाये रखेंगे। परन्तु मुझे विश्वास है कि शस्त्रों पर जंग लगने के पहले ही वह मुझे उन्हें धारण करने के लिए विवश करेंगे। पुराने राजतन्त्रों एवं नवीन गणतन्त्रों में सदा संघर्ष चलता रहेगा। इन परिस्थितियों में मेरे लिए सभी संधि युद्ध विराम का समझौता मात्र मेरा विश्वास है। है कि इस पद से मैं सदा संघर्ष करता है। रहूंगा। नेपोलियन के मन में स्थायी अथवा स्थिर शान्ति का विच विचार कभी आया ही नहीं।

यद्यपि कि जहां-जहां नेपोलियन ने अपना अधिकार किया वहां सुधार भी किया गया जिससे यूरोप की जनता को कुछ लाभ हुआ। सामन्ती प्रथा का अन्त, तथा अर्द्धदासों का उद्धार किया गया। इन स्थानों पर नेपोलियन का स्वागत मुक्तिदाता के रूप में हुआ। इन सबके बावजूद भी जनता की भावनाओं तथा क्रान्ति के सिद्धान्तों को कुचला गया। समानता के सिद्धान्त तका भी अक्षरशः पालन नहीं किया गया। अपने ही परिवार के अयोग्य

व्यक्तियों को ऊंचे-ऊंचे पद दिए गए। उसके भाई राजा बने तथा बहनें रानी। विधान संहिता में । विधान-सा उसने पूंजीपतियों और सर्वहारा मजदूर वर्ग की स्थिति में विभेद किया। उसने अपने पुराने सेनापतियों, साथियों तथा सगे सम्बन्धियों को उच्च पदों पर नियुक्त किया। गणराज्य के सेनापति मार्शल बना दिए गए। महलों को सुन्दर चित्रों, मूर्तियों तथा विदेशों से प्राप्त कलाकृतियों से सजाया गया। दरबार में उपस्थित रहने वाले अधिकारियों तथा सेवकों को सुन्दर पोशाके पहनने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस प्रकार उसने बूर्वो वंश का ऐश्वर्य और वैभव पुनः स्थापित करने का प्रयत्न किया। इस सन्दर्भ में ग्रांट एवं एवं टेम्परेल ने ठीक ही ही लिखा है- “नेपोलियन क्रान्ति का शिशु था, परन्तु उसने उन आन्दोलनों और उद्देश्यों को जिससे उसका जन्म हुआ था उलट दिया था। वह क्रान्ति का पुत्र था परन्तु ऐसा पुत्र जिसने अपनी माता (क्रान्ति) की हत्या कर दी थी।”

इस प्रकार यह निष्कर्ष निकलता है कि सीमित अर्थ में नेपोलियन क्रान्ति की उपज था, लेकिन व्यापक अर्थ में वह एक बहुत बड़ा प्रतिक्रान्तिवादी या प्रतिक्रियावादी था। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उसने सामन्तवाद को एकदम नष्ट कर दिया, जनसाधारण में प्रतिभा और योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया था, मध्यवर्ग को सामाजिक और नागरिक एकता प्रदान की थी। उसने किसानों से उन जमीनों को वापस नहीं लिया जो क्रान्ति के समय उन्हें कुलीनों से मिली थी। ये सारे कार्य उसने क्रान्ति के कार्यों को जीवित रखने के लिए ही किए थे। अतएव ये दोनों कथन कि नेपोलियन ने पुरातून व्यवस्था को संगठित किया तथा क्रान्ति को सुद्ध और सुरक्षित किया जो सत्य प्रतीत होता है।

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