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मानवतावाद पर नेहरू के विचार

नेहरू जी एक सच्चे राजनीतिज्ञ थे, लेकिन हाब्स, लॉक और रूसों की भांति वे राजनीतिक दार्शनिक बनने का कभी प्रयास भी नहीं किया। डॉ० वी० पी० वर्मा ने नेहरू के सम्बन्ध में लिखा है-“हम उन्हें (नेहरू जी) को एक सामाजिक आदर्शवादी कह सकते हैं जो सामान्य व्यक्ति की भावनाओं के लिए लोकतन्त्रीय दृष्टिकोण में आस्था रखता है।”

नेहरू की मानवतावाद सम्बन्धी अवधारणा (विचार)

नेहरू जी लोकतन्त्र समाजवाद एवं मानवतावाद को समिश्रण करना चाहते थे वे हिंसा से घृणा करते थे और महात्मा गाँधी अहिंसा वादी अवधारणा के समर्थक थे। वे एक ऐसे आदर्शवादी थे जो नैतिक मूल्यों पर अत्यधिक जोर देते थे। वे समाज में पीड़ित, शोषित एवं दलित वर्ग के पूर्ण हितैषी थे। मलीन बस्तियों को देखकर उन्हें आश्चर्य होता था कि इसमें कैसे मनुष्य कीड़े-मकोड़े के रूप में रहता है। प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० राधाकृष्णन् जी ने उनके सन्दर्भ में कहा था कि-एक मानव के रूप में नेहरू जी के चिन्तन में सुकुमारता, भावना की अद्वितीय कोमलता और मानव एवं उदार प्रवृत्तियों का अद्भुत मिश्रण था। विपन्न एवं हताष व्यक्ति के प्रति उनके अन्तःकरण में गहनतम सहानुभूति उमड़ती है।”

नेहरू जी आजीवन उच्चतर आदर्श के हेतु संघर्ष करते रहे। जनता के सामने उन्होंने एक उच्चादर्श प्रस्तुत किया। उनका सन्देश था कि “मनुष्य को व्यावहारिक और अनुभव प्रधान नैतिक और सामाजिक, परोपकारी और मानवतावादी होना चाहिए।” नेहरू जी का यह विश्वास था कि वर्तमान समय में सर्वोत्तम आदर्श यदि कोई हो सकता है तो वह मानवतावाद है। इस विषय में महात्म गाँधी और ठाकुर रवीन्द्र से उन्हें बड़ी प्रेरणा मिली थी। 

मृत्युशैय्या पर पड़े टैगोर के निम्नलिखित शब्द उन पर गहरा प्रभाव छोड़ गये थे। वे शब्द हैं-“जब मैं चारों ओर देखता हूँ तो मुझे एक गौरवपूर्ण सत्यता के गिरते हुए ध्वंसावशेष दिखायी पड़ते हैं मानो वे निरर्थकता का एक विशाल ढेर हैं, फिर भी मैं मनुष्य में विश्वास खो देने का घोर पाप नहीं करूँगा बल्कि मैं तो यही आशा करता हूँ कि जब प्रलय गुजर जायेगी और सेवा तथा बलिदान की भावना से वातावरण निर्मल हो जाएगा, तो इतिहास में एक नया अध्याय खुलेगा। नहीं…….. मनुष्य में विश्वास न हो सकता है। ईश्वर की सत्ता में हम इन्कार कर सकते हैं, परन्तु यदि मनुष्य की सत्ता से इन्कार कर दें और इस प्रकार प्रत्येक वस्तु को निरर्थक बना दें, तो हमारे लिए आशा ही क्या रह जायेगी?”

नेहरू जी मानव के गौरव में विश्वास रखते थे, इसलिए अनुकूल परिस्थितियों के पश्चात् भी वे एक तानाशाह बन जाने के प्रलोभन से अपने को बचा सके। वे पक्के उदारवादी, मानवतावाद के मूल्यों के प्रति आस्था रखते थे। वे लोकतान्त्रिक समाजवाद का निर्माण करना चाहते थे। उनका साम्यवाद के हिंसक एवं अनैतिक साधनों के प्रति कभी आकर्षण नही रहा। उन्हें साम्यवादी तानाशाही से पूर्ण घृणा थी। मानव की स्वतंत्रता, समानता, भ्रातृत्त्व भाव को वह किसी कीमत पर छोड़ना पसन्द नहीं करते थे। उन्हें अछूतों से अत्यन्त सहानुभूति थी। पीड़ित एवं तड़पती मानवता तथा तिरस्कृत अछूतों को देखकर उनके हृदय में अपार पीड़ा थी। वे कल्पनावादी न थे। उन्होंने अपने मानवतावाद का परिचय अपने सेवावृत्ति जीवन के द्वारा दिया। डॉ० राधाकृष्णन उनके सन्दर्भ में कहा था कि “उन्होंने जनता के जीवन में ही अपना जीवन खपा दिया था और उनके जीवन को संघर्ष समर्थ तथा सम्पूर्ण बनाने का प्रयत्न किया था। वह महान् आत्मा थी और इसकी महानता की बात को समझने में है कि व्यक्ति केवल अपने लिये ही पैदा नहीं होता, बल्कि वे अपने पड़ोसी, अपनी जनता के लिए भी होता है, वे केवल देश के महान् मुक्तिदाताओं में ही नहीं थे, बल्कि महान् निर्माताओं में भी थे। उन्होंने अपने जीवन में हम लोगों की राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न नहीं किया, उन्होंने कभी अपने आराम का ध्यान नहीं किया तथा अपनी सम्पत्ति एवं धन का भी कभी ख्याल नहीं किया।”

नेहरू जी मानवता के प्रतीक थे। वे जब तक जीवित रहे उनका मानवता से गहरा लगाव बना रहा, वे किसी धर्म विशेष में विश्वास नहीं करते थे पर मानवता को वह सबसे बड़ा धर्म बताते थे। वे भारत के प्रधानमंत्री थे पर मानवों का कल्याण सदैव ध्यान में रहता था। वे जानते थे कि “मानव अपने में अपूर्ण है। उसे आत्मा और स्वतंत्रता के जीवन में पदार्पण करना है जिसका अभी निर्माण हो रहा है तथा उसे अपना और निर्माण करना है। उनके लिए मनुष्य जीवन आध्यात्मिक है जो निर्बाध, अपराजय, सक्रिय, उद्‌बुद्ध और दैवी शक्ति से परिचालित है।”

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