Test Examine

कौटिल्य के राजनीतिक विचारों की विवेचना

कौटिल्य भारतीय राजनीतिक चिन्तन के इतिहास में एक महान् विभूति के रूप में जाने जाते हैं। वे विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न, तीक्ष्ण बुद्धि युक्त, वेदों व मंत्रों के जानकार, तपस्वी, स्वाभिमानी, दूरदर्शी व्यक्तित्त्व के स्वामी थे। इसके साथ ही वे एक महान् कूटनीतिज्ञ विचारक थे। भारतीय राजनीतिक चिन्तन परम्परा के अन्तर्गत उन्हें वही स्थान प्राप्त है, जो पाश्चात्य राजनीतिक चिन्तन जगत् में अरस्तू का है। उनका ग्रन्थ अर्थशास्त्र विश्व में अतुलनीय है, जिसमें अपने पूर्ववर्ती विचारकों के यत्र-तत्र बिखरे हुए चिन्तन को एकत्रित कर श्रेणीबद्ध रूप दिया। कौटिल्य के पूर्ववर्ती विचारकों ने राजनीतिक विचारों का वर्णन-विवेचन धर्म और नैतिकता के साथ किया, किन्तु कौटिल्य ऐसे प्रथम विचारक हैं जिन्होंने राजनीति को नैतिकता की परिधि से बाहर लाकर उसकी विवेचना प्रस्तुत की। उसमें राजनीतिक सिद्धान्तों के आवरण के साथ-साथ व्यावहारिक रूप प्रदान किया। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित प्रत्येक सिद्धान्त को राजनीति की प्रयोगशाला में परखा जा सकता है।

कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ मूलरूप से राजनीति का ग्रंथ है। इसकी विषय-वस्तु में जिन अन्य बातों को समाहित किया गया है वे सभी राजनीति से सम्बद्ध होने के कारण ही इसमें स्थान पा सकीं। अर्थशास्त्र के प्रमुख राजनैतिक विचार निम्नलिखित हैं-

राज्य की उत्पत्ति

कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति सम्बन्ध में सामाजिक समझौते के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। एक स्थान पर उन्होंने बताया है कि राज्य से पूर्व समाज में मत्स्य-न्याय का प्रभाव था। जिस तरह से बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है उसी तरह समाज के सबल पुरुष निर्बल पुरुषों के विनाश में हमेशा सक्रिय रहा करते थे। इस व्यवस्था से तंग आकर लोगों ने विवस्वान् के पुत्र मनु को अपना राजा बनाया। ये लोग उसे अपने अन्न की उपज का छठां भाग, व्यापार द्वारा प्राप्त धन का दसवाँ भाग और सोने की आय का कुछ भाग कर के रूप में देने लगे। मनु को राजा नियुक्त करते समय इन लोगों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि कर वे लोग राजा को तभी देंगे जबकि वह उनके योग- क्षेम की समुचित व्यवस्था करता रहेगा। इस प्रकार राज्य की उत्पत्ति एक सामाजिक समझौते का परिणाम थी कौटिल्य ने हॉब्स द्वारा वर्णित प्राकृतिक अवस्था के लक्षणों को मान्यता दी है। वे उस काल में मनुष्य के जीवन को अस्थिर, अरक्षित, यातनायुक्त एवं पशुवत् मानते हैं। इस युग का व्यक्ति स्वार्थ साधन से एक-दूसरे के विनाश में लगा हुआ था। प्राकृतिक अवस्था से तंग होकर उसने राज्य का निर्माण किया तथा राजा को स्पष्ट रूप से बता दिया कि यदि वह प्रजा के योग-क्षेम की व्यवस्था के प्रति अपने कर्तव्य से विमुख हो जायेगा तो उसे लोग धन और जन की सहायता देना बन्द कर देंगे और वह इस प्रकार उनका राजा नहीं रहेगा। कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति के अपने इस सिद्धान्त में लोक वित्त पर जनता का अधिकार माना। उनके अनुसार राजा द्वारा बिना प्रजा की पूर्व अनुमति के उस पर कर नहीं लगाये जा सकते थे, वह धन एकत्रित करने और उसे खर्च करने का अधिकार प्रजा में निहित मानता था। इस प्रकार कौटिल्य राजा की निरंकुशता पर एक महत्त्वपूर्ण प्रतिबन्ध लगाते हैं जो उनकी सूझबूझ को प्रदर्शित करता है। 

राज्य का स्वरूप तथा उसकी प्रकृति

राज्य का स्वरूप अथवा प्रकृति-राष्ट्रीय एकता तथा देश की समृद्धि एवं सुदृढ़ता के लिए कौटिल्य शक्तिशाली राजतंत्र की व्यवस्था में विश्वास करते थे। वह गणतंत्रीय और जनतन्त्रीय प्रणाली को घातक मानते थे। उनके अनुसार राज्य का स्वरूप विशुद्ध राजतंत्रीय होना चाहिए। उन्होंने राजा पर जो धार्मिक शासनिक तथा अन्य प्रतिबन्ध लगाये हैं, उनके विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि यह राज्य के निरंकुश नहीं अपितु प्रतिबन्धित राजतंत्रीय स्वरूप में विश्वास करते थे। जन कल्याणकारी कार्यों को अधिक महत्त्व देने का कारण उनका राजतंत्रीय राज्य एक लोक अर्थात् जन कल्याणकारी राज्य है। कुल मिलाकर हम यही कह सकते हैं कि कौटिल्य राज्य के प्रतिबन्धित एवं लोक कल्याणकारी राजतंत्रीय स्वरूप में विश्वास करते हैं। जहाँ तक राज्य की प्रकृति का सवाल है, वह उसे एक जीवित सावयव की तरह मानते हैं। उसके अभिन्न अंगों के मध्य सामंजस्य तथा उसके संतुलित विकास पर राज्य की प्रगति और प्रजा के हितों की रक्षा हो सकेगी।

राज्य का सप्तांग सिद्धान्त

राज्य का सावयव स्वरूप या सप्तांग सिद्धान्त-

कौटिल्य राज्य के सावयवी रूप में विश्वास करते हैं। उनके मतानुसार राज्य की सात प्रकृतियाँ हैं-स्वामी (राजा) अमात्य, जनपद (राष्ट्र) दुर्ग, कोष, दण्ड (बल) और मित्र। “स्वाम्पमाल्य जनपद दुर्ग कोष दण्ड मित्राणी प्रकृत्यः” कौटिल्य अर्थशास्त्र इन प्रकृतियों को कौटिल्य ने राज्य के अवयव या सप्तांग कहकर सम्बोधित किया है। इस प्रकार उनके मतानुसार राज्य के इस सावयवी रूप का वर्णन कौटिल्य से पूर्व भी प्राप्त होता है। ऋग्वेद में इस विचार की थोड़ी झलक मिलती है। यजुर्वेद में बताया गया है कि विराट पुरुष की पीठ राष्ट्र है और उसके उदर, कन्धे, कटि, जंघा तथा घुटने आदि सभी उसकी प्रजा है। यद्यपि महाभारत के भीष्म और मनु ने भी राज्य के सावयवी रूप का वर्णन किया है, किन्तु उनमें कौटिल्य जैसी स्पष्टता नहीं है। कौटिल्य द्वारा वर्णित राज्य का सावयवी रूप कोई विदेशी आयात नहीं है वरन् यह शुद्धरूप से भारतीय है। इसका उद्गम स्थान ऋग्वेद का पुरुषसूक्त है। कौटिल्य के इस सिद्धान्त की तुलना पाश्चात्य सिद्धान्त से करना अनुचित होगा।

सप्तांग सिद्धान्त-

 कौटिल्य ने राज्य की विभिन्न प्रकृतियों के गुणों और उनके सापेक्ष महत्त्व का भी विभिन्न अध्यायों में विवेचन किया है। उसने राजा को सर्वप्रथम स्थान दिया है, वह राज्य की सर्वोच्च कार्यपालिका का मूर्तरूप है। उसके बाद मंत्री या अमात्य आते हैं जो राजा को आवश्यक परामर्श देते हैं और शासन का संचालन करते हैं। दुर्ग राज्य की प्रतिरक्षा का प्रमुख साधन होते हैं और उनके द्वारा ही जनता की सुरक्षा सम्भव है। जनपद अथवा भू-भाग राज्य के अस्तित्त्व का भौतिक आधार है। राज्य व जनता के सुख व समृद्धि के लिए कोष का होना अति आवश्यक है। बिना दण्ड (अथवा राजशक्ति) के राज्य में शान्ति और व्यवस्था सम्भव नहीं। अन्त में मित्र अर्थात् पड़ोस में मित्र राज्यों का होना भी राज्य के अस्तित्व एवं सुरक्षा के लिए आवश्यक है। आधुनिक राज्यशास्त्री राज्य के चार तत्त्व मानते हैं-जनसमूह, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। इस दृष्टि से ऊपर वर्णित राज्य के सात अंगों अथवा तत्त्वों में कोष, दुर्ग और मित्र को स्थान दिया जाना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता परन्तु साधारण रूप में यह स्वीकार किया जा सकता है कि प्राचीन काल में कोष और दुर्ग के अस्तित्व एवं सुरक्षा तथा जनता की समृद्धि के लिए आवश्यक तत्त्व रहे होंगे। यही बात मित्र के विषय में भी कही जा सकती है। वर्तमान युग की स्थिति राजनीतिक दशाओं में छोटे राज्यों के अस्तित्त्व को विशेष खतरा नहीं, किन्तु प्राचीन काल में छोटे-छोटे राज्य बिना मित्र राज्यों के अपना अस्तित्त्व बनाये रखने में असमर्थ थे।’

राज्यों के प्रकार-

‘अर्थशास्त्र’ के अध्ययन से स्पष्ट है कि कौटिल्य राजतंत्र का पोषक था और वह समस्त भारत पर एक सशक्त और सम्पन्न राजा का शासन स्थापित करना चाहता था। उसी की मान्यता है कि राजतंत्र में राजभक्ति कुलीन वर्ग के हाथ में रहती है और उपयुक्त अनुशासन और प्रजा में स्वामिभक्ति की स्थापना की जा सकती है। परन्तु अर्थशास्त्र में अन्य प्रकार के राज्यों का उल्लेख भी मिलता है। क्योंकि उस काल में अन्य प्रकार के राज्यों को द्वैराज्य, वैराज्य तथा संघराज्य कहा जाता था।

राज्य का उद्देश्य-

 कौटिल्य द्वारा वर्णित राज्य केवल पुलिस राज्य न था, अर्थात् राज्य केवल शान्ति-व्यवस्था और सुरक्षा बनाये रखने को ही अपना कार्य नहीं समझता था। राज्य का उद्देश्य व्यक्ति को पूर्ण विकास में पूरी तरह से सहायता देना है। कौटिल्य के अनुसार अच्छा राज्य स्वस्थ और सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर आधारित होता है। कौटिल्य ने जनपद के गुणों का वर्णन करते हुए समृद्धिशाली जनपद पर आवश्यक गुण इस प्रकार बतलाते हैं। राज्य का भूमि-क्षेत्र इतना हो कि वह निवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और उनकी शत्रुओं से भी रक्षा कर सके। उसमें देशभक्ति की भावना से प्रेरित व्यक्ति रहते हों जंगली पशु उसके निवासियों को हानि न पहुँचा सकें, उसमें कृषियोग्य भूमि, चरागाह और वन आदि काफी हों, आवागमन के समुचित साधन हों राज्य का उद्देश्य प्रजा का हितसाधन है। राजा का हित प्रजा के हित में ही निहित है-

प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च सुखे सुखम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां च प्रियं हितम् ।।

विभिन्न प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न होती हों और सभी वर्गों के परिश्रमी व्यक्ति रहते हों। कौटिल्य के अनुसार राज्य के कार्यों का क्षेत्र अति विस्तृत होना चाहिए। अच्छे राज्य का आधार सुदृढ़ अर्थव्यवस्था है जिससे कि उसके निवासी अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकें।

अन्तर्राज्यीय (अन्तर्राष्ट्रीय) सम्बन्ध-

 कौटिल्य के अनुसार राज्य चार प्रकार के होते हैं- 1. शत्रु 2. मित्र 3. मध्यम एवं 4. उदासीन। कौटिल्य का मत है कि शत्रु राजाओं के ऊपर अवश्य ही आक्रमण किया जाना चाहिए। उसके अनुसार ये शत्रु राजा आक्रमण के योग्य होते हैं। मित्र राजाओं के विषय में उसने तीन प्रकार के राजाओं को बतलाया है-प्राकृतिक मित्र, सहज मित्र और कृत्रिम मित्र। मध्यम राजा के लिए कौटिल्य ने कहा है कि दो राज्य की सीमाओं के मध्य स्थित होकर उन राज्यों की पृथक् पृथक् सहायता करे। एक अन्य प्रकार का भी राजा होता है जो कि सभी प्रकार के विजय या पराजय भावनाओं से पृथक् होता था। यह पृथक् राजा उन राज्यों को न अनुग्रह और न विरोध प्रदान करने वाला था। इस राजा को उदासीन तथा उसके राज्य को उदासीन राज्य कहकर पुकारा गया।

अन्तर्राष्ट्रीय (अन्तर्राज्यीय) सम्बन्धों के मूल तत्त्व (षाड्गुण्य नीति)-

 यह निम्न तत्त्व इस प्रकार हैं- 1. संधि, 2. विग्रह, 3. यान, 4. आसन, 5. संश्रय, 6. द्वैधीभाव। राजा को चाहिए कि अपनी और अपने शत्रु दोनों की स्थिति का सम्यक् ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त ही षाड्‌गुण्यनीति द्वारा अपनी नीति का निर्धारण करे। यहाँ पर उक्त सभी तत्त्वों के विषय में कौटिल्य के विचारों का उल्लेख इस प्रकार है-

सन्धि-

 सन्धि दो राजाओं के मध्य निर्धारित शर्तों के बाद होने वाले मेल को कहा जाता है। कौटिल्य ने सन्धि के उद्देश्य इस प्रकार बतलाये हैं-

1. सन्धि के बाद जब महान राजकीय उद्देश्यों की पूर्ति की जा सकती है।

2. यदि इस सन्धि के द्वारा शत्रु के उत्तर कार्यों से लाभ उठा सकता हो।

3. यदि यह सन्धि शत्रु के विनाश में सहायक सिद्ध हो सकती हो।

4. शत्रु मण्डल में भेद उत्पन्न करने की दृष्टि से।

सन्धियों के निम्नलिखित भेद आचार्य चाणक्य ने बतालाये हैं-

हीन सन्धि-

 इस प्रकार की सन्धि एक शक्तिहीन राजा एक सशक्त राजा से करता है। जिस समय राजा यह देखता है कि वह सफल पक्ष से किसी भी भाँति विजयी न होगा तो अपना कोष, भूमि या सेना देकर उससे सन्धि कर लेता है। इस प्रकार की सन्धि में कहीं तो दुर्बल राजा स्वयं उस सबल पक्ष की सेवा में अपनी सेना के सहित जाता है, कहीं किसी अन्य व्यक्ति को सन्धि के सम्पादन में नियोजन किया जाता है और कहीं-कहीं पर राजा के राजकुमार को भी सन्धि करने के लिए जाना पड़ता था।

कोषपतन सन्धि-

 इस सन्धि के अनुसार एक निर्बल राजा अपने से सबल राजा को अपने राजकीय कोष से सहायता देने की प्रतिज्ञा करता है। इस प्रकार की सन्धि वह अपने अधिकारियों के कैद से छुड़ाने के लिए अधिकांशत: करता है। इसमें कहीं तो धन किस्तों में जमा किया जाता है, कहीं थोड़ा-थोड़ा करके राजा उसको दे डालता है और कहीं एकदम एक भार के रूप में निर्बल राजा को सोना प्रदान करना होता है। इस प्रकार की विभिन्न शर्तों के कारण ही इन सन्धियों को कोषोपतन, उपग्रह और कपाल आदि कहकर अभिहित किया गया है।

देशोद्यतन सन्धि-

इस तरह जो सन्धि सम्पादित होती है उसमें एक दुर्बल राजा एक सबल राजा को अपनी स्वायत्त भूमि का कुछ अंश प्रदान करके उससे सन्धि करता है। अच्छन, अवक्रय और परिदूषण आदि इस सन्धि के भेद चाणक्य ने बतलाये हैं।

परिणत अपरिणते (परिणतार्थ) सन्धि इस प्रकार की सन्धि कई राजा आपस में मिलकर करते हैं। इस सन्धि को करके वे किसी अन्य सबल विरोधी को शान्त करने के लिए युद्धरत हो जाते हैं। राज्य विजय की अभिलाषा से ये राजा आपस में सन्धि करते हैं और आपस में संगठित होने के पश्चात् वे भिन्न-भिन्न दिशाओं की ओर चल देते हैं। वे अपनी विजय प्रयास के लिए एक निश्चित समय तक प्रयत्न करते रहने का आपस में इकरार करते हैं। तुम इतना कार्य पूरा करो और मैं इतना कार्य सम्पादित करूँगा। इस प्रकार की सन्धि को ‘परिणतार्थ सन्धि’ कहा गया।

इस प्रकार की सन्धि विजय लाभ के लिए इच्छुक राजा और उनके सहायक राजा के मध्य होती है। कौटिल्य ने इस सन्धि के चार भेद बतलाये हैं- 1. मित्र 2. हिरण्य 3. भूमि और 4. कर्म। इस विभाजन को उन राजाओं के मध्य होने वाले विजय लाभ के वितरण की शर्तों के आधार पर किया गया है। राजा लोक विजय के पूर्व ही यह निश्चित कर लेते थे कि उनमें किसको कितना मिलना है।

सम-विषय और अति सन्धि –

इस प्रकार की सन्धि में सन्धिकर्ता राजाओं के मध्य यह निश्चित हो जाता है जो उनको प्राप्त होने वाला लाभ उनके मध्य किस प्रकार विभाजित किया जायेगा। यदि उनके मध्य समान लाभ होता है तो इसे समसन्धि, यदि उनमें से एक को केवल मित्र लाभ तथा दूसरे को भूमि और हिरण्य की प्राप्ति होती है, उसको विषय सन्धि तथा उसके अतिरिक्त अन्य शर्तों के आधार पर की जाने वाली सन्धि अतिसन्धि कही जाती है।

कौटिल्य के विचारानुसार युद्ध-

किसी भी स्थिति में राज्य की रक्षा करना आवश्यक था। कभी-कभी धार्मिक तथा भौतिक लाभों के लिए भी युद्ध किया जाता था। किन्तु युद्ध का साधन एकदम अन्तिम अस्त्र था। कौटिल्य के अनुसार राजा को निम्नलिखित स्थिति में ही युद्ध का सहारा लेना चाहिए :

1. यदि राज्य की स्थिति धन, शस्त्रास्त्र और सैनिकों से उत्पन्न हो।

2. यदि उसकी स्थिति शत्रु की स्थिति से अधिक हो।

3. जिस समय किसी कारण विशेष से उसके शत्रु का साहस क्षीण हो रहा हो।

कौटिल्य ने धर्म युद्ध, कूट युद्ध और तूष्णी युद्ध इन तीन प्रकार के युद्धों का उल्लेख किया है। राजा यदि अपने शत्रु के साथ समानता से प्रत्यक्ष रूप से हथियारों का प्रयोग करके लड़ता है तो यह धर्म युद्ध होगा, युद्ध में छल का उपयोग करना कूट युद्ध और युद्ध में गोपनीय रीतियों का आश्रय लेते हुए शत्रु के वध कराने की विधि को तूष्णी युद्ध कहा गया है। कौटिल्य के अनुसार राजा को चाहिए कि शत्रु पक्ष के विभिन्न अधिकारियों को नष्ट करने के लिए उनके नष्टकर्ता के हित में विभिन्न प्रकार के पुरस्कारों का उपयोग करे। राजा को विजय के लिए उपवास करना चाहिए। उसको इसके लिए अनेक प्रकार के यज्ञों का विधान करना चाहिए। 

कौटिल्य ने सेना के युद्ध भूमि में खड़े होने की व्यवस्था का भी उल्लेख किया है। उसने युद्ध संचालन के विषय में भी पर्याप्त लिखा है। उसके विचार से राजा अपनी सेना के पीछे 200 धनुष की दूरी पर सैन्य-संचालन के कार्य में स्वयं रहना चाहिए।

व्यूह- 

दण्ड व्यूह, भोग व्यूह, चाप व्यूह, विजय व्यूह और चक्र व्यूह आदि अनेक व्यूहों का उल्लेख चाणक्य ने किया है। युद्ध-काल के विषय में उसका मत है कि जिस समय युद्ध शत्रु सेना के लिए विपरीत काल पड़ता हो और निजी सेना के लिए अनुकूल समय हो, उसको ही युद्ध के लिए निर्धारित करना चाहिए। कौटिल्य का मत है कि युद्ध के समय (अर्थात् उनमें लगने के लिए अन्तर) को जानकर विभिन्न महीनों में आक्रमण करने चाहिए। उसने कहा। हा है कि अधिकांशतः वर्षा ऋतु इन आक्रमणों के लिए उपयुक्त होती है।

युद्ध प्रारम्भ करने के पूर्व चारों कूटनीतिक साधन अर्थात् साम, दाम, दण्ड, भेद को आजमा लेना चाहिए। उसने युद्ध की स्थिति में भी नैतिकता पर विशेष बल दिया गया है। युद्ध समान शक्ति वालों में हुआ करता था। निहत्थे सिपाही पर, सोये सिपाही पर तथा समर्पण करने वाले सिपाही को मारना निषिद्ध था।

महाभारत की भाँति चाणक्य ने भी युद्ध के नियमों का उल्लेख किया है। इस तरह प्राचीन भारत के अन्दर बुद्धिमान तथा श्रेष्ठ राजा लोग पारस्परिक लाभ को ध्यान में रखते हुए ही आपस में सन्धि या विग्रह किया करते थे। राजा लोग अपनी विजय योजनाओं का निर्माण करते समय इस तथ्य का ध्यान रखते थे कि उनके इस कृत्य के द्वारा प्रजा का हित किसी भी प्रकार से बाधित नहीं होना चाहिए।

Leave a comment