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विधि (कानून) एवं दण्ड पर मनु के विचार

विधि निर्माण तथा न्यायिक व्यवस्था

हिन्दू राजनीतिक चिन्तक में मनु के अनुसार कानून का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत वेद है। अन्य स्रोत हैं- स्मृतियाँ, वेदों में सत्मार्ग का अनुसरण करने वाले आचार्यों का वर्णन मिलता है।  जहाँ तक विधि अथवा कानून का प्रश्न है हिन्दुओं का कानूनी साहित्य तीन वर्गों में विभाजित है- प्रथम ‘धर्म सूत्र’, द्वितीय ‘धर्म शास्त्र’ और तृतीय ‘टीकाएँ। इन तीनों वर्गों में धर्मशास्त्रों का महत्त्व अधिक है। धर्मशास्त्रों में सर्वप्रमुख स्थान मनुस्मृति का है। इसे हिन्दू विधि का आधास्तम्भ माना जाता है। मनुस्मृति केवल धर्मशास्त्र ही नहीं वरन् एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें मनुष्य के समग्र सामाजिक जीवन की व्यवस्था का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस प्रसिद्ध ग्रन्थ में मानव जीवन के सामाजिक व्यवस्था से सम्बन्धित उन सिद्धान्तों का विश्लेषण किया गया है जिन्हें सभी कालों और देशों में लागू किया जा सकता है। 

मनुस्मृति में न्याय व्यवस्था का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। न्याय व्यवस्था से सम्बन्धित उसके विचार अग्रलिखित हैं- 

1. विधि निर्माण के लिए एक ‘परिषद्’ (विधायिका) होनी चाहिए अर्थात् कानून बनाने का कार्य विधायिका के माध्यम से होना चाहिए। उसकी संख्या दस होनी चाहिए।

2. बुद्धिमान तथा वेदों एवं टीकाओं के ज्ञाता, मीमांसाकार तथा धर्मशास्त्र के ज्ञाता को विधायिका में नियुक्त करना चाहिए।

3. कुल, जाति, श्रेणी तथा जनपद के लिए लोग अपनी स्वायत्तशासी संस्थाओं के माध्यम से नियम बना सकते हैं। राजा को ऐसे नियमों की स्वीकृति प्रदान कर उनका पालन कराना चाहिए। 

4. विवादों की सुनवायी तथा न्याय करने का उत्तरदायित्व राजा पर है। यदि वह ऐसा नहीं करता है तो यह कार्य न्याय सभा द्वारा होना चाहिए जिसमें विद्वान ब्राह्मणों की नियुक्ति होनी चाहिए। न्यायधीश के पद पर किसी भी हालत में किसी शूद्र की नियुक्ति नहीं होनी चाहिए। 

5. न्यायाधीश को निष्पक्ष होना चाहिए उसे निर्दोष व्यक्ति को दण्ड नहीं देना चाहिए अन्यथा वह पाप का भागी होगा। 

मनु ने न्यायिक व्यवस्था के सम्बन्ध में अपराधों पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने उनकी संख्या 18 बतायी है तथा उनसे सम्बन्धित विवादों को दो भागों में विभक्त किया है-

(1) हिंसा से सम्बन्धित विवाद। (2) भूमि और धन से सम्बन्धित विवाद।

मनुस्मृति में वर्णन है यदि राजा स्वयं विवादों का निर्णय न करे, तो उस कार्य को देखने हेतु किसी विद्वान् ब्राह्मण की नियुक्ति किया जाना चाहिए। राजा द्वारा इस कार्य हेतु नियुक्त ब्राह्मण भी ऐसे तीन अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर न्यायालय में विवादों का निर्णय करें। न्यायाधीशों को सभी विवादों का निर्णय पूर्ण निष्पक्षतापूर्वक करना चाहिए क्योंकि जिस सभा (न्यायालय) में सत्य, असत्य से पीड़ित होता है उसके सदस्य ही पाप से नष्ट हो जाते हैं। मनु के अनुसार न्यायधीश ब्राह्मण ही होने चाहिए। न्यायाधीश ऐसे व्यक्ति हों, जो बाहरी चिन्हों-स्वर, वर्ण, संकेत और चेष्टाओं से मनुष्य के आन्तरक भावों को जान सकें।

मनुस्मृति में प्रमाणों को दो भागों में विभक्त किया गया है-

1. मानुष प्रमाण

2. दिव्य प्रमाण

मानुष प्रमाण को मनु ने तीन भागों में विभक्त किया है-

(1) लिखित

(2) युक्ति

(3) साक्षी

(1) लिखित- मनु के अनुसार, इसमें प्रथम अर्थात् लिखित सबसे प्रामाणिक और महत्त्वपूर्ण होता है, अत: उस पर सबसे अधिक बल देना चाहिए। परन्तु जबरदस्ती अथवा धमकी आदि देकर लिखाये गये प्रमाण को महत्त्व नहीं देना चाहिए।

(2) युक्ति- यह प्रमाण भी महत्त्वपूर्ण है लेकिन अन्य दोनों की अपेक्षा इसका महत्त्व कम है।

(3) साक्षी- साक्ष्य प्रमाणों में आँखों देखा हाल होने के कारण ये भी विश्वासनीय होते हैं परन्तु मनु ने असत्य बोलने वाले सेवक, शत्रु, संन्यासी और कोढ़ी के साक्ष्य को महत्त्व नहीं देने के लिए कहा है। उन्होंने कहा है कि साक्ष्य देने से पूर्व शपथ ली जानी चाहिये तथा असत्य साक्ष्य देने वालों को कड़ा दण्ड देना चाहिए। ब्राह्मण द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य को एक विशेषज्ञ के साक्ष्य के रूप में महत्त्व देना चाहिये। स्त्रियों के लिए स्त्री का साक्ष्य लेना चाहिए। 

न्यायिक व्यवस्था के सन्दर्भ में ‘मनु’ ने ने न्यायपालिका, विशेष रूप से ‘धर्मसभा की कार्य प्रणाली पर भी प्रकाश डाला है। उन्होंने कहा है कि इस सभा में ‘राजा’ अथवा उसके द्वारा नियुक्त किसी विद्वान ब्राह्मण को मुख्य न्यायाधीश का पद तथा अन्य सदस्यों को अपना-अपना निर्दिष्ट स्थान ग्रहण करना चाहिए। सभी को अच्छे वस्त्रादि से सुसज्जित होकर सभा भवन में जाना चाहिये तथा वादी, प्रतिवादी और अन्य लोगों से शिष्ट व्यवहार करना चाहिए। धर्मसभा जिस प्रार्थना को उचित समझे, उस पर विचार की स्वीकृति प्रदान करे तथा महत्त्वपूर्ण अभियोगों को उसे वरीयता देनी चाहिये।

दण्ड- 

‘मनु’ ने अपने राजनीतिक विचारों के अन्तर्गत ‘दण्ड’ पर भी विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत ‘दण्ड’ को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हुए इसे राज्य की ‘सर्वोच्च शक्ति के रूप में लिया है। इसके बल पर ही वह अपनी राजशक्ति का प्रयोग करता है। ‘मनु’ ने इसे राज्य की ‘सम्प्रभु शक्ति’ के प्रतीक के रूप में लिया है। यह एक ऐसी शक्ति है जिसके बिना सामाजिक व्यवस्था और राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। सभी मर्यादाएँ नष्ट हो जायेंगी तथा राज्य में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जायेगी। यह सभी मनुष्यों का रक्षक है तथा भय से ही लोग स्वधर्म का पालन करते हैं। इससे राज्य की सम्पत्ति की रक्षा और उसमें वृद्धि होती है। इसके बल पर राज्य स्वयं निर्भर होकर कार्य करता है। तथा प्रजा को निर्भय बनाता है। यह मनुष्य की आसुरी प्रवृत्ति को नियंत्रित कर उसमें दैवी प्रवृत्ति का संचार करता है जिसके फलस्वरूप वह शुद्ध मन से कार्य तथा धर्म का पालन करता है। यहाँ ‘धर्म’ से उनका तात्पर्य वर्णाश्रम धर्म है। वह केवल मनुष्यों की ही नहीं अपितु सभी प्राणियों की रक्षा तथा उनके भोग के अनुकूल व्यवस्था करता है।

‘दण्ड’ को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान बताते हुए उन्होंने कहा है कि इसका सोच-समझकर पालन करना चाहिए। निर्दोष व्यक्तियों को दण्ड नहीं देना चाहिए अन्यथा इसे देने वाला पाप का भागी होता है। राजा की इस शक्ति का प्रयोग करने वालों पर कड़ी निगरानी और कठोर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि वे इसका दुरुपयोग न करने पाये। परिस्थितियों तथा अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में उन्होंने बताया है कि कब और किसे, किस प्रकार का दण्ड मिलना चाहिए। उनके अनुसार पुरुषों की तुलना में स्त्रियों तथा अन्य लोगों की तुलना में कम दण्ड देना चाहिए। इसका निरोधात्मक, प्रतिकारात्मक तथा सुधारात्मक तीनों ही लक्षण होने चाहिए। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने विभिन्न दण्डों का विधान किया है जैसे ‘वाग्दण्ड’ (समझाना), ‘धिग्दण्ड’ (निन्दा, भर्त्सना) ‘धनदण्ड’ (जुर्माना, ‘कामदण्ड’ (शारीरिक दण्ड), बधदण्ड’ (प्राणदण्ड)। इनके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक दण्डों की व्यवस्था की है जैसे जाति- बहिष्कार दण्ड, सम्पत्ति-हरण तथा निर्वासन दण्ड। इस सम्बन्ध में एक बात और उल्लेखनीय है कि ‘मनु’ ने ‘राजा’ को भी दण्ड से मुक्त नहीं किया है। उसे अपेक्षाकृत अधिक दण्ड देने की बात उन्होंने कहाँ। उन्होंने यह भी कहा है कि शुद्ध, सत्य, विज्ञ और शास्त्रों के अनुसार आचरण करने वाले को कम दण्ड देना चाहिए। 

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