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Jainism Political Thought

 Jain Philosophy जैन धर्म दर्शन

जैन एवं बौद्ध धर्म ऊपरी तौर पर धार्मिक आन्दोलन थे किन्तु उनके धार्मिक विचारों की तह में राजनीतिक चिन्तन सामाहित था। अहिंसा शांतिपूर्ण सहअस्तित्व, अपरिग्रह, समानता एवं सदाचार, मध्यममार्ग की अवधारणा, जाति प्रथा का विरोध, संघों की स्थापना जैसे विचार राजनीतिक चिन्तन की दृष्टि से आज भी प्रासंगिक हैं।

जैन धर्म एवं राजनीतिक चिन्तन

ईषा पूर्व छठीं शताब्दी की धार्मिक क्रान्ति में जैनधर्म ने विशेष योग दिया। वह तत्कालीन धर्मों में एक प्रमुख स्थान रखता है जिन्होंने भारत के धार्मिक जीवन पर पर्याप्त प्रभाव डाला।। इस धर्म का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकरों का उल्लेख मिलता है। प्रथम तीर्थकर ऋषभ देव तथा 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी थे। यद्यपि जैन धर्म के संस्थापक महावीर स्वामी नहीं थे लेकिन इस धर्म को पल्लवित एवं पुष्पित करने का श्रेय महावीर स्वामी को जाता है। जैन धर्म के राजनीतिक सिद्धान्त

महावीर स्वामी ने जिन सिद्धान्तों का प्रचार-प्रसार किया था अन्ततः वे जैन धर्म के सिद्धान्त माने जाने लगे। महावीर स्वामी के सिद्धान्त और शिक्षायें ऊपरी तौर पर धार्मिक नैतिक पुट लिए हुए है तथापि उनका राजनीतिक दर्शन के अनेक उपयोगी सूत्र समाविष्ट है।

 जैन धर्म के प्रमुख सिद्धान्तों को अग्रलिखित बिन्दुओं के आधार पर विश्लेषित किया जा सकता है-

1. निवृत्त मार्ग 

बौद्ध धर्म की भाँति जैन धर्म भी निवृत्ति मार्गी है। संसार के सभी सुख दुःख दायक है तथा व्याधि स्वरूप हैं। मनुष्य रोग और मृत्यु से पीड़ित है। गृहस्थ जीवन में भी उसके लिए कोई सुख शान्ति नहीं है। संसार में मानव अर्थात् मनुष्य आजीवन तृष्णा में घिरा रहता है। ‘जीव तृष्णा के लिए कर्म करता है परन्तु कर्मों में लिप्त होते ही वह अपने असली स्वरूप को भूल जाता है। कर्म वह आचरण है जो जीव के सम्यक दर्शन भक्ति के रोककर उसे मोहपाश में डालकर उसके सत्कर्मों में बाधा डालते हैं। वह अपने कर्म का फल भोगने हेतु जीव दूसरा जन्म लेता है और दूसरे जन्म में किए गए कर्मों को भोगने हेतु तीसरा इसी तरह कर्म के कारण पूर्व जन्म का चक्र चलता रहता है। कर्मफल से विमुक्त ही निर्वाण प्राप्ति का साधन है।

अतः मोक्ष प्राप्ति के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने पूर्व जन्म के कर्मफल का नाश करे और इस जन्म में किसी प्रकार का कर्मफल संगृहीत न करे यह त्रिरत्न के अनुशीलन और अभ्यास से प्राप्ति है।

संसार के बन्धन अर्थात् आवागमन के चक्र से छुटकारा पाने के लिए दो बातें आवश्यक हैं। एक तो यह कि कर्मों को जीव की ओर नये प्रवाह को रोका जाये, दूसरे जो कर्म पहले ही जीव को आच्छादित कर चुके हैं उन्हें हटाया जाय। संयम तथा सदाचार से नवीन कर्मों का प्रवाह रुक जाता है। कर्मों के प्रवाह को रोकने को संवर करते हैं जब जीव कर्मों से बिल्कुल मुक्त हो जाता है तो उसे मोक्ष मिल जाता है।

2. कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास 

जैन धर्म कर्म की प्रधानता पर विश्वास रखता है। मनुष्य जिस प्रकार का कर्म करता है उसे उसी प्रकार का फल मिलता है यदि मनुष्य का पूर्व जन्म में कर्म अच्छा रहता है तो अगले जन्म में उसे अच्छा फल मिलता है। मनुष्य अपने कर्मानुसार ही रूप, रंग, आयु एवं शरीर प्राप्त करता है। उत्तराध्ययन में 4 कर्मों का उल्लेख किया गया है जिसमें प्राणी बंधा रहता है-

(1) ज्ञानावरणीय

(2) दर्शनावरणीय

(3) वेदनीय

(4) मोहनीय

3. त्रिरत्नों का विधान 

पर्व जन्म के कर्म फल से मनुष्य को बचाने के लिए जैन धर्म में त्रिरत्नों का विधान किया गया है। सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन और सम्यक चरित्र यही तीन रत्न हैं। जैन धर्म में इन त्रिरत्नों का विशेष महत्त्व है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य कदापि मोक्ष की प्राप्त नहीं कर सकता है इसलिए सम्यक् ज्ञान की व्यवस्था की गई है। ज्ञानी व्यक्ति ही अपने को कर्म के बन्धनों से मुक्त रख सकता है। ज्ञान के द्वारा ही मानव सम्यक् दर्शन के मार्ग पर पहुँच सकता है। सम्यक चरित्र अथवा आचरण से तात्पर्य है कि अपने कर्म, वचन एवं इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण रखना। इस प्रकार जब मनुष्य को ज्ञान की प्राप्ति और आचरण में पवित्रता उत्पन्न हो जायेगी तो उसे मोक्ष की प्राप्ति भी आसानी से हो जायेगी।

4. अनेकात्मवाद – 

जैन धर्म के असार जिस प्रकार जीव भिन्न-भिन्न होते हैं उसी प्रकार उनकी आत्मायें भी भिन्न-भिन्न होती है। इस प्रकार जैन धर्म सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को नहीं मानता। उसके अनुसार यदि सभी जीवों में एक ही आत्मा होती तो वे एक दूसरे से पृथक् रूप में न पहचाने जा सकते और न ही उनकी भिन्न-भिन्न गतिविधि होती। अत: जैन धर्म एकात्मवाद अर्थात् एक आत्मा के स्थान पर अनेकात्मवाद अर्थात् अनेक आत्मा के अस्तित्त्व का प्रतिपादन करता है।

5. निर्वाण (मोक्ष) 

बौद्ध धर्म की भाँति निर्वाण ही जैन धर्म का परम लक्ष्य है। मनुष्य पूर्व जन्म के फल से विमुक्त हो और इस जन्म के कर्मफल से अस्पष्ट रहे तभी निर्वाण प्राप्त होता है। निर्वाण पूर्ण निबंन्धता है निर्वाण शून्यता, अकर्मण्यता अथवा निष्क्रियता नहीं है । निवृत्ति भी विशुद्ध रूप में देख-सुन सकता है। प्रत्येक वस्तु का सत् ज्ञान प्राप्त करना आत्मिक तत्त्व की ही क्षमता है। 

6. स्यादवाद 

जैन धर्म के स्याद्वाद के सिद्धान्त का अत्यन्त महत्त्व है। इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञान सात प्रकार के होते हैं- 

(1) है (2) नहीं है (3) है और नहीं है (4) कहा नहीं जा सकता (5) है किन्तु कहा नहीं जा सकता (6) नहीं है और कहा नहीं जा सकता (7) है नहीं है और कहा जा सकता है। अपनी इस अनिश्चिता के कारण जैन धर्म का यह सिद्धान्त स्याद्वाद, अनेकान्तवाद अथवा सप्तभंगी कहलाता है।

7. पंच महाव्रत- 

जैन धर्म में पंच महावतों पर विशेष बल दिया गया है। महावीर स्वामी ने जैन भिक्षु भिक्षुणियों को निम्न पांच महाव्रतों को कठोरता से पालन करने की आज्ञा दी है।

(1) अहिंसा महाव्रत-अनजाने में किसी भी प्रकार की हिंसा न होनी चाहिए। 

( 2 ) असत्य त्याग महाव्रत -भाषण सदा सत्य हो और साथ ही मधुर भी। 

(3) अस्तेय महाव्रत- अनुमति बिना किसी अन्य की वस्तु न ग्रहण करें, न ग्रहण करने की इच्छा करे।

(4) ब्रह्मचर्य महाव्रत- महावीर जी ने ब्रह्मचर्यव्रत के पालन पर विशेष जोर दिया। 

(5) अपरिग्रह व्रत – इस व्रत के अनुसार भिक्षुओं को किसी प्रकार का संग्रह न करना चाहिए। उनका उपदेश था कि गृहस्थ तो धन का संग्रह कर सकते हैं परन्तु भिक्षुओं के लिए ऐसा करना निषिद्ध है। 

8. पंच अणु व्रत-

उपरोक्त पंच महाव्रतों का पालन गृहस्थों के लिए सम्भव नहीं था। अतः गृहस्थ अनुयायियों के लिए पंच अणुव्रतों के पालन का नियम बनाया गया। ये व्रत निम्नलिखित हैं-

(1) अहिंसाणुव्रत-जहाँ तक सम्भव हो हिंसा न करें, 

(2) सत्याणुव्रत– सदा सत्य बोलें, 

(3) अस्तेयाणुव्रत-कोई ऐसा कार्य न करें जिससे दूसरे गृहस्थ के कार्यों में हस्तक्षेप हो, 

(4)ब्रह्मचर्याणुव्रत-दूसरे की स्त्री के विषय में न सोंचे तथा गृहस्थ सीमाओं में ही ब्रह्मचर्य का पालन करें, 

(5) अपरिग्रहणुव्रत– जितना आवश्यक हो उतने ही धन का संग्रह करें। 

9. अहिंसा – 

जैन धर्म कट्टर अहिंसावादी है। मन, कर्म और वचन तीनों से किसी प्रकार हिंसा न होनी चाहिए। अहिंसा पर इतना अधिक विश्वास किया है कि कुछ जैनी अपने नामक और मुँह पर पट्टी बाँधने लगे थे कि कहीं साँस लेते समय कोई कीटाणु हवा के साथ अन्दर जा कर मर न जाये। इसके अलावा जैन धर्म के अन्य सिद्धान्तों के अन्तर्गत आत्मा की अमरता में विश्वास करना, अनीश्वरवादी होना अर्थात् ईश्वर को इस सृष्टि का निर्माता नहीं मानना तथा व्रत उपवास एवं तप पर विशेष जोर देना इस धर्म के प्रमुख सिद्धान्त थे। जिनका जैन धर्म को मानने वालों को पालन करना होता था। 

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि जैन धर्म का सिद्धान्त पूर्ण आदर्श, नैतिकता, अहिंसा एवं ब्रह्मचर्य पर आधारित है। यह अवश्य है कि इनके सिद्धान्तों में थोड़ी बहुत अव्यवहारिकता अवश्य आ गई है जिसके कारण यह धर्म एक अन्तर्राष्ट्रीय धर्म न बन सका फिर भी यह धर्म आज अपने जन्म भूमि में जीवित है।

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