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हर परिस्थित में खुद को सांत कैसे रखे ।

how to yourself calm in every situation

एक बार की बात है पुराने जापान के सबसे बड़े और प्रसिद्ध बौद्ध मठ में एक जवान बौद्ध भिक्षु रहता था जो कि उसे समय के सबसे विख्यात और सम्मानित जन्मास्टर का शिष्य था वह बौद्ध मठ में जिनमास्टर की सेवा करता और उनसे जन की शिक्षाएं लेता वह उनका अभ्यास करता वह नौजवान बौद्ध भिक्षु बहुत ही होशियार मेहनती और अपने कार्यों के प्रति ईमानदार था। 

वह जैन मास्टर के द्वारा दी गई हर एक शिक्षा का पूरे लगन के साथ अभ्यास करता और पूरी ईमानदारी के साथ उनका पालन भी करता वह कभी भी अपने गुरु को शिकायत का कोई अवसर नहीं देता था। इसीलिए जिनमास्टर भी उससे बहुत खुश और संतुष्ट थे एक दिन जिन मास्टर ने अपने उस शिष्य को एक बहुत ही महत्वपूर्ण काम देने का निर्णय किया उन्होंने शिष्य को अपने पास बुलाया और उसके हाथों में एक पत्र देते हुए कहा तुम्हें इस पत्र को जितना जल्दी होसके क्योटो शहर में रह रहे इसके असली मालिक तक पहुंचना है लेकिन याद रहे किसी भी हालत में यह पत्र तुमसे खोना नहीं चाहिए और ना ही किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ लगाना चाहिए, इस पत्र का जल्द से जल्द इसके सही मालिक तक पहुंचना बेहद ही आवश्यक है। क्योंकि

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इसमें हजारों लोगों की जिंदगी और मौत का सवाल है मास्टर का आदेश मिलते ही वह बिना एक क्षण गवाए अपने काम में लग गया उसने रास्ते के लिए भोजन लिया अपनी तलवार उठाई और घोड़े पर सवार होकर निकल पड़ा पत्र को उसके मालिक तक पहुंचाने के लिए वह अपने घोड़े को तब तक तेजी से तोड़ता रहा जब तक वह एक बड़ी सी नदी के किनारे नहीं पहुंच गया जिसे पार करने के लिए एक सक्रासर पुल बना हुआ था। उस पुल के दूसरी तरफ एक समुराई योद्धा अपनी तलवार लिए हुए खड़ा था जिसने उन पहले 100 लोगों से युद्ध करने की कसम खा रखी थी जो उस पुल को पार करेंगे।  

अब तक वह वहां से गुजरने वाली 99 लोगों से युद्ध करके उन्हें मौत के घाट उतार चुका था और अब हुए हैं यहां से गुजरने वाले उस 100 वे व्यक्ति का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहा था। जिसे युद्ध में मौत के नींद सुलाकर वह अपनी प्रतिज्ञा पूरी कर सके जैसे ही उसे नौजवान बौद्ध भिक्षु का घोड़ा उस पुल पर चढ़ता है समुराई अपनी गरजती हुई आवाज में बोलता है तुमने इस पुल पर कदम रख दिया है इसीलिए अब तुम्हें मुझसे युद्ध करना होगा अपनी तलवार निकलते हुए समुराई चिल्लाया मरने के लिए तैयार हो जाओ अपनी मौत को अपनी तरफ आता देख वह बौद्ध भिक्षु अंदर ही अंदर बहुत डर गया लेकिन तभी उसे अपने गुरु की बात याद आती है कि पत्र बहुत महत्वपूर्ण है यह किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ नहीं लगना चाहिए वह समुराई से पत्र के महत्वता के बारे में बताता है और उस प्रार्थना करता है कि वह उसे उस पत्र को उसके गुरु तक वापस पहुंचा देने दे और वह वचन देता है कि पत्र वापस करने के बाद वह जरूर उस युद्ध करने वापस आएगा समुराई उसकी बात मान लेता है और उसे वापस जाने देता है। पूरे रास्ते पर उस पुल पर हुई घटना के बारे में सोचते सोचते वह कब आश्रम पहुंच जाता है उसे पता ही नहीं चलता आश्रम पहुंचते ही वह तुरंत जन मास्पाटर के पास जाता है और उन्हें सारी घटना के सुनता है इस उम्मीद में कि शायद मास्टर उसकी मदद करेंगे लेकिन पूरी बात सुनने के बाद मास्टर सिर्फ इतना ही कहते हैं मेरे पास ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे तुम एक समुराई योद्धा को तलवारबाजी में हर सको इसीलिए तुम्हारी मौत तो निश्चित है। 

लेकिन हां मैं तुम्हें मृत्यु का सामना करने का सबसे अच्छा तरीका जरूर बता सकता हूं जब तुम उसे पुल पर पहुंचे तो अपनी तलवार को अपने सर के ऊपर उठाना और अपनी आंख बंद कर लेना और पूरी शांति के साथ खड़े होकर इंतजार करना जब तुम्हें महसूस हो कि कुछ ठंडी चीज तुम्हारी खोपड़ी कुछ हो रही हैतो यही तुम्हारी मृत्यु होगी इसके बाद वह नौजवान बौद्ध भिक्षु दोबारा अपनी सफर पर निकल पड़ता है इस बार वह अपनी मौत का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार था। इस बार ना तो उसके अंदर कोई घबराहट थी और ना ही किसी प्रकार का डर जब वह उसे पुल पर पहुंचता है जहां समुराई उसका इंतजार कर रहा था तो वह ठीक वैसा ही करता है जैसा मास्टर ने उसे कहा था। वह अपने दोनों हाथों से तलवार को सर के ऊपर उठना है और आंख बंद करके मौत के ठंडे स्पर्श का इंतजार करने लगता है जब समुराई उसे नौजवान बौद्ध भिक्षु को ऐसी अवस्था में देखा है तो वह समझ जाता है कि जरूर यह भिक्षु किसी सच्चे महान गुरु से मिलकर आया है क्योंकि उसने आज से पहले आंख बंद किए हुए तलवारबाजी के ऐसे मुद्रा और लड़ाई से पहले चेहरे पर इतनी शांति कभी नहीं देखी थी उसने ध्यान से देखा भिक्षु के चेहरे पर ना तो मौत का डर था और ना ही और नाही किसी प्रकार की कोई घबराहट उसने अपनी तलवार नीचे रख दी और अपने घुटनों पर बैठकर हाथ जोड़कर कहने लगा है महान गुरु मुझे मेरे इस मूर्खतापूर्ण दुस्साहस के लिए माफ करें और अपना शिष्य बनाएं ताकि मैं आपसे अद्भुत तलवारबाजी की कला सीख सकूं । 

दोस्तों वह बौद्ध भिक्षु हम हैं और वह समुराई हमारे जीवन की सबसे विकट समस्याएं कई बार हम ऐसी स्थिति में फंस जाते हैं जहां से बाहर निकलने का हमें कोई रास्ता नजर नहीं आता तब ऐसी स्थिति में हमें खुद को शांत पूरी तरह से शांत रखने की जरूरत होती है सोचिए अगर उसे जवान भिक्षु ने समुराई के सामने अपने प्राणों के भीख मांगी होती या उसके सामने रोया गिर्गिराया होता तो बहुत बड़ी संभावना थी कि समुराई उस पर हस्त्ता और अगले कुछ ही पलों में उसे टुकड़ों में काट देता या फिर अगर उसे भिक्षु ने डर करघबराहट और जल्दबाजी में समुराई पर हमला कर दिया होता तब भी उसका यही परिणाम होता लेकिन उसे नौजवान शिष्य नहीं इतनी शांति और स्थिरता के साथ उसे समुराई का सामना किया और इतने उच्च कोटि के चिन्ह का परिचय दिया कि उसे समय वह उसे समुराई से भी बेहतर हो गया और परिणाम स्वरुप समय उसके सामने झुक गया क्योंकि एक समुराई होने की वजह से उसने तुरंत यह महसूस कर लिया कि उसका सामना उससे भी अधिक जन का अभ्यास करने वाली व्यक्ति से हो गया है तो चाहे परिस्थितियों कितनी भी खराब क्यों ना हो कितना भी मुश्किल लगे उनका सामना करना इस नौजवान भिक्षु की कहानी को याद रखना और जब भी कोई मुसीबत रूपी समुराई आपके सामने आए तो अपनी आंखें बंद करो और शांत हो जो पूरी तरह से और वह समुराई आपके सामने भी जरूर झुकेगा ।

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