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होमरूल आन्दोलन

28 अप्रैल, 1915 ई० को ‘होमरूल लीग’ की स्थापना पना में हुई। तिलक ने 1916 ई० में ही सम्पूर्ण देश का दौरा किया तथा अपने आन्दोलन से जनता को न केवल अवगत कराया बल्कि उसकी महत्ता को स्पष्ट किया। तिलक ने स्पष्ट किया कि स्वायत्त शासन की प्राप्ति से उनका तात्पर्य ब्रिटिश नौकरशाही के स्थान पर ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत भारतीय जनता के प्रति उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। तिलक को अपने अभियान में अपार जन समर्थन मिला। 1916 ई० के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में जाते समय जिस प्रकार तिलक का स्वागत हुआ, वह उनकी व उनके आन्दोलन की लोकप्रियता का द्योतक था। तिलक को पूना सार्वजनिक सभा ने अपने प्रतिनिधि के रूप में इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा था, जिस रेलगाड़ी से वह अपने समर्थकों के साथ लखनऊ गए थे, उसका नाम ही ‘होमरूल गाड़ी’ पड़ गया। प्रत्येक स्टेशन पर तिलक का भव्य स्वागत किया गया। लखनऊ में लोगों ने उस घोड़ा- गाड़ी, जिसमें तिलक बैठे थे, के घोड़े हटा दिए तथा खुद गाड़ी खींचकर सम्मेलन तक ले गए।

इसी समय एक अन्य ‘होमरूल लीग’ की स्थापना हुई जिसकी संस्थापिका एनी बेसेण्ट थीं। 1847 ई० में लन्दन में जन्मी इस आयरिश महिला ने भारत को स्वायत्त शासन दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। एनी बेसेण्ट भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाएँ जागृत करना तथा उन्हें उनके अधिकार दिलाना चाहती थीं। एनी बेसेण्ट ने स्वयं ही कहा था, “मैं तो एक नगाड़ा हूँ जिसका कार्य सोए हुए भारतीयों को जगाना है ताकि वे अपनी मातृभूमि के लिए कार्यरत हो सकें।” इस प्रकार भारत में एक साथ दो ‘होमरूल लीग’ कार्य कर रही थीं, तथा दोनों में परस्पर सहयोग की भावना थी।

होमरूल आन्दोलन धीरे-धीरे गति पकड़ने लगा, तो सरकार ने अपना दमन चक्र चलाना प्रारम्भ कर दिया, किन्तु इससे आन्दोलन और भी तीव्र हो गया। इस आन्दोलन का स्वरूप 1906-07 ई० के स्वदेशी आन्दोलन के समान होता जा रहा था।

तिलक तथा होमरूल आन्दोलन के अन्य नेता चाहते थे कि सरकार स्वायत्त शासन प्रदान करने की शीघ्र घोषणा करे, किन्तु सरकार का ऐसा कोई विचार न था। अतः यह निर्णय लिया गया कि सरकार से मांग की जाए कि यदि एक निश्चित तिथि के भीतर उन्होंने इस आन्दोलन में भाग लेने के कारण बन्द किए गए नेता अली बन्धु-शौकत अली व मोहम्मद अली तथा अबुल कैलाम आजाद को रिहा किया तो आन्दोलनकारी सत्याग्रह करेंगे। सत्याग्रह का प्रस्ताव विचाराधीन ही था, जबकि भारत सचिव मॉण्टेग्य ने 20 अगस्त, 1917 ई० को घोषणा की कि भारत में ब्रिटिश शासन का लक्ष्य स्वशासित संस्थाओं का क्रमिक विकास करना था, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के एक अभिन्न अंग के रूप में भारत में क्रमशः उत्तरदायों शासन की स्थापना की जा सके। यह भी आश्वासन दिया गया कि शीघ्र ही इस दिशा में कदम उठाए जाएंगे। इस घोषणा के कुछ समय पश्चात् दिसम्बर, 1917 ई० को श्रीमती एनी बेसेण्ट को रिहा कर दिया। यद्यपि माण्टेग्यू घोषणा के कारण सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया, किन्तु लोकमान्य तिलक ने स्वायत्त शासन के लिए किया जा रहा अपना आन्दोलन जारी रखा तथा दिनों-दिन इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होती रही। 8 जुलाई, 1917 ई० को माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर उदारवादियों ने उसका समर्थन किया, किन्तु तिलक ने उसकी कटु आलोचना की। अतः कांग्रेस से उदारवादियों ने नाता तोड़ लिया तथा एक अन्य दल ‘लिबरल फेडरेशन’ नवम्बर, 1918 ई० में बनाया। तिलक इसकी चिन्ता न करते हुए भी अपना आन्दोलन चलाते रहे तथा इंग्लैण्ड की सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने पहले एक प्रतिनिधि मण्डल तथा तत्पश्चात् स्वयं इंग्लैण्ड जाने का प्रयास किया, किन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने मध्य रास्ते से ही उन्हें भारत वापस भिजवा दिया। । अगस्त, 1920 ई० को तिलक की मृत्यु हुई, तब तक स्वायत्त शासन के लिए आन्दोलन चलता रहा। 

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादी आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उग्रवादी नेताओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि उन्हीं के प्रयत्नों से भारत की स्वतन्त्रता की माँग विश्व की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गई। उग्रवादी नेताओं ने ही भारत के राजनीतिक आन्दोलन में पूर्ण राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प के बीज बोये जिसका फल भारत की स्वतन्त्रता के रूप में प्राप्त हुआ।

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