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नेपोलियन प्रथम का पतन

नेपोलियन प्रथम का पतन

सन् 1810 ई० में नेपोलियन अपनी उन्नति के चरम शिखर तक पहुँच चुका था, उसके साम्राज्य का विस्तार पूर्व में रूस तक हो गया था, जर्मनी और इटली के बहुत से भागों पर उसका आधिपत्य था, ‘राइन परिसंघ का वह संरक्षक था, स्पेन में उसका छोटा भाई जोसेफ राजा बना हुआ था और एक भाई जैराम बैस्ट फेलिया का राजा था, नेपोलियन का बहनोई मुरा नेपल्स का शासक था, रूस आस्ट्रिया और प्रशिया उसके मित्र थे, केवल इंग्लैण्ड ही उसका विरोधी था।

परन्तु नेपोलियन का यह विशाल साम्राज्य अगले पाँच वर्षों में (18 जून 1815 ई०) तक टूट-फूटकर समाप्त हो गया, इससे स्पष्ट है कि किन्हीं दृढ़ आधारों पर यह नहीं टिका था। नेपोलियन की व्यवस्था में कुछ ऐसी बड़ी त्रुटियाँ थीं जो उसके पतन का कारण बनीं, विभित्र विद्वानों ने नेपोलियन के पतन के निम्न कारण बतायें हैं-

1. शक्ति और निरंकुशता पर आधारित साम्राज्य- प्रो० हेजेन ने नेपोलियन के साम्राज्य की दुर्बलता पर यह बताई है कि “यह शक्ति और निरंकुशता के आधार पर टिका था।” उसका निर्माण युद्ध और विजय के द्वारा हुआ था। विजित लोग उसके अधीन अवश्य थे किन्तु वे उससे घृणा करते थे। और उसके चंगुल से छुटकारा पाने के लिये अवसर की ताक में रहते थे, ऐसे साम्राज्य को केवल शक्ति के द्वारा ही बनाये रखा जा सकता था। नेपोलियन स्वयं भी इस बात को जानता था उसने कहा था कि “वंश परंपरागत राजा बीस बार पराजित हो जाने पर भी अपना सिंहासन प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु मरे लिये यह संभव नहीं है, क्योंकि मैने सेना के बल से सत्ता प्राप्त की है, ज्यों ही उनकी शक्ति क्षीण हुई है त्यों ही उसका साम्राज्य नष्ट हो गया।”

2. अन्य देशों में राष्ट्रीयता की भावना का विकास- नेपोलियन के पतन का एक अन्य के कारण था कि फ्रांस की क्रांति ने सारे यूरोप में सष्ट्रीयता की एक नयी भावना पैदा कर कर दी थी, जिसके द्वारा फ्रांस 1793 ई० में प्रबल विदेशी आक्रमणकारियों को ही परास्त न कर सका बल्कि आक्रमणकारियों के प्रदेश को जीतने में भी सफल रहा। यहीं राष्ट्रीयता की प्रबल भावना देखा देखी में स्पेन, प्रशिया, आस्ट्रिया और इटली आदि देशों के नागरिकों के अन्दर भी उत्पन्न हो गयी थी। जेना के युद्ध में पराजय के बाद प्रशिया में राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिये भागीरथ प्रयत्न शुरू हुआ। परन्तु नेपोलियन को इस बात का जरा भी ध्यान न रहा। 3. फ्रांस में क्रांति की भावना का ह्रास-नेपोलियन के सम्राट बन जाने से फ्रांस में क्रान्ति की भावना समाप्त हो गयी थी, सन् 1793 ई० में विदेशी आक्रमण का मुकाबला करने के लिये फ्रांसीसी जनता जिस प्रकार के अन्धे जोश से भरकर उठ खड़ी हुई थी, वैसा अब जोश नहीं रहा था, वे युद्ध नहीं शांति चाहते थे, इसलिये मार्च मार्च 1814 जब मित्र राष्ट्रों ने पेरिस पर 4 ई० में ज चढ़ाई की, तब फ्रांसीसी जनता ने वैसा प्रतिरोध नहीं किया जैसा सन् 1793 ई० में किया था। 

4. महाद्वीपीय व्यवस्था- नेपोलियन और इंग्लैण्ड एक-दूसरे के प्रबल शत्रु थे, स्थल में इंग्लैण्ड नेपोलियन को नहीं हरा सकता था, समुद्री मार्ग में नेपोलियन इंग्लैण्ड का सामना करने में असमर्थ था। अतः नेपोलियन ने इंग्लैण्ड को आर्थिक मोर्चे पर हराने के लिये महाद्वीपीय व्यवस्था लागू की, इसी को इंगलिश प्रतिरोध या ‘बहिष्कार नीति’ भी कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह था कि इंग्लैण्ड का यूरोप के साथ व्यापार बंद क दिया जाये। इंग्लैण्ड का माल यूरोप में न बिके, जिससे इंग्लैण्ड के कारखाने बंद हो जाये, मजदूर बेकार हो जायें। उन परेशानियों के आ जाने पर इंग्लैण्ड बिना युद्ध किये ही अपनी हार माने जायेगा।

वैसे नेपोलियन की वह योजना बुरी न थी, परन्तु इसको ठीक से लागू कर पाना कठिन था। इस व्यवस्था के के सभी देशों में, में, यहाँ तक कि फ्रांस में भी असंतोष की फलस्वरूप यूरोप के ज्वालामुखी भड़की क्योंकि इंग्लैण्ड के उपनिवेशों से से आने वाली कपास, चीनी, चाय, काफी आदि सभी वस्तुयें बंद हो गयी थीं, जिससे ये सभी वस्तुयें बहुत महंगी हो गयी था, जिससे साधारण व्यक्ति को ये सभी वस्तु खरीदना अति कठिन हो गया था। इस व्यवस्था के कारण नेपोलियन के संबंध रूस से भी पृथक् हो गये। महाद्वीपीय व्यवस्था इंग्लैण्ड के लिये कम और नेपोलियन के लिये अधिक विनाशकारी सिद्ध हुयी।

5. ईसाई धर्म का विरोध होना- पोप के साथ झगड़ा करके नेपोलियन ने अपने अनेक शत्रु पैदा कर दिये थे, नेपोलियन ने पोप से आग्रह किया कि वह उसकी महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने के लिये अपने राज्य में इंग्लैण्ड का माल न आने दे, पोप ने इस बात को नहीं माना, इस पर नेपोलियन ने पोप के राज्य पर अपना अधिकार कर लिया। पोप नेक्कुद्ध होकर नेपोलियन को ईसाई धर्म से बहिष्कृत किया, नेपोलियन ने इसके उत्तर में पोप को कई वर्षों के लिये जेल में बंदी बना लिया। इससे रोमन कैथोलिक नेपोलियन का विरोधी बन गये, जो नेपोलियन के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण बना। 

6. नेपोलियन का अत्यधिक आत्मविश्वास-नेपोलियन में अत्यधिक आत्मविश्वास की भावना थी, वह कहता था कि ‘असंभव’ शब्द मेरे शब्द कोष में नहीं है। अंत में यही नेपोलियन के लिये हानिकारक सिद्ध हुआ उसने अपने एक सेना नायक सोल से कहा था कि “वैलिंगटन का ड्यूक नालायक सेनापति है और उनकी सेना बिल्कुल निकम्मी है।” स्पेन के विजय में उसने कहा था कि “इन स्पेनी सामन्तों और सैनिकों जैसे कायर मैंने और कहीं नहीं देखे।” परन्तु इन दोनों देशों ने ही उसके विनाश में बड़ा योग दिया।

7. असीम महत्त्वाकाँक्षा- ज्यों-ज्यों नेपोलियन को सफलता मिली त्यों-त्यों उसकी महत्वाकांक्षा सुरसा के मुख की भाँति फैलती गयी, वह इन केवल सारे यूरोप का, अपितु सारे संसार का स्वामी बनने का स्वप्न देखने लगा। पोप के शब्दों में “वह भूल गया कि कोई भगवान् नहीं हो सकता है।” 

8. उच्चकोटि की ब्रिटिश नौसेना- यदि ब्रिटिश नौसेना फ्रांस की नौसेना से अधिक न होती तो संभव था कि नेपोलियन सारे यूरोप का स्वामी बन ही जाता, परन्तु सशख्त न ब्रिटिश बेड़ा फ्रांस के लिये अजेय सिद्ध हुआ, जब अन्य राष्ट्रों ने नेपोलियन से संधि कर लॉ थी तब भी ब्रिटिश अपनी नौसेना के बल पर उसके विरुद्ध डाट रहा। वह महाद्वीप में नेपोलियन विरोधी शक्तियों की सहायता देता रहा और नेपोलियन के पतन में प्रमुख कारण बना। ऐडमिरल नेपल्स ने नील नदी की लड़ाई और ट्रैफल्गार की लड़ाई में फ्रांस के समुद्री बेड़े की नष्ट कर दिया था।

9. स्पेन और रूसी अभियानों में भारी क्षति- स्पेन और रूस के अभियान नेपोलियन को बहुत महंगे पड़े। इन दोनों ही देशों में युद्ध ने जन युद्ध का रूप धारण किया केवल नियमित ही नहीं, इन देशों की सारी जनता ही नेपोलियन की आक्रमणकारी सेना के विरूद्ध खड़ी हुई। नेपोलियन की प्रशिक्षित सेना से इन्हें बार-बार हारना पड़ा परन्तु उनका मनोबल नहीं टूटा। यह लंबी लड़ाई नेपोलियन की बहुत भारी हानिकारक सिद्ध हुई, स्पेन ने उसके 3 लाख और रूस में उसके लगभग 5-3/4 लाख सैनिक मारे गये थे, इतनी हानि सहने की क्षमता फ्रांस में नहीं थी। 

10. अयोग्य सम्बन्धी नेपोलियन ने अपने भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियों को विभिन्न देशों का शासक बनाया था और फ्रांस में ऊँचे पद दे दिये थे, परन्तु वे इन पदों के योग्य सिद्ध नहीं हुये। 

11. स्वभावगत कमियाँ-नेपोलियन के स्वभाव में कुछ ऐसी कमियाँ थीं जिन्होंने उसके पतन में योगदान दिया। प्रो० हालैण्ड ने लिखा है कि नेपोलियन बहुत जिद्दी बन गया था। उसका कोई विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता था, इसलिये वह घमंडी और अभिमानी हो गया, वह जानता था कि जो काम मैं करूँ वह अवश्य सफल होकर रहेगा। उससे कोई भूल नहीं हो स सकती है, वह अपने सेनाध्यक्षों की सलाह की उपेक्षा करने लगा था अतः उसके साथी भी उससे दूर हटते गयें। गयें।” उसे अपने सगे-संबंधियों से अधिक प्रेम था। अपने राजनीतिज्ञ मंत्री से उसने कहा था कि “तुम तो रेशमी जुराब में भरा हुआ गोबर हो।” 

12. सेना की दुर्बलता-पिछले दिनों में नेपोलियन की सेना उतनी सशक्त नहीं रह गयी थी जैसी कि कुछ समय पूर्व थी, सैनिकों की हालत अच्छी नहीं थी, भोजन तथा वस्त्र भी अपर्याप्त थे। वेतन भी उचित नहीं था और वह भी ठीक समय पर नहीं मिलता था। सेना में पंचमेल खिचड़ी भरी थी जिसमें स्पेन, जर्मन, पोलैण्ड आदि देशों के सैनिक सम्मिलित थे। उसमें फ्रांस के प्रति प्रबल राष्ट्रीयता की भावना का होना असंभव था। वे वेतन-भोगी सैनिक थे। उन्हें जय-पराजय से कोई लेना-देना नहीं था।

13. मित्रों के साथ विश्वासघात-नेपोलियन ने स्पेन के राजा से जो विश्वासघात किया था। उससे नेपोलियन के मन के मित्र भी उससे संशकित हो गये थे। स्पेन के राजा ने पुर्तगाल जाने के लिये इसी शर्त पर मार्ग दिया था कि पुर्तगाल जीत जाने पर दोनों में इसका बँटवारा होगा। परन्तु पुर्तगाल जीतने के पश्चात् नेपोलियन ने ऐसा नहीं किया। अन्य देश के शासकों का भी नेपोलियन के ऊपर से विश्वास उठ गया था। जो पतन का प्रमुख कारण बना।

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