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 दयानंद सरस्वती एवं आर्य समाज

यह हिन्दू धर्म का सुधारवादी आंदोलन था, जिसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन वैदिक धर्म की शुद्ध रूप से पुनः स्थापना करना था। इसके संस्थापक दयानंद सरस्वती (1824-83), जिनके बचपन का नाम मूलशंकर था, का जन्म गुजरात के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वे सत्य की तलाश में लगभग 15 (1845-60) वर्षों तक इधर से उधर भटकते रहे। 1875 में उन्होंने बॉम्बे में आर्य समाज की स्थापना की। बाद में उन्होंने इसका मुख्यालय बम्बई से लाहौर स्थानांतरित कर दिया।

दयानंद के विचार एवं चिंतन का प्रकाशन उनकी प्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में हुआ। दयानंद की परिकल्पना में, जाति रहित एवं वर्ग रहित समाज, राष्ट्रीय, सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से संयुक्त भारत, विदेशी दासता से मुक्ति एवं सम्पूर्ण राष्ट्र में आर्य धर्म की स्थापना की कल्पना सर्वप्रमुख थी। उन्होंने वेदों को सच्चा एवं सभी धर्मों से हटकर बताया। उन्होंने कहा कि वेद भगवान द्वारा प्रेरित हैं और सम्पूर्ण ज्ञान के स्रोत हैं। उन्होंने उन धार्मिक विचारों को ठुकरा दिया, जो वेदों के अनुकूल नहीं थे। उन्होंने नारा दिया ‘वेदों की ओर लौटो’ । दयानंद सरस्वती ने वेदांत की शिक्षा मथुरा के एक अंधे गुरु स्वामी विरजानंद से ग्रहण की थी। वेदों को उन्होंने सर्वश्रेष्ठ बताया। उनके अनुसार व्यक्तिगत रूप से धार्मिक तर्क का मार्ग सभी को अपनाना चाहिये, क्योंकि हर मनुष्य को ईश्वरोपासना का अधिकार है। उन्होंने प्राचीन हिन्दू धर्म, ग्रंथों में पुराणों की कड़ी आलोचना की और कहा कि स्वार्थी और अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों की सहायता से हिन्दू धर्म को दूषित कर दिया है। उन्होंने हिन्दू रूढ़िवादिता, जातिगत कठोरता, अस्पृश्यता, मूर्तिपूजा, कर्मकांड, पुरोहितवाद, चमत्कार जैसी चीजों में विश्वास, जीवहत्या, समुद्र यात्रा पर निषेध, पुरोहितों के श्राद्ध (भोजन) इत्यादि की कड़ी आलोचना की। उन्होंने हिन्दू धर्म की परंपरागत जाति प्रथा की भी आलोचना की तथा कहा-जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर नहीं अपितु कर्म के आधार पर होना चाहिए।

आर्य समाज ने लड़कों के विवाह की न्यूनतम उम्र 25 वर्ष तथा लड़कियों की 16 वर्ष निर्धारित की। एक अवसर पर दयानंद ने हिन्दू प्रजाति को ‘बच्चों का बच्चा’ की संज्ञा दी। उन्होंने अंतर्जातीय विवाह’ तथा विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया। उन्होंने स्त्री समानता की वकालत भी की। समाज, प्राकृतिक विपदाओं जैसे-सूखा, बाढ़, एवं भूकम्प आने पर सहायता पहुंचाने का कार्य भी करता था। आर्य समाज ने शिक्षा व्यवस्था को भी एक नई दिशा प्रदान की। आर्य समाज ने लोगों का ध्यान परलोक की बजाय इस वास्तविक संसार में रहने वाले मनुष्यों की समस्याओं की ओर आकृष्ट किया। उन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये शुद्धि आंदोलन चलाया, जिससे कि किसी दबाव या भय से हिन्दू धर्म को छोड़ चुके लोग हिन्दू धर्म में वापस आ जायें। आर्य समाज के अनुसार, परम ईश्वर एक है और सबको उसकी उपासना करनी चाहिए। ईश्वर की उपासना में आध्यात्मिक चिंतन का सर्वश्रेष्ठ स्थान है। ईश्वर निराकार है और उसकी मूर्तिरूप में पूजा नहीं की जानी चाहिए। समाज ने इस बात का खण्डन किया कि ईश्वर का अवतार होता है। राम और कृष्ण महापुरुष थे न कि ईश्वर के अवतार । सभी मनुष्य उनके विचार अपना कर और उनके कार्यों पर चलकर उनका स्थान प्राप्त कर सकते हैं। आत्मा अमर है। आत्मा द्वारा बार-बार शरीर त्यागने एवं पुर्नजन्म की बात सत्य है लेकिन स्वार्थी ब्राह्मणों द्वारा इसके लिये जो श्राद्ध कराया जाता है, वह निरर्थक एवं गलत है। समाज कर्मफल एवं मोक्ष में विश्वास करता है। उसके अनुसार वेद हिन्दुओं की सर्वोच्च धार्मिक पुस्तक है।

यहां यह बात स्पष्ट है कि स्वामी दयानंद सरस्वती का नारा ‘वेदों की ओर लौटो’ वैदिक शिक्षा एवं धर्म की वैदिक शुद्धता के लिये किया गया प्रयास है न कि वैदिक काल की पुर्नस्थापना। स्वामी दयानंद ने आधुनिकता एवं देशभक्ति के आदर्शों को अपनाने पर जोर दिया।

आर्य समाज के 10 प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं-

(1) वेद ही ज्ञान के श्रोत हैं, अतः वेदों का अध्ययन आवश्यक है; (ii) वेदों के आधार पर मंत्र-पाठ करना; (iii) मूर्ति पूजा का खंडन; (iv) तीर्थ यात्रा और अवतारवाद का विरोध; (v) कर्म, पुनर्जन्म एवं आत्मा के बारम्बार जन्म लेने पर विश्वास; (vi)) एक ईश्वर में विश्वास जो निरंकारी है; (vii) स्त्रियों की शिक्षा को प्रोत्साहन; (viii) बाल विवाह और बहुविवाह का विरोध; (ix) कुछ विशेष परिस्थितियों में विधवा विवाह का समर्थन एवं; (x) हिन्दी एवं संस्कृत भाषा के प्रसार को प्रोत्साहन ।

आर्य समाज के प्रमुख सामाजिक उद्देश्य थे-

ईश्वर के प्रति पितृत्व एवं मानव के प्रति भ्रातृत्व की भावना, स्त्री-पुरुष के बीच समानता, सभी लोगों के बीच पूर्ण न्याय की स्थापना तथा सभी राष्ट्रों के मध्य सौहार्दपूर्ण व्यवहार। स्वामी दयानंद सरस्वती ने प्रमुख तत्कालीन समाज सुधारकों जैसे केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, रानाडे, देशमुख इत्यादि से सम्पर्क स्थापित किया। दयानंद की मृत्यु के पश्चात् उनके आदर्शों को लाला हंसराज, पंडित गुरुदत्त, लाला लाजपत राय एवं स्वामी श्रद्धानंद इत्यादि ने आगे बढ़ाया। 

1893 में आर्य समाज खान-पान और शिक्षा नीति के मुद्दे को लेकर दी समूहों में विभाजित हो गया। पहला समूह मांसाहार और पश्चिमी शिक्षा के पक्ष में था जिसे ‘कल्चरड पार्टी’ कहा गया। इनका तर्क था कि आर्य समाज के 10 सिद्धांतों में मांसाहार करने या न करने का उल्लेख नहीं है। इस समूह के नेता महात्मा हंसराज थे। दूसरे समूह ने समग्र शाकाहार का पक्ष लिया और शिक्षा की गुरुकल-पद्धति का समर्थन किया। इस समूह को ‘महात्मा’ कहा गया। इस समूह का नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद ने किया। महात्मा हंसराज ने 1886 में लाहौर में ओरिएंटल एंग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की, जबकि स्वामी श्रद्धानंद ने 1901 में हरिद्वार में गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय की स्थापना की।

आर्य समाज ने हिन्दू धर्म में आत्म-सम्मान एवं आत्म-विश्वास की भावना जागृत की तथा उसे पाश्चात्य जगत की श्रेष्ठता के भ्रम से मुक्त कराया। आर्य समाज के प्रयासों से इस्लामी एवं ईसाई मिशनरियों की हिन्दू धर्म विरोधी गतिविधियां सफल नहीं हो सकीं तथा हिन्दू धर्म अक्ष्क्षुण बना रहा। दयानंद के सत्यार्थ प्रकाश नामक ग्रंथ में जन सामान्य की अनेक धार्मिक जिज्ञासाओं को दूर किया गया। इस ग्रंथ में हिन्दू धर्म की अनेक त्रुटियों पर प्रकाश डाला गया है तथा अन्य धर्म के पाखण्डों की भी निंदा की गयी है।

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