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दण्ड पर मनु के विचार

दण्ड- ‘मनु’ ने अपने राजनीतिक विचारों के अन्तर्गत ‘दण्ड’ पर भी विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत ‘दण्ड’ को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हुए इसे राज्य की ‘सर्वोच्च शक्ति के रूप में लिया है। इसके बल पर ही वह अपनी राजशक्ति का प्रयोग करता है। ‘मनु’ ने इसे राज्य की ‘सम्प्रभु शक्ति’ के प्रतीक के रूप में लिया है। यह एक ऐसी शक्ति है जिसके बिना सामाजिक व्यवस्था और राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। सभी मर्यादाएँ नष्ट हो जायेंगी तथा राज्य में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जायेगी। यह सभी मनुष्यों का रक्षक है तथा भय से ही लोग स्वधर्म का पालन करते हैं। इससे राज्य की सम्पत्ति की रक्षा और उसमें वृद्धि होती है। इसके बल पर राज्य स्वयं निर्भर होकर कार्य करता है। तथा प्रजा को निर्भय बनाता है। यह मनुष्य की आसुरी प्रवृत्ति को नियंत्रित कर उसमें दैवी प्रवृत्ति का संचार करता है जिसके फलस्वरूप वह शुद्ध मन से कार्य तथा धर्म का पालन करता है। यहाँ ‘धर्म’ से उनका तात्पर्य वर्णाश्रम धर्म है। वह केवल मनुष्यों की ही नहीं अपितु सभी प्राणियों की रक्षा तथा उनके भोग के अनुकूल व्यवस्था करता है।

‘दण्ड’ को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान बताते हुए उन्होंने कहा है कि इसका सोच-समझकर पालन करना चाहिए। निर्दोष व्यक्तियों को दण्ड नहीं देना चाहिए अन्यथा इसे देने वाला पाप का भागी होता है। राजा की इस शक्ति का प्रयोग करने वालों पर कड़ी निगरानी और कठोर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि वे इसका दुरुपयोग न करने पाये। परिस्थितियों तथा अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार दण्ड की व्यवस्था होनी चाहिए। इस सम्बन्ध में उन्होंने बताया है कि कब और किसे, किस प्रकार का दण्ड मिलना चाहिए। उनके अनुसार पुरुषों की तुलना में स्त्रियों तथा अन्य लोगों की तुलना में कम दण्ड देना चाहिए। इसका निरोधात्मक, प्रतिकारात्मक तथा सुधारात्मक तीनों ही लक्षण होने चाहिए। इन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्होंने विभिन्न दण्डों का विधान किया है जैसे ‘वाग्दण्ड’ (समझाना), ‘धिग्दण्ड’ (निन्दा, भर्त्सना) ‘धनदण्ड’ (जुर्माना, ‘कामदण्ड’ (शारीरिक दण्ड), बधदण्ड’ (प्राणदण्ड)। इनके अतिरिक्त भी उन्होंने अनेक दण्डों की व्यवस्था की है जैसे जाति- बहिष्कार दण्ड, सम्पत्ति-हरण तथा निर्वासन दण्ड। इस सम्बन्ध में एक बात और उल्लेखनीय है कि ‘मनु’ ने ‘राजा’ को भी दण्ड से मुक्त नहीं किया है। उसे अपेक्षाकृत अधिक दण्ड देने की बात उन्होंने कहाँ। उन्होंने यह भी कहा है कि शुद्ध, सत्य, विज्ञ और शास्त्रों के अनुसार आचरण करने वाले को कम दण्ड देना चाहिए। 

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