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भारत में दलित वर्गों पिछड़े वर्गों के उत्थान में डॉ० बी० आर० अम्बेडकर तथा महात्मा ज्योतिबा राव फूले के योगदान

भारतीय इतिहास में गाँधी, नेहरू और और टैगोर की भांति डॉ० — अम्बेडकर का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने दलित समाज के उत्थान (दलितोद्धार) हेतु जो काय किया वह अतुलनीय है। वह आजीवन दलित वर्ग के उद्धार हेतु तन-मन-धन से लगे रहे। दलित वर्ग के उत्थान हेतु उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें ‘दलितों का मसीहा’ ‘दलितों का हितैषी’ तथा ‘दलित चिन्तक’ आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है। पं० जवाहर लाल नेहरू के शब्दों में “वे हिन्दू समाज के अत्याचारपूर्ण तत्त्वों के प्रतीक थे। उन्होंने हिन्दुओं में अछूत या अस्पृश्य मानी जाने वाली जातियों को संगठित किया तथा उन्हें समाज में उचित स्थान (सामाजिक न्याय दिलाने हेतु व्यापक संघर्ष किया।”

डॉ० बी० आर० अम्बेडकर के विचारों का केन्द्रबिन्दु दलितोद्धार था। विद्या के धनी, अद्भुद प्रतिभा, अध्ययन-अध्यापन में रुचि रखने वाले, निष्ठावादी तथा स्पष्टवादिता के धनी डॉ० अम्बेडकर की दलितोद्धार की भावना राजनीति में ले आयी। अछूत जाति में जन्म लेने के कारण बचपन से ही उन्हें पग-पग पर अपमान तथा भारी यन्त्रणा सहन करनी पड़ी। यन्त्रणा की इन स्थितियों के फलस्वरूप उन्होंने दलितोद्धार को अपने जीवन का मूल लक्ष्य बनाया और जब तक जीवित रहे इसके लिए संघर्ष-रत रहे। दलित चिन्तन की दिशा को अग्रलिखित बिन्दुओं के आधार पर विवेचित किया जा सकता है- मैं उनके विचारों एवं कार्यों

1. जाति-प्रथा और हिन्दू समाज के नियम-

वैसे तो डॉ० अम्बेडकर के पूर्व समाज सुधारक, दयानन्द सरस्वती, विवेकानन्द, महात्मा गाँधी आदि ने दलितोद्धार के लिए प्रयास किये है,, किन्तु अम्बेडकर के समान जाति-प्रथा और हिन्दू समाज के विधान पर कठोर प्रहार किसी ने नहीं किया।। उन्होंने प्रचलित वर्ण-व्यवस्था तथा जाति-व्यवस्था की आलोचना की • और कहा कि इसी व्यवस्था पर आधारित सामाजिक ढांचे की हिन्दू योजना ने जाति-व्यवस्था और छुआछूतत को जन्म दिया। उन्होंने इस अमानवीय असमानता को दूर करने के क्रान्तिकारी सामाजिक हल की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके लिए वे जीवन भर प्रयत्नशील रहे। इस जाति-व्यवस्था को समाप्त करने के लिए अन्तर्जातीय विवाह का समर्थन किया।

डॉ० अम्बेडकर ‘मनुस्मृति’ को अन्याय की जड़ मानते थे। अतः अपने आक्रोश को व्यक्त करने के लिए अनेक बार ‘मनुस्मृति’ को जलाने का कार्य किया।। इस प्रकार भारत में प्रचलित जाति-प्रथा के मूल को वे समाप्त करना चाहते थे।

2. अछूतों के जीवन में सुधार के समर्थक 

डॉ० अम्बेडकर यह भली भाँति जानते थे कि अछूतों की वर्तमान स्थिति के लिए वे स्वयं ही उत्तरदायी हैं। अतः उन्होंने अछूतों द्वारा अपनी बुरी बातों, आदतों और हीनता की भावना का त्याग कर आत्मसम्मानपूर्ण जीवन व्यतीत करने को कहा। उन्होंने कहा कि अछूत संगठित हों, शिक्षित हों तथा अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करें। इस सम्बन्ध में डॉ० अम्बेडकर ने दलित स्त्रियों को सुझाव दिया कि वे पढ़ें और अपने बच्चों को स्कूल भेजकर शिक्षित करें। ऐसा करके ही दलित वर्ग अपना विकास कर समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकता है। उनके इस दिशा में प्रयास कुछ हद तक सफल भी हुए।

3. दलितों की स्थिति में सुधार के कानूनी उपाय-

डॉ० अम्बेडकर ने दलितों की स्थिति सुधारने के लिए कानूनों में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। परम्परागत कानूनों में समायानुकूल परिवर्तन आवश्यक हैं। संविधान में दलित वर्गों को न केवल समानता के अधिकार दिये गये हैं बल्कि कुछ विशेष प्रकार के संरक्षण भी प्रदान किए गए हैं। उन्होंने दलित वर्ग के सदस्यों के विकास के लिए अग्र सिफारिशें की थीं :

(i) दलित छात्रों के वजीफों की संख्या बढ़ायी जाय;

(ii) छात्रावास की व्यवस्था की जाय; 

(iii) प्रशिक्षण के लिए वजीफे दिये जायें;

(iv) विदेश में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए वजीफा दिया जाय।

4. डॉ० अम्बेडकर ने अपने समय में मन्दिर, कुएँ तथा तालाब आदि सार्वजनिक स्थानों पर प्रचलित दलित वर्गों के निषेध का विरोध किया। उन्होंने कहा ऐसा करना दलितों के साथ अन्याय करना है। इसके लिए उन्होंने सत्याग्रह भी किया। सत्याग्रह का उद्देश्य समाज के लोगों में दलितों के प्रति व्यवहार में परिवर्तन लाना है। उनके इस दिशा में किये गये प्रयासों में सफलता भी मिली।

5. ब्रिटिश शासनकाल में मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों को साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्त्व प्राप्त था, उसी प्रकार दलितों को भी साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्त्व मिलने का डॉ० अम्बेडकर ने पुरजोर समर्थन किया।

6. दलितों के प्रति होने वाले अत्याचार और अपमान को समाप्त करने के लिए डॉ० अम्बेडकर ने दलितों के धर्म-परिवर्तन की बात सोची। उनके मतानुसार दलित जब तक हिन्दू है, तब तक उनके साथ सम्मानपूर्ण जीवन बिता पाना सम्भव नहीं है। अतः 1956 में बड़ी संख्या में दलितों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया। दलितों के प्रति उनके द्वारा किये गये कार्यों के कारण वे ‘दलितों के मसीहा’ बन गये।। डॉ० वी० पी० वर्मा ने अम्बेडकर के व्यक्तित्त्व और कार्यों की तुलना अमेरिका के महान नीग्रो नेता पाल राबसन से की है, जिसने अमेरिका के श्वेत बहुमत के विरुद्ध समस्त नीग्रों जाति के अक्रोश को व्यक्त किया।

दलित अथवा निम्न वर्गों के उत्थान में ज्योतिबा राव फूले का योगदान

पश्चिम भारत में ज्योति राव् गोबिन्दराव फूले ने निम्न जातियों के लिए संघर्ष किया। इनका जन्म बंगाल के माली कुल में हुआ। ब्राह्मणों के डर की कुछ घटनाओं ने ज्योतिबा फूले का पूरा दृष्टिकोण बदलने पर जोर दिया। एक बार ये एक ब्राह्मण मित्र की बारात में शामिल हुए थे। वहाँ पर इनका बहुत अपमान हुआ था। इनका विरोध इसलिए भी हुआ क्योंकि में स्त्रियों एवं निम्न जातियों के लिए एक पाठशाला भी चला रहे थे। ब्राह्मणों के दबाव के कारण इन्हें

पाठशाला बन्द कर्मी पड़ी एवं ये अपने घर से भी अपनी पत्नी के साथ निकाल दिये गये। ज्योतिबा फूले अब ये समझ चुके थे कि ब्राह्मण धर्म की आड़ लेकर अन्य वर्णों पर अत्याचार कर रहे हैं और ये सब निम्न जातियों को दास बनाने के लिए किया जा रहा है। इन्होंने कांग्रेस नेताओं की भी इस तरफ समुचित ध्यान न देने के कारण भर्त्सना की। 1873 में फूले ने सत्य शोधक समाज की स्थापना की, जिसका प्रमुख उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना था। उन्होंने सभी वर्णों के अनाथों तथा स्त्रियों के लिए अनेक पाठशालाएँ तथा अनाथालय खोले। 1876 ई० में ये पुणे की नगरपालिका के सदस्य भी चुने गये। ज्योतिबा राव फूले के प्रकाशनों में धर्म का तृतीय रत्न (पुराणों का भण्डाफोड़), इशारा (एक चेतावनी) एवं शिवा जी की जवानी आदि हैं। 1888 ई० में लोग इन्हें महत्मा कहने लगे।

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