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काँग्रेस के उदारवादी एवं उग्रवादी विचारधारा

भारतीय स्वाधीनता आन्दोलन में काँग्रेस ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। उसी के नेतृत्त्व व के के कारण 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में कग्रिस के योगदानों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-प्रथम युग उदारवादी युग (1885- 1905) तक। इसे नरम पंथी युग के नाम से जाना जाता है। द्वितीय युग अतिवादी या उग्रवादी युग (1905 के बाद का युग) इसे चरमपंथी युग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। उदारवादियों एवं उग्रवादियों के मध्य बढ़ते मतभेद के कारण 1907 में जब काँग्रेस का विभाजन हुआ तो उसका प्रभावशाली वर्ग उग्रवादियों अथवा चरमपंथियों के पक्ष में था। उदारवादी आन्दोलन एवं संघर्ष में तनिक भी विश्वास नहीं करते थे जबकि उग्रवादियों (अतिवादियों) का मानना था भीक्षावृत्ति एवं बिना आन्दोलन (संघर्ष) भारत कभी भी स्वतन्त्र नहीं हो सकता। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस 1885-1906 तक ब्रिटिश सरकार से विभन्न मांगे करती रही लेकिन उनमें ब्रिटिश सरकार द्वारा उसके माँगों पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था। अर्थात् एक भी माँग पूर्ण नहीं हुई इसीलिए लाल, बाल, पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक तलक एवं विपिन चन्द्र पाल पाल) का कांग्रेस की नीतियों से मतभेद उत्पन्न हो गया। 1906 तक कांग्रेस में दादा भाई नौरोजी, सर फीरोज शाह मेहता, गोखले, मदनमोहन मालवीय, सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी और रमेशचन्द्र दत्त इत्यादि नेताओं का अधिक प्रभाव था। इनका अभी तक अंग्रेजों की सद्भावना और न्याय में विश्वास हिला नहीं था परन्तु तिलक और लाजपतराय अंग्रेजों के पास बार-बार प्रर्थना-पत्र भेजना व्यर्थ समझते थे।

उदारवादी (नरम पंथ) एवं उग्रवादी/अतिवादी (चरम पंथ) विचारधाराओं (सिद्धान्तों) में अन्तर उग्रवाद्री अथवा अतिवादी पूर्ण स्वराज्य के पक्ष में थे। लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने कहा था- “स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे” (Freedom is our birth-right and we shall have it)। उदारवादी कौंसिल में जाने के लिए अधिक स्थान और अधिकारों की माँग करते थे परन्तु उग्रवादी (अतिवादी) कौंसिलों में चुने हुए सदस्यों तथा अधिक अधिकारों की माँग को अधिक महत्त्व नहीं देते थे। । उदारवादी (नरम पंथी) ब्रिटिश राज्य को एक बड़ा भारी उपकार या ईश्वरीय कृपा समझते थे परन्तु उग्रवादी ब्रिटिश राज को बड़ा उपकारी और सभ्यता सिखाने वाला नहीं मान‌ते थे। उनको भारत की सभ्यता और संस्कृति की श्रेष्ठता में पूरा विश्वास् था। उग्रवादी स्वदेशी वस्त्र के पक्ष में और विदेशी वस्त्र के बहिष्कार के लिए प्रचार करते थे। इससे उदारवादी सहमत नहीं थे। वे अंग्रेजों द्वारा भारत के आर्थिक शोषण की कड़ी निन्दा करते थे। तिलक का मानना था कि विदेशी सरकार को भारत पर सामाजिक सुधार लादने का कोई अधिकार नहीं है। वे अंग्रेजों से अधिकार माँगने की बजाए उन्हें निकालना चाहते थे परन्तु इसके लिए वे क्रान्तिकारी या हिंसात्मक उपायों के बजाय अहिंसात्मक आन्दोलन के पक्ष में थे। वे कहते थे कि भारत की समस्त बुराइयों की जड़ विदेशी शासन है, इसके जाने के बाद ही बुराइयों को ठीक किया जा सकेगा। अरविन्द घोष भी उग्रवादी नेता थे। उन्होंने कहा था, “हमारा वास्तविक शत्रु कोई बाहरी शत्रु नहीं बल्कि हमारी अपनी शिथिलता और कायरता है। । एक अधीन राष्ट्र स्वतन्त्रता द्वारा ही उन्नति के द्वार खोलता है और स्वतन्त्रता के लिए बलिदान की आवश्यकता है। राजनीति की आराम-कुर्सी पर बैठकर विदेशी सत्ता नहीं हिलाई जा सकती।। अपने पराक्रम और शक्ति से ही विदेशी शासन का विरोध कर सकता है।” लाला लाजपतराय और विपिनचन्द्र पाल भी उग्रवादी दल के मुख्य नेता थे। विपिनचुन्द्र पाल ने ‘वन्दे मातरम्’ समाचार पत्र की स्थापना की। लाजपतराय जी ने 1905 5 में इंगलैण्ड से लौटकर कहा था, “भारत के देशभक्त आत्म-निर्भता और बलिदान सेही देश का हित कर सकते हैं। अंग्रेजी जनता भारत के राजनीतिक प्रश्नों में कुछ रुचि नहीं रखती है और न भारतीयों की चिन्ता करती है।”

इसके विपरीत गोखले सच्चे उदारवादी थे। वे रानाडे के शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरु महादेव गोविन्द रानाडे से न केवल व्यवहार में बल्कि सिद्धान्तों में सहनशीलता का मार्ग अपनाना सीखा था। उनका विचार था कि भारत का पुनर्निर्माण राजनीतिक उत्तेजना की आंधी में नहीं हो सकता है। वे आवश्यक समझते थे कि अंग्रेजों को भारतीयों की योग्यता के बारे में विश्वास कराया जाए और धीरे-धीरे उनसे अधिकार प्राप्त करके उन्हें दिखाया जाए कि भारतीय स्व-शासन के योग्य हैं। डॉ० पट्टाभिस तारमैया ने व्रिलक और गोखले में अन्तर बतलाते हुए लिखा है-गोखले तिलक की नौकरशाही को नौकरशाहों के साथ काम करना पड़ता था, तो से भिड़न्त रहती थी। गोखले कहते थे जहां सम्भव हो ब्रिटिश सरकार से सहयोग करो, जहां आवश्यक है, वहाँ विरोध करो। गोखले शासन और उसके सुधार की ओर अधिक ध्यान देते थे, तिलक राष्ट्र और उसके निर्णय को सबसे मुख्य समझते थे। गोखले का आदर्श था प्रेम और सेवा, तिलक का सेवा और कष्ट। गोखले का “उद्देश्य था, स्व-शासन जिसके लिए जनसाधारण को अंग्रेजों की कसौटी पर खरा उतर कर अपने को योग्य सिद्ध करना था। तिलक का उद्देश्य था स्वराज्य जो प्रत्येक भारतवासी जन्मसिद्ध अधिकार था और जिसे वे विदेशियों की परवाह किए बगैर लेकर ही रहना चाहते का थे। गोखले अपने समय के 4, तिलक अपने समय से बहुत आगे। तिलक सर्वसाधारण जनता की ओर देखते थे तो गोखले उच्च वर्ग की तरफ देखते थे। गोखले अंग्रेजी के द्वारा प्रचार करते थे तो तिलक मराठी के द्वारा। गोखले की कार्य-प्रणाली का उद्देश्य विदेशियों दो हृदय को जात्ना था, तिलक उन्हें देश से हटाना चाहते थे। गोखले दूसरों की सहायता पर विश्वास करते थे, तो तिलक अपने आप पर और जनता पर भरोसा रखते थे। गोखले का – आखाड़ा था, कौंसिल भवन, तिलक की अदालत थी, गाँव की चौपाल।”

उपर्युक्त विचारों से यह परिणाम निकालने की आवश्यकता नहीं कि उदारवादियों का आन्दोलन व्यर्थ था या वे विदेशी सरकार के भक्त थे। उदारवादी तथा उग्रवादी दोनों ही देशभक्त थे और दोनों के ही तरीकों और कार्यों से किसी-न-किसी तरह लाभ ही पहुंचा। शुरू-शुरू में देश में ऐसी ही परिस्थिति थी कि यदि ब्रिटिश सरकार से बिल्कुल सहयोग न किया जाता, कांग्रेस पनप ही नहीं सकती थी। इसलिए एकदम स्वराज्य मांगना उचित नहीं था, शुरू-शुरू में ब्रिटिश सरकार को कौंसिलों के सुधार के लिए विवश करना और बजट पर बहस करने का अधिकार प्राप्त करना भी बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य समझा जाता था और यह सत्य भी है जैसा कि बाद के भारत के संवैधानिक विकास ने सिद्ध किया। दूसरी ओर ब्रिटिश सरकार के पास केवल अपनी मांगों के प्रार्थना-पत्र भेजना काफी नहीं था, बल्कि अहिंसात्मक आन्दोलन करना तथा देशवासियों को राष्ट्रीय शिक्षा देना और संगठित करना आवश्यक था। यह कार्य भी कन महत्त्वपूर्ण नहीं था और उस समय की परिस्थिति को देखते हुए कहा जा सकता है कि अत्यन्त कठिन था। इसके लिए ही तिलक, विपिनचन्द्र पाल, लाजपतराय और अरविन्द घोष को ब्रिटिश सरकार के हाथों बहुत कष्ट सहन करने पड़े। उग्रवादियों, क्रांतिकारियों और आतंकवादियों के आन्दोलनों से ही विवश होकर ब्रिटिश सरकार को उदारवादियों को प्रसन्न करने की नीति अपनानी पड़ी तथा 1909 में कुछ छ सुधार करने पड़े।

उपर्युक्त विवेचन के चन के आधार पर। निष्कर्षतः हम यह कह सकते हैं भारत को स्वतन्त्र कराने में उदारवादी एवं उग्रवादी दोनों विचार धाराओं का योगदान था। यह सवर्था सत्य है किसी एक के योगदानों को महिमामण्डित कर दूसरे के योगदानों को नकारा नहीं जा सकता है। स्वाधीनता प्राप्ति करने के लिए कांग्रेस के दोनों दलों चरमपंथी एवं नरम पंथी का दृष्टिकोण अलग था लेकिन उद्देश्य एक ही था। 

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