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कांग्रेस के अतिवादियों (गरम पंथियों) की विचारधारा

अतिवादी/उग्रवादी (चरमपंथी विचारधारा एवं कार्यक्रम तथा उनके नेताओं का योगदान

उदार राष्ट्रवादियों का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार द्वारा संचालित भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में धीरे-धीरे सुधार करना था और वे इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे संवैधानिक सुधार और अनुनय-विनय जैसे साधनों का प्रयोग करने में विश्वास रखते थे परन्तु सन् 1885 ई० से 1905 ३० के दौरान स्वयं हमारे देश में और साथ ही विदेशों में तत्कालीन घटना क्रम ने कुछ ऐसा मोड़ लिया और कुछ ऐसी शक्तियाँ क्रियाशील हई जिन्होंने भारत के कतिपय युवा पीढ़ी को पूर्ण स्वाधीनता को माँग प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित किया और ब्रिटिश संवैधानिक साधनों के प्रति शंका और अविश्वास की भावना को जन्म दिया। पूर्ण स्वतंत्रता की माँग के लक्ष्य और इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए जन आन्दोलन के मार्ग को अंगीकृत करने वाली इस धारा को इतिहास में उग्रराष्ट्रवाद की संज्ञा दी जाती है। वस्तुतः भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के दूसरे चरण का सूत्रपात ही उग्रवादी आन्दोलन के उदय के साथ होता है। 

कांग्रेस आन्दोलन के प्रति सरकारी उदासीनता के कारण कुछ उग्रवादी कांग्रेसियों में प्रतिक्रिया हुई और 20वीं सदी के प्रारम्भ में कांग्रेस के अन्दर एक नवीन दल का प्रादुर्भाव हुआ जो भिक्षावृत्ति में विश्वास नहीं रखता था। अंग्रेजों की लापरवाही के कारण 1896-97 तथा 1899- 1900 में एल्गिन द्वितीय और कर्जन के समय भयंकर अकाल और प्लेग के प्रकोपों से लाखों भारतीय मौत के मुँह में चले गये इसके अतिरिक्त कर्जन की साम्राज्यवादी और दमनकारी नीति’ ने भारतीयों को उत्तेजित कर दिया। उसके द्वारा बनाये गये कलकत्ता नगर निगम् अधिनियम, भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम, बंगाल विभाजन आदि ने भारतीयों के मन में क्रोध और विद्रोह की भावना उत्पन्न कर दी। बंगाल विभाजन हिन्दुओं और मुसलमानों में फूट डालने के लिए किया गया था। 16 अक्टूबर, 1905 को समस्त बंगाल में इस कार्रवाई की घोर निन्दा की गई और बहिष्कार आन्दोलन और स्वदेशी आन्दोलन चलाये गये।

इस प्रकार अब कांग्रेस के अन्दर एक नवीन दल का उद्य हुआ जो वामपंथी या उग्रवादी दल कहलाया और जो कुछ हद तक 1905 की रूसी क्रान्ति से भी प्रभावित हुआ था। उग्रवादी कांग्रेस का कहना था कि भारत की भलाई पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति में है, और इसे प्राप्त करने के लिए र हर सम्भव उपाय का सहारा लेना चाहिए। । इस इस कांग्रेस क के नेता स्वतन्त्रता और स्वराज्य को अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे और अंग्रेजों की न्यायप्रियता और उदारता में तनिक भी विश्वास नहीं रखते थे। मुख्य उग्रवादी नेता थे-लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक और विपिनचन्द्र पाल। उग्रवादियों ने भारतीयों के मन में स्वतन्त्रता के लिए उत्कट जोश पैदा कर दिया। जिसके फलस्वरूप वे अंग्रेजों की दमनकारी और अत्याचारपूर्ण नीति का डटकर मुकाबला करने को तैयार हो गये।

अंग्रेजों ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का अनुसरण करते हुए मुसलमानों को विशेष प्रोत्साहन देना शुरू कर दिया। अंग्रेजों का प्रोत्साहन पाकर कुछ मुसलमान नेताओं ने कांग्रेस से अलग रहकर एक नई संस्था बनाने का निश्चय किया। परिणामस्वरूप, 1906 में ‘मुसलिम लीग’ का जन्म हुआ। इस लीग का यही उद्देश्य था कि कांग्रेस से अलग रहकर मुसलमानों के लिए अधिक से अधिक अधिकार प्राप्त किये जायें। अंग्रेजों ने मुसलिम लीग को पूरा समर्थन दिया। 1916 में अपने स्वार्थ के कारण मुसलिम लीग ने कांग्रेस से समझौता कर लिया जो ‘लखनऊ समझौता’ के नाम से प्रसिद्ध है और जो उद्देश्यों में विभिन्नता की वजह से बहुत समय तक न चल सका।

इधर उदारवादियों और उग्रवादियों या नरम दल और गर्मदल के नेताओं में मतभेद् बढ़ते ही चले गये और 1907 में सूरत कांग्रेस के अधिवेशन में दोनों दल अलग-अलग हो गये। इस अधिवेशन में उग्रवादियों ने स्वराज्य, स्वदेशी, बायकाट, राष्ट्रीय शिक्षा आदि पर प्रस्ताव पास करवा लिये। तिलक ने अंग्रेजी सरकार का खुला विरोध किया और कहा कि माँगों के लिए प्रदर्शन, बहिष्कार और असहयोग की नीति अपनानी चाहिए ताकि अंग्रेजों पर दबाव डाला जा सकै परन्तु उदारवादी नेता सरकार के विरुद्ध किसी भी प्रकार का आन्दोलन चलाने के पक्ष में नहीं थे। तिलक ने दोनों दलों की एकता के प्रयास किये पर सब बेकार साबित हुआ। गर्म दल ने सम्पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति का लक्ष्य निश्चित किया और नर्म दलवालों ने अपना उद्देश्य शांतिपूर्ण तथा वैधानिक ढंग से औपनिवेशिक स्वराज्य प्राप्त करना घोषित किया। इसके पश्चात् 1916 तक कांग्रेस में नर्म दलवालों का ही प्रभुत्त्व रहा क्योंकि अंग्रेजी सरकार ने बहुत से गर्म दलवाले नेताओं को पकड़ लिया था।

सरकार की दमनकारी नीति-

अंग्रेजी सरकार ने गर्म दल के नेताओं को अपने लिए हानिकारक समझा, इसलिए उनका दमन करने का निश्चय कर कर लिया। बंगाल में राष्ट्रवादी स्वयंसेवक संग उनों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यहाँ तक कि राष्ट्रीय नारों से अलंकृत पोशाकें पहनने को भी दण्डनीय बना दिया गया। 1907 में राजविरोधी सभा प्रतिबन्ध अधिनियम लागू किया गया जिससे राजनीतिक सभाओं और जुलूसों को भंग करना आसान हो गया। 1908 मैं समाचार पत्र अधिनियम लागू हुआ जिसने अधिकारियों को ‘विद्रोह करने के लिए भड़काने’ के आरोप पर किसी भी अखबार को बन्द करने का अधिकार प्रदान किया गया।

राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन पर निर्णायक प्रहार करने के उद्देश्य से औपनिवेशिक अधिकारियों ने 1908 के समाचार-पत्र अधिनियम के अन्तर्गत तिलक को गिरफ्तार कर लिया। भारतीय जनमत के विरोध के बावजूद तिलक को भारी जुर्माने और 6 साल के कठोर श्रम कारावास की सजा दी गई जिसे बाद में कम करके सादे कारावास में बदल दिया गया। अब नवयुवकों ने सरकार से बदला लेने के लिए गुप्तरूप से प्रचार करना और बम बनाने शुरू कर दिये। 1912 में हार्डिंग्ज ।। पर बम फेंका गया।

सरकार ने नरम दल वालों को प्रसन्न करने के लिए 1909 में भारत का सरकार अधिनियम पास किया, और 1911 में हार्डिंग्ज II के समय अंग्रेजी सरकार ने बंगाल का विभाजन भी रद्द कर दिया।

होमरूल आन्दोलन

28 अप्रैल, 1915 ई० को ‘होमरूल लीग’ की स्थापना पना में हुई। तिलक ने 1916 ई० में ही सम्पूर्ण देश का दौरा किया तथा अपने आन्दोलन से जनता को न केवल अवगत कराया बल्कि उसकी महत्ता को स्पष्ट किया। तिलक ने स्पष्ट किया कि स्वायत्त शासन की प्राप्ति से उनका तात्पर्य ब्रिटिश नौकरशाही के स्थान पर ब्रिटिश साम्राज्य के अन्तर्गत भारतीय जनता के प्रति उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। तिलक को अपने अभियान में अपार जन समर्थन मिला। 1916 ई० के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में जाते समय जिस प्रकार तिलक का स्वागत हुआ, वह उनकी व उनके आन्दोलन की लोकप्रियता का द्योतक था। तिलक को पूना सार्वजनिक सभा ने अपने प्रतिनिधि के रूप में इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए भेजा था, जिस रेलगाड़ी से वह अपने समर्थकों के साथ लखनऊ गए थे, उसका नाम ही ‘होमरूल गाड़ी’ पड़ गया। प्रत्येक स्टेशन पर तिलक का भव्य स्वागत किया गया। लखनऊ में लोगों ने उस घोड़ा- गाड़ी, जिसमें तिलक बैठे थे, के घोड़े हटा दिए तथा खुद गाड़ी खींचकर सम्मेलन तक ले गए।

इसी समय एक अन्य ‘होमरूल लीग’ की स्थापना हुई जिसकी संस्थापिका एनी बेसेण्ट थीं। 1847 ई० में लन्दन में जन्मी इस आयरिश महिला ने भारत को स्वायत्त शासन दिलाने के लिए अथक प्रयास किए। एनी बेसेण्ट भारतीयों में राष्ट्रवादी भावनाएँ जागृत करना तथा उन्हें उनके अधिकार दिलाना चाहती थीं। एनी बेसेण्ट ने स्वयं ही कहा था, “मैं तो एक नगाड़ा हूँ जिसका कार्य सोए हुए भारतीयों को जगाना है ताकि वे अपनी मातृभूमि के लिए कार्यरत हो सकें।” इस प्रकार भारत में एक साथ दो ‘होमरूल लीग’ कार्य कर रही थीं, तथा दोनों में परस्पर सहयोग की भावना थी।

होमरूल आन्दोलन धीरे-धीरे गति पकड़ने लगा, तो सरकार ने अपना दमन चक्र चलाना प्रारम्भ कर दिया, किन्तु इससे आन्दोलन और भी तीव्र हो गया। इस आन्दोलन का स्वरूप 1906-07 ई० के स्वदेशी आन्दोलन के समान होता जा रहा था।

तिलक तथा होमरूल आन्दोलन के अन्य नेता चाहते थे कि सरकार स्वायत्त शासन प्रदान करने की शीघ्र घोषणा करे, किन्तु सरकार का ऐसा कोई विचार न था। अतः यह निर्णय लिया गया कि सरकार से मांग की जाए कि यदि एक निश्चित तिथि के भीतर उन्होंने इस आन्दोलन में भाग लेने के कारण बन्द किए गए नेता अली बन्धु-शौकत अली व मोहम्मद अली तथा अबुल कैलाम आजाद को रिहा किया तो आन्दोलनकारी सत्याग्रह करेंगे। सत्याग्रह का प्रस्ताव विचाराधीन ही था, जबकि भारत सचिव मॉण्टेग्य ने 20 अगस्त, 1917 ई० को घोषणा की कि भारत में ब्रिटिश शासन का लक्ष्य स्वशासित संस्थाओं का क्रमिक विकास करना था, ताकि ब्रिटिश साम्राज्य के एक अभिन्न अंग के रूप में भारत में क्रमशः उत्तरदायों शासन की स्थापना की जा सके। यह भी आश्वासन दिया गया कि शीघ्र ही इस दिशा में कदम उठाए जाएंगे। इस घोषणा के कुछ समय पश्चात् दिसम्बर, 1917 ई० को श्रीमती एनी बेसेण्ट को रिहा कर दिया। यद्यपि माण्टेग्यू घोषणा के कारण सत्याग्रह का कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया, किन्तु लोकमान्य तिलक ने स्वायत्त शासन के लिए किया जा रहा अपना आन्दोलन जारी रखा तथा दिनों-दिन इसकी लोकप्रियता में वृद्धि होती रही। 8 जुलाई, 1917 ई० को माण्टेग्यू-चेम्सफोर्ड रिपोर्ट के प्रकाशित होने पर उदारवादियों ने उसका समर्थन किया, किन्तु तिलक ने उसकी कटु आलोचना की। अतः कांग्रेस से उदारवादियों ने नाता तोड़ लिया तथा एक अन्य दल ‘लिबरल फेडरेशन’ नवम्बर, 1918 ई० में बनाया। तिलक इसकी चिन्ता न करते हुए भी अपना आन्दोलन चलाते रहे तथा इंग्लैण्ड की सरकार का ध्यान आकृष्ट करने के लिए उन्होंने पहले एक प्रतिनिधि मण्डल तथा तत्पश्चात् स्वयं इंग्लैण्ड जाने का प्रयास किया, किन्तु इंग्लैण्ड की सरकार ने मध्य रास्ते से ही उन्हें भारत वापस भिजवा दिया। । अगस्त, 1920 ई० को तिलक की मृत्यु हुई, तब तक स्वायत्त शासन के लिए आन्दोलन चलता रहा। 

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि राष्ट्रीय आन्दोलन में उग्रवादी आन्दोलन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उग्रवादी नेताओं के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है, क्योंकि उन्हीं के प्रयत्नों से भारत की स्वतन्त्रता की माँग विश्व की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बन गई। उग्रवादी नेताओं ने ही भारत के राजनीतिक आन्दोलन में पूर्ण राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने के लिए दृढ़ संकल्प के बीज बोये जिसका फल भारत की स्वतन्त्रता के रूप में प्राप्त हुआ।

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