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नेपोलियन प्रथम का पतन

नेपोलियन प्रथम का पतन सन् 1810 ई० में नेपोलियन अपनी उन्नति के चरम शिखर तक पहुँच चुका था, उसके साम्राज्य का विस्तार पूर्व में रूस तक हो गया था, जर्मनी और इटली के बहुत से भागों पर उसका आधिपत्य था, ‘राइन परिसंघ का वह संरक्षक था, स्पेन में उसका छोटा भाई जोसेफ राजा बना हुआ था और एक भाई जैराम बैस्ट फेलिया का राजा था, नेपोलियन का बहनोई मुरा नेपल्स … Read more

नेपोलियन फ्रांसीसी क्रान्ति का शिशु था।’ इस कथन का तर्क सहित। वर्णन।

नेपोलियन क्रान्ति पुत्र अथवा उसका विनाशक नेपोलियन ने एक बार कहा था कि “मैं ही क्रान्ति है” (I am the revolution) तथा दूसरे अवसर पर पुनः उसने कहा था कि “मैंने उसे नष्ट कर दिया।” (I have destroyed it)। येदि उसके कार्यों का मूल्यांकन किया जाय तो उसकी दोनों बातें सत्य प्रतीत होती हैं। वह क्रान्ति की उपज क्रान्ति का पुत्र था। साथ ही वह क्रान्ति विरोधी भी था, प्रतिक्रान्ति … Read more

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के आर्थिक कारण

आर्थिक कारण 1. कर प्रणाली में भेद-फ्रांस की कर प्रणाली अनुचित, घृणित एवं पक्षपातपूर्ण थी। करों का भार निम्न वर्ग पर था। विशेषाधिकारयुक्त वर्ग जो धनी था और कर दे सकता था वह करें से मुक्त था। करों की उगाही ऐसे लोगों के हाथ में थी जो अधिक धन दे सकें। एल०मुकर्जी के अनुसार, “करों की वसूली निद्यतापूर्ण ढंग से की जाती थी।” 2. राजकोष का रिक्त होना-आर्थिक कारणों की … Read more

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के सामाजिक कारण

सामाजिक कारण राजनैतिक कारण के लिए क्लिक करे आर्थिक कारण 1. विभिन्न वर्ग-फ्रांसीसी समाज क्रांति के पूर्व सामंती व्यवस्था पर आधरित था। एक वर्ग -धाप्राप्त वर्ग था तथा दूसरा सुविधाविहीन वर्ग सुविधाप्राप्त वर्ग पुनः दो वर्गों में बँटा हुआ था-प्रथम वर्ग अथवा प्रथम इस्टेट में पादरी वर्ग के लोग आते थे और दूसरे वर्ग में सामंत। पहले वर्ग में लगभग एक लाख तीस हजार पादरी थे। दूसरे वर्ग में लगभग … Read more

1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक कारणों  का परीक्षण करते हुए यह स्पष्ट कीजिए कि, इस क्रान्ति के लिए लुई 16वाँ कहाँ तक उत्तरदायी था?

1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति के कारण 1789 ई० की फ्रांसीसी क्रान्ति एक ऐसी क्रान्ति थी जिसने आधुनिक विश्व के लोगों के प्राचीन व्यवस्था को बदलने के लिए प्रोत्साहित किया। इस क्रान्ति के माध्यम से स्वतंत्रता समानता एवं भाईचारे की भावना का नारा दिया गया। इसी क्रान्ति के फलस्वरूप राष्ट्रवाद, लोकतंत्रवाद और समाजवाद जैसी नवीन शक्तियों के अभ्युदय पर बल मिला। आधुनिक सैन्यवाद और तानाशाही भी इसी क्रान्ति का परिणाम … Read more

फ्रांस के पहले कौंसल के रूप में नेपोलियन बोनापार्ट के सुधारात्मक कार्यों की विवेचना

नेपोलियन बोनापार्ट का जन्म कोर्सिका द्वीप के निवासी कार्लो बोनापार्ट नामक वकील के यहाँ 15 अगस्त 1769 ई० में हुआ था। उसकी शिक्षा फ्रांस के सैनिक शिक्षणालय में हुई थी। सैनिक शिक्षा प्राप्त करके नेपोलियन फ्रांस की सेना में लेफ्टीनेन्ट के पद पर नियुक्त हो गया। कुछ ही दिनों बाद उसके पिता कालौं बोनापार्ट का स्वर्गवास हो गया। अतएव पारिवारिक व्यवस्था बनाने के लिए नेपोलियन को ‘कोर्सिका’ लौटना पड़ा। ‘कोर्सिका’ … Read more

स्वदेशी आन्दोलन का महत्त्व, उपयोगिता एवं प्रभाव

यह सर्वथा सत्य है स्वदेशी आन्दोलन 1908 ई० के मध्य तक समाप्त अवश्य हो गया किन्तु इस आन्दोलन के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस आन्दोलन ने जीवन के लगभग समस्त पहलुओं पर अपना गम्भीर प्रभाव डाला। आन्दोलन ने जनमत को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आन्दोलन‌कारियों ने आन्दोलन के प्रसार के लिए जो परम्परागत तरीके अपनाए उससे आन्दोलन देश के कोन कोने में फैल गया। ल … Read more

स्वदेशी आन्दोलन के असफलता के कारण

स्वदेशी आन्दोलन का जिस तीव्रगति से विकास हो रहा था उससे ब्रिटिश साम्राज्यवादी सकते में आ गये, किन्तु 1908 ई० के मध्य तक आन्दोलन शक्तिहीन हो गया। निःसन्देह इसके पीछे कुछ महत्त्वपूर्ण कारण विद्यमान थेः (1) साम्प्रदायिकता- आन्दोलन का सबसे बड़ा दोष यह था कि यह मुसलमानों के बहुसंख्यक वर्ग को अपने साथ न ले सका। । अंग्रेजों ने साम्प्रदायिकता का जो बीज बो दिया था उसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। … Read more

स्वदेशी आन्दोलन की प्रगति अथवा प्रसार

7 अगस्त, 1905 ई० की कलकत्ता टाउन हाल की बैठक में ऐतिहासिक बहिष्कार का प्रस्ताव पारित हुआ। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने मैनचेस्टर के कपड़े और लिवरपूल के नामक के बहिष्कार की अपील की। इधर सरकार द्वारा यह घोषणा कर दी गई कि बंग भंग 16 अक्टूबर, 1905 ई० से लागू होगा, इस घोषणा ने आग में घी का कार्य किया। सितम्बर 1904 ई० से सितम्बर 1905 ई० तक के मध्य कलकत्ता … Read more

स्वदेशी आन्दोलन के मूलभूत कारण

स्वदेशी आन्दोलन का सामान्य परिचय भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत स्वदेशी आन्दोलन के साथ हुई। इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नूतन शक्ति एवं दिशा प्रदान की। आन्दोलन महज राजनीतिक दायरे तक ही सीमित नहीं था अपितु इसने साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, उद्योग तथा जीवन के विविध क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। समाज का प्रत्येक वर्ग स्वदेशी आन्दोलन से जुड़ गया। स्वदेशी आन्दोलन के … Read more