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स्वदेशी आन्दोलन के मूलभूत कारण

स्वदेशी आन्दोलन का सामान्य परिचय भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में बीसवीं शताब्दी की शुरुआत स्वदेशी आन्दोलन के साथ हुई। इस आन्दोलन ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नूतन शक्ति एवं दिशा प्रदान की। आन्दोलन महज राजनीतिक दायरे तक ही सीमित नहीं था अपितु इसने साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, उद्योग तथा जीवन के विविध क्षेत्रों को भी प्रभावित किया। समाज का प्रत्येक वर्ग स्वदेशी आन्दोलन से जुड़ गया। स्वदेशी आन्दोलन के … Read more

मानवतावाद पर नेहरू के विचार

नेहरू जी एक सच्चे राजनीतिज्ञ थे, लेकिन हाब्स, लॉक और रूसों की भांति वे राजनीतिक दार्शनिक बनने का कभी प्रयास भी नहीं किया। डॉ० वी० पी० वर्मा ने नेहरू के सम्बन्ध में लिखा है-“हम उन्हें (नेहरू जी) को एक सामाजिक आदर्शवादी कह सकते हैं जो सामान्य व्यक्ति की भावनाओं के लिए लोकतन्त्रीय दृष्टिकोण में आस्था रखता है।” नेहरू की मानवतावाद सम्बन्धी अवधारणा (विचार) नेहरू जी लोकतन्त्र समाजवाद एवं मानवतावाद को … Read more

राष्ट्रवाद पर नेहरू के विचार

जवाहर लाल नेहरू ने देश को एक सन्तुलित, संयमशील और आदर्श राष्ट्रवाद के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। राष्ट्रीयता सम्बन्धी उनकी मान्यता संकुचित नहीं थी। उनका कहना था कि मातृभूमि के प्रति भावुकता से भरे सम्बन्ध को ‘राष्ट्रीयता’ कहते हैं। उन्होंने कहा “हिन्दुस्तान मेरे खून में समाया हुआ है और उसमें बहुत कुछ ऐसी बात है जो मुझे स्वभावतः उकसाती है।” पर मातृभूमि के प्रति नेहरू जी का प्यार … Read more

नेहरू के अन्तर्राष्ट्रीयतावाद सम्बन्धी विचार

नेहरू के अन्तर्राष्ट्रीयतावाद एवं विश्वशान्ति सम्बन्धी अवधारणा विचार पं० नेहरू अन्तर्राष्ट्रीयता एवं विश्व शान्ति के प्रबल समर्थक थे। वे राष्ट्रवादी के साथ- साथ अन्तर्राष्ट्रीय भी थे। भारतीय राष्ट्रवाद को विश्वराष्ट्रवाद का ही एक अंग मानते थे। इसी आधार पर बहुत से लोगों ने उन्हें राष्ट्रवादी कम तथा अन्तर्राष्ट्रवादी अधिक कहा। इसमें काफी सत्यता भी है। वे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, मानवता, विश्व शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के घोर समर्थक थे। उनके द्वारा … Read more

नेहरू का पंचशील सिद्धान्त

नेहरू जी का अन्तर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण कोरा आदर्शवादी नहीं था। उन्होंने उसे व्यवहार में लागू करना चाहाः ज्यों-ज्यों उनकी अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति बढ़ती गई, वे अन्तर्राष्ट्रीय विचारों को मूर्त रूप देते गये। उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राज्यों के आचरण का एक नया मौलिक सिद्धान्त दिया जो ‘पंचशील’ के नाम से विख्यात है। इसमें निम्नलिखित पाँच सिद्धान्त प्रतिपादित किये गये-  (1) एक-दूसरे की प्रादेशिक अखण्डता और सर्वोत्तम सत्ता के लिए पारम्परिक सम्बन्ध, (2) … Read more

जयप्रकाश नारायण के सामाजिक विचार

जय प्रकाश नारायण के समाजवादी एवं सर्वोदयी विचारक के रूप में सत्ता के। विकेन्द्रीकरण, निर्वाचन प्रणाली में सुधार तथा दल विहीन लोकतन्त्र के विचारों महात्मा गाँधी जय प्रकाश जी को समाजवाद का सबसे बड़ा भारतीय विद्वान् मानते थे। समाजवादी होने के नाते जय प्रकाश ने इस बात को स्पष्ट किया कि सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त असमानता का मुख्य कारण यह है कि कुछ लोगों का उत्पादन के साधनों … Read more

बाल गंगाधर तिलक के राजनीतिक विचार

बाल गंगाधर तिलक राजनीतिक चिन्तन में एक यर्थाथवादी राजनेता की भूमिका अदा की। उनके चिन्तन एवं दृष्टिकोण में हमें यथार्थवाद का तत्त्व दृष्टिगत होता है, परन्तु वे मैकियावेली और थामस हाब्स के सदृश तो यथार्थवादी नहीं थे और न ही उन्होंने, प्लेटो, अरस्तू के सदृश सर्वोत्तम राज्य के लक्षणों और सम्भावना का विवेचन ही किया। जीवन में उनका मूल उद्देश्य भारत की राजनीतिक दासता से छुटकारा प्राप्त करना था इस … Read more

दयानन्द स्वरस्वती के राजनीतिक विचार

स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राजनीतिक विचारकों की भांति राजनीतिक सिद्धान्तों की व्याख्या नहीं की लेकिन देश की राजनीतिक परिस्थियों के प्रति वे पूर्णतः सजग थे। समय – समय पर उन्होंने अपने भाषणों तथा लेखों में तथा अपने ग्रन्थ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ में राजनीतिक के सम्बन्ध में जो कुछ कहा और लिखा उसी को सामूहिक रूप से उनका राजनीतिक चिन्तन कहा जा सकता है। उनके प्रमुख राजनीतिक विचारों को अग्रलिखित शीर्षकों के … Read more

दयानन्द सरस्वती के सामाजिक विचार

स्वामी दयानन्द मूल रूप से एक राजनीतिक चिन्तक न होकर एक महान् दार्शनिक तथा धार्मिक एवं सामाजिक विचारक थे। स्वामी जी का मानना था जब तक भारत में फैली सामाजिक कुरितियों का अन्त नहीं होगा, तब तक भारत का विकास सम्भव नहीं है। साथ ही उनका यह मानना था सुधार की इस प्रक्रिया में आवश्यक सभी साधन व समाग्री भारत के प्राचीन गौरवमयी संस्कृति में मौजूद हैं। समाज से सम्बन्धित … Read more

स्वामी विवेकानन्द के सामाजिक विचार

जिस समय राष्ट्र उदासीनता, निष्क्रियता और निराशा में डूबा हुआ था, उस समय स्वामी विवेकानन्द ने भारत के राष्ट्रवाद की नैतिक नींव को सिद्धान्त तथा व्यवहार दोनों ही दृष्टि से सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण योग दिया। स्वामी विवेकानन्द एक अध्यात्मवादी और महान् सृजनात्मक विभूति थे। भारत के नैतिक तथा सामाजिक पुनरुद्धार के लिए उन्होंने एक अनुप्रेरित कार्यकर्त्ता के रूप में अपना सम्पूर्ण जीवन समाप्त किया। यदि राममोहन राय, केशवचन्द्र सेन … Read more