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भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के कारण

इण्डियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना आधुनिक भारतीय इतिहास की एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटना है। इसकी स्थापना से पूर्व भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का स्वरूप असंगठित अस्पष्ट और अल्प प्रभावक था। राष्ट्रीय शक्तियाँ विश्रृंखलित थी और राष्ट्रीय स्त्र पर राष्ट्रीयता नहीं प्रकट हो रही थी परन्तु कांग्रेस की स्थापना ने सर्वप्रथम स्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण की अवधारणा प्रस्तुत की, राष्ट्रीय शक्तियों को समान उद्देश्य के लिए एकत्र किया गया था और भारत की प्रतिनिधि संस्था के रूप में अपने को प्रकट किया।

कांग्रेस के पूर्व स्थापति किये गये राजनीतिक संगठनों ने विभिन्न क्षेत्रों में कार्य सम्पादित किये, उनमें से कुछ प्रमुख थे-ब्रिटिश इण्डियन एसोसियेशन (1851), इण्डिया लीग (1857), इण्डिन एसोसिएशन (1876), पूना सार्वजनिक सभा (1867), आदि।

उन्नीसवीं सदी के शुरूआत से लेकर 1885 के दौरान भारतीयों का हृदय शनैः-शनैः राजनीतिक चेतना एवं राष्ट्रीय जागृति से ओत-प्रोत हो उठा। 1885 में इस चेतना एवं जागृति की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के रूप में संस्थात्मक अवतारणा हो गई। समग्र राष्ट्र के स्तर पर एक राजनीतिक संगठन की स्थापना की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी थी। इल्बर्ट विधेयक के फलस्वरूप उपजे विवाद ने भारतवासियों को नींद से झकझोर दिया और उन्हें देश की सेवा करने के लिए संगठन का महत्त्व समझ में आ गया। परतंत्रता के कारण होने वाले तिरस्कार, विभेद और अनादर को राष्ट्रव्यापी संगठन के द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है, यह भली-भाँति समझ लेने के कारण राष्ट्रीय जागृति और राजनीतिक चेतना राष्ट्रव्यापी संगठन के रूप में मुखरित होने के लिए बेचैन हो उठी। सन् 1883 में कलकत्ता में के अलबर्ट हाल में एक राजनीतिक परिषद् आयोजित किया गया और अगले वर्ष ही अन्तर्राष्ट्रीय परिषद् का आयोजन हुआ, जिससे अखिल भारतीय कांग्रेस की नींव डालने की प्रेरणा प्राप्त हुई। 

(1) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उद्भव-अभी तक जो संस्थाएँ स्थापित की गई थीं, वे केवल प्रांतों तक ही सिमटी हुई थीं। सन् 1883 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी के प्रयास और प्रेरणा से कलकत्ता में इण्डिन नेशनल कांग्रेस की बैठक हुई जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पूर्वगामिनी थी। उस समय के राष्ट्रीय नेता एक राष्ट्रीय संगठन बनाने के पक्षधर थे, जिनमें भारतीय लोक सेवा के एक पद निवृत अधिकारी एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम अग्रणी थे। कुलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातकों को ह्यूम ने। मार्च 1883 को भारत को मानसिक, सामाजिक एवं राजनैतिक उत्थान के मार्ग पर ले चलने के लिए एक खुले पत्र के द्वारा ओह्वान किया। इसी सन्दर्भ में 1884 में मद्रास के अड्यार नामक स्थान पर थियोसोफिकल सोसाइटी के वार्षिक अधिवेशन के समय सत्रह प्रमुख व्यक्तियों की एक बैठक दीन बहादुर रघुनाथ राव के निवास पर आयोजित की गई। इसी बैठक में इण्डियन नेशनल यूनियन की स्थापना करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया। अखिल भारतीय काँग्रेस का विचार वस्तुतः किसके मस्तिष्क में उपजा। यह ठीक-ठीक कह पाना तो लगभग असम्भव-सा है किन्तु कम से कम इतना तो सर्व विदित ही है कि भारत के लोग एक राष्ट्र स्तरीय संगठन की आवश्यकता की अनुभूति कर ही रहे थे और इस मामले में सक्रिय पहल करने का श्रेय ह्यूम को ही प्राप्त है। यह ह्यूम की ही मान्यता थी कि एक ऐसी संस्था स्थापित की जाय जो ब्रिटिश शासन की बढ़ती हुई विरोधी शक्तियों के प्रति सुरक्षा कवच के रूप में कार्यरत रहे।

इस सन्दर्भ में ए० ओ० ह्यूम ने उस समय के गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन से विचार-विमर्श किया और लार्ड डफरिन जब संतोष का वैधानिक निदान खोजने की जोरों से कोशिश कर रहे थे जबकि प्रस्तावित संस्था को वे राजनैतिक स्वरूप प्रदान करने के पक्षधर थे। इसलिए लार्ड डफरिन ह्यूम के विचारों को समर्थन प्रदान करते हुए यह इच्छा व्यक्त की कि यह उसी भूमिका का निर्वाह करे जिस भूमिका का निर्वाह ग्रेट ब्रिटेन का विरोधी दल करता था। । इस इस तरह तरह लार्ड डफरिन के वरदहरत के लिए आश्वस्त होने के पश्चात् ह्यूम महोदय इंग्लैण्ड गये वहाँ के नेताओं से राय-मशविरा करने के लिये। उसके समर्थन के लिए आश्वस्त होकर ह्यूम महोदय भारत वापस आ गये। भारत वापस होकर ह्यूम का यह सप्रयास ही था कि 28 दिसम्बर 1885 को 11 बजे अपराह्न, बम्बई में कांग्रेस का राष्ट्रीय सम्मेलन गोकुल दास तेजपाल संस्कृति कॉलेज में आयोजित हुआ जिससे औपचारिक रूप से. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। इस सम्मेलन में देश के विभिन्न भागों से आये 72 प्रतिनिधि थे। इस सम्मेलन का सभापतित्त्व व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने किया। इतने वृहद् और व्यापक प्रतिनिधित्त्व वाला सम्मेलन भारत के इतिहास में कभी भी सम्पन्न नहीं हुआ था। इस अधिवेशन में दादा भाई नौरोजी, काशीनाथ तैलग, नारायण गणेश चन्द्रवरकर, पी० आनन्दचालू, वी० राघवाचार्य, एस० सुब्रह्मण्यम् अय्यर, दीनशा राहलजीवाचार्य, दीवान बहादुर रघुनाथ राव, गंगा प्रसौद वर्मा, महादेव प्रसाद रानाडे, फिरोज शाह मेहता, श्री राघवाचार्य आदि प्रमुख व्यक्तियों ने भाग लिया। यह समस्त कार्यवाही सरकारी उत्सुकता से सम्पन्न हुई। सर विलियम वेण्डरबर्न एवं रानाडे जैसे सरकारी अधिकारी भी इस अधिवेशन में सम्मिलित हुए।

(2) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उद्देश्य एवं लक्ष्य-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के स्थापना के पीछे निहित उद्देश्यों के सम्बन्ध में परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों का प्रतिपादन किया गया है। विद्वानों का एक समूह मानता है कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश साम्राज्य के रक्षार्थ हुई थी, जबकि दूसरे समूह की मान्यता ता है कि यह भारतीय राष्ट्रीयता का माध्यम था।

विद्वानों के प्रथम समूह ने समर्थन में दो तर्क प्रस्तुत किये। पहला तर्क यह है कि ‘कांग्रेस के जनक’ ए० ओ० ह्यूम एक सेवानिवृत्त अंग्रेज अधिकारी थे, जिन्हें तत्त्कालीन वाइसराय लार्ड डफरिन और अनेक ब्रिटिश राजनीतिज्ञों का वरदहस्त प्राप्त था। ब्रिटिश शासकों की ‘पूर्व निश्चित गुप्त योजना’ के अधम (नीच) इरादों का साधन बन कर ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना की भगीरथ प्रयत्न किया। दूसरा तर्क यह था कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से यह स्पष्ट हो चुका था कि ब्रिटिश शासन के विरुद्ध भारतियों में असंतोष की भावना अत्यधिक प्रबल थी और दूसरा सशस्त्र संग्राम कभी भी पुनः छिड़ सकता था। भारतीयों में राष्ट्रीय भावना क्रमशः बलवती होती जा रही थी जिससे ब्रिटिश शासन को खतरा था। इसलिए वे किसी एक ऐसे माध्यम को खोजने में लगे थे जिससे भारतीयों पों में विद्यमान असंतोष और क्रांतिकारी भावना को वैधानिक प्रवाह में बदला जा सके।

अपनी पुस्तक ‘यंग इण्डिया’ में लाला लाजपत राय ने इस विचारधारा की पुष्टि इस प्रकार की थी- “कांग्रेस की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजी साम्राज्य को खतरे से बचाना था, भारत की राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करना नहीं। ब्रिटिश साम्राज्य का हित प्रमुख था, भारत का गौण और यह कोई नहीं कह सकता कि कांग्रेस ने इस उद्देश्य का पतन नहीं कियो।” 

दूसरे दृष्टिकोण की मान्यता है कि कांग्रेस की स्थापना का उद्देश्य भारतीय राष्ट्रीयता को एक राष्ट्रव्यापी संगठन द्वारा अभिव्यक्त करना था। वस्तुतः कांग्रेस की स्थापना सच्चे देश प्रेम और राष्ट्रीयता के भाव से किया गया था। भारतीय राष्ट्रवादी इस दूसरी मान्यता को कहीं अधिक तार्किक और सही मानते हैं। लाला लाजपत राय के शब्दों में, “श्री ह्यूम के उद्देश्य सच्चे थे, उनके विचार उच्च थे। उनके हृदय में स्वतंत्रता की गहरी भावना थी और उनका हृदय भारत की निर्धनता और दुर्दशा पर रोता था।” यह विश्वास है कि ह्यूम ने सच्चे और पवित्र उद्देश्य से कांग्रेस की स्थापना की थी। उन जैसे उदारवादी और स्वतंत्रता प्रेमी के बारे में यह कहना कि उन्होंने ‘पूर्वनिश्चित गुप्त योजना’ अथवा ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा के लिए ‘सुरक्षा नली’ के रूप में कोग्रेस की स्थापना की, उन जैसे महान् व्यक्ति के प्रति अन्याय होगा।

सन् 1885 में कांग्रेस के इस प्रथम अधिवेशन का अध्यक्षीय भाषण देते हुए व्योमेश चन्द्र बनर्जी ने कांग्रेस के निम्नांकित उद्देश्य बतलाये थे-

(i) समाज के विभिन्न भागों में देश हित के लिए लगनपूर्वक कार्य करने वाले लोगों के बीच घनिष्टता एवं मित्रता स्थापित करना;

(ii) समस्त भारतवासियों में वंश, धर्म एवं प्रान्त सम्बन्धी तमाम पूर्व-दूषित संस्कारों को मिटाना और राष्ट्रीय एकता की भावना का पोषण करना;

(iii) भारत के शिक्षित लोगों के बीच चर्चा होने के पश्चात् महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक प्रश्नों पर महत्त्वपूर्ण सम्मतियों का संग्रह करना; तथा

(iv) देश के हित के लिए ऐसे साधनों एवं दिशाओं का निर्णय करना, जिनके द्वारा भारत के राजनीतिज्ञ देशहित के कार्य करें।

इसकी स्थापना और गठन में विभिन्न कारणों और परिस्थितियों ने योगदान किया है, जिनमें से कुछ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारणों का विवेचन अग्रलिखित है-

• (क) तात्कालिक कारण यही नहीं, अभाव, अकाल निर्धनता, महामारी तथा कष्टों एवं परेशानियों के अन्य दौरे के बीच से भारत गुजर रहा था। असंतोष की आग से सारा भारत धू-धू करके जल रहा था। बेरोजगारी और महामारी के मार से सारा भार दबा जा रहा था। ब्रिटिश सरकार इन समस्याओं से समस्त देश वातावरण आप्लावित और यह अशांति से निपटने और इनके निराकरण की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दे रही थी। राजनीतिक अशान्ति से समस्त देश का वातावरण आप्लावित था और यह अशांति दिनों दिन उग्ररूप धारण करती जा रही थी। ऐसे वातावरण में राष्ट्रीय स्तर पर जिस राजनीतिक संगठन के गठन और स्थापना की आवश्यकता तीव्रता से अनुभव की जा रही थी उसकी चरम परिणति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के रूप में हुई।

(ख) भारतीय राष्ट्रीय जागरण एवं चेतना का अभ्युदय-अंग्रेजों द्वारा चलाई जा रही जातिगत भेद की नीति, धार्मिक कारण, आर्थिक कारण, लार्ड लिटन का साम्राज्यवादी शासन, यातायात के साधनों में वृद्धि, भारतीयों को उच्च सरकारी पदों से वंचित रखा जाना, विदेशी घटनाएँ, ‘भारतीय समाचार पत्र और साहित्य का योगदान, इल्बर्ट बिल विवाद, आदि कारणों ने राष्ट्रीय चेतना और जागरण को तेज गति प्रदान करके विकसित होने में अभूतपूर्व योगदान दिया, जिससे भारतीयों में स्वतंत्रता एवं लोकतंत्र की आकांक्षा हिलोरें लेने लगी। इस राष्ट्रीय चेतना की चरम परिणति भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना था।

(ग) अंग्रेजी राज्य की सुरक्षा की भावना अनेक लोगों की धारणा है कि कांग्रेस के जन्म के पीछे निहित अनेक कारणों में से एक प्रमुख था-अंग्रेजी राज्य की सुरक्षा की भावना। रजनी पामदत्त के शब्दों में, “ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से निर्धारित तिथि के अन्तर्गत तथा उसके पहल पर, वाइसराय के साथ गुप्तरूप से प से पूर्व निर्धारित एक योजना के अनुसार राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना वास्तव में इस उद्देश्य से की गई थी कि वह भारत में अंग्रेजी साम्राज्य का संरक्षण भारतीय जनता के बढ़ते हुए असंतोष तथा अंग्रेज विरोधी भावना से कर सके। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जनक एलेन ऑक्टेवियन ह्यूम ने अपने दोस्त ऑकलैण्ड कॉलविन से अपने विचार व्यक्त करते हुए बतलाया था- “ब्रिटिश साम्राज्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए तथा ब्रिटिश साम्राज्य विरोधी बढ़ती हुई। शक्तियों को निकाल देने के लिए सुरक्षा नली का काम करने वाली एक राष्ट्रव्यापी संस्था की इस समय बड़ी आवश्यकता है।” इन विचारों से स्पष्टतः यह बात प्रतिपादित हो जाती है कि कांग्रेस की स्थापना के पीछे निहित विभिन्न कारणों में से एक था-ब्रिटिश साम्राज्य की सुरक्षा और इसके हितों की पूर्ति।

(घु) ह्यूम का सद्भावनापूर्ण व्यवहार-भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जनक एलेन आटेवियन हाम जहाँ एक ओर ब्रिटिश साम्राज्य की रक्षा करने के लक्ष्य से कांग्रेस की स्थापना के लिए प्रेरित हुए थे, वहीं एक उदारचेता अंग्रेज होने के कारण उन्हें भारतीयों के दकियानूसी दृष्टि, उदासीनता आदि से दुख था और उनके मन पिछड़ेपन, गरीबी, में भारतीयों के लिए सद्भावनापूर्ण भावनाएँ कूट-कूट कर भरी हुई थीं और भारत के प्रति उनकी सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि के कारण भी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना करने के लिए वे उत्साहित हुए थे। ह्यूम एक सेवा निवृत्त अंग्रेज अधिकारी थे और उनका दिल-दिमाग भारतीयों के प्रति सहानुभूति एवं सद्भाव से ओत-प्रोत था। वे भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना उद्भूत करने के लिए कटिबद्ध थे। 

(ङ) ब्रिटिश सरकार का सहयोग कांग्रेस की स्थापना में ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी एक कारण था। ह्यूम ने कांग्रेस की स्थापना-सम्बन्धी योजना को तत्त्क्तकालीन गवर्नर जनरल लार्ड डफरिन को बतलाया और उन्होंने इस योजना का समर्थन भी किया। लार्ड डफरिन भारतीय जनता के असंतोष का वैधानिक समाधान खोजने में तल्लीन थे और कांग्रेस निर्माण की प्रस्तावित योजना में उन्हें इस समाधान का मार्ग प्रशस्त होने की आशा दिखी। इसलिए इस संस्था को वे राजनैतिक संस्था का रूप देना चाहते थे। इसलिए लार्ड डफरिन ने ह्यूम के इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि वह उस रूप में कार्य करें जिस रूप में ग्रेट बिटेन में सुम्राट का विरोधी दल करता है। लार्ड डफरिन का वरदहस्त प्राप्त करने के उद्देश्य से ह्यूम इंग्लैण्ड गये और वहाँ के नेताओं से भी विचार विमर्श एवं परामर्श किया। उनका आशीर्वाद प्राप्त करके भारत लौट कर ह्यूम कांग्रेस की स्थापना के प्रयास में पूर्ण मनोयोग से जुट गये। जिसके फलस्वरूप 28 दिसम्बर 1885 को 12 बजे दिन में बम्बई के गोकुलदास तेजपाल में एक राष्ट्रीय सम्मेलन (इण्डियन नेशनल यूनियन) आयोजित हुआ और इसी सम्मेलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अस्तित्त्व में आयी।

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