Test Examine

भारतीय राजनीतिक चिंतन के विभिन्न स्रोतों की व्याख्या

हिन्दू राज्य का इतिहास वैदिक काल से प्रारम्भ होता है और मुगल काल तक फैला है। वैदिक व महाकाव्य काल में राजनैतिक इतिहास का निश्चित और क्रमबद्ध रूप उपलब्ध नहीं है। इस काल की जो कुछ भी जानकारी प्राप्त है वह प्रचीन साहित्य तथा वेदों, ब्राह्मणों, धर्म सूत्रों, उपनिषदों, पुराणों, महाकाव्यों जैन व बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर है। इस के अतिरिक्त प्राचीन भारत की शासन पद्धति पर अन्य उपलब्ध साक्ष्य अथवा सामग्री के रूप में कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कामन्दकीय नीतिसार, शुक्रनीतिसार विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इसके अतिरिक्त कुछ ग्रीक (यूनानी) लेखकों द्वारा लिखे गए ग्रन्थ, अरब देश के विद्वानों द्वारा लिखे गए ग्रन्थों एवं संस्कृत साहित्य के ग्रन्थों जैसे पाणिनि के (व्याकरण) कालिदास के रघुवंश तथा विशाखदत्त द्वारा विरचित (मुद्राराक्षस) आदि प्रसिद्ध ग्रन्थों से भी इस विषय में जानकारी मिलती है। सामान्यः प्राप्त सामग्री को दो वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं- 

(1) साहित्यिक सामग्री

(2) पुरातत्त्व सम्बन्धी सामग्री

साहित्यिक सामग्री

डॉ० जायसवाल का मत है कि हिन्दू राजनीतिशास्त्र सम्बन्धी साहित्य की रचना ई० 650 से पूर्व प्रारम्भ हो चुकी थी। कौटिल्य का अर्थशास्त्र ई० पूर्व का माना गया है। जिसमें 1800 से भी अधिक आचायर्यों के नाम दिये गये हैं। जिनको राजनीतिशास्त्र का व्याख्याता माना जाता है। 

वैदिक साहित्य 

यह प्राचीनतम ज्ञातव्य साहित्यिक स्रोत है। ऋग्वेद, अर्थर्ववेद में राज्य व्यवस्था के सम्बन्ध में कहीं-कहीं उल्लेख करते हैं। ये तत्कालीन राजा व व्यवस्था का उल्लेख करते हैं। ब्राह्मण ग्रन्थों में भी राजनीति विषयक अनेकों प्रसंग है। इनमें राजपद की प्रतिष्ठा, राजतिलकं, राजा द्वारा किये जाने वाले यज्ञों का वृतान्त, राजकर्मचारियों के कर्त्तव्य एवं कर व्यवस्था आदि का उल्लेख है।

महाभारत-

महाभारत के शान्तिपर्व में राजधर्म वर्ग के अन्तर्गत हिन्दू राजनीति से सम्बन्धित प्रश्नों पर विचार किया गया है। इसमें राजा के कर्तव्य एवं शासन व्यवस्था के अभिन्न अंगों का वर्गन किया गया है। शान्तिपर्व में अनेक प्रसंगों के अन्तर्गत राजनीतिक विषयों का प्रतिपादन है।

डॉ० वी० पी० वर्मा के अनुसार, “The Arthasashtra of kautilya is decidedly the most important work in Hindu Political thought.” डॉ० बेनी प्रसाद ने इसे काफी महत्त्व दिया है, वे लिखते हैं-

“As a scheme of administrative organisation the Arthashashtra unsupposed in Hindu Literature. It is completed in its prospective, detailed in its regulations, through in its treatment, It is a statement of Hindu administra- tive theory, it them leaves hardly any thing to be desired.” 

स्मृतियाँ-

महाकवि भास के ग्रन्थों में बृहस्पति के अर्थशास्त्र का वर्णन आया है। महाकवि वाण के समय में नारद स्मृति भी उल्लेखनीय है जिनका रचना काल दो सौ ई० पू० से लेकर दूसरी शताब्दी तक माना गया है। इन विभिन्न स्मृतियों में राजा के कार्य, राज कर्मचारियों के कार्य, दण्ड विधान, राष्ट्रनीति आदि विषयों का उल्लेख किया गया है।

कामन्दकीय नीतिसार-

डॉ० अल्तेकर के अनुसार कामन्दकीय, नीतिसार गुप्तकालीन युग अर्थात् 500 ई० के आस पास लिखा गया है। कामन्दकीय नीतिसार कौटिल्य के ग्रन्थ का छन्दोबद्ध संक्षेपीकरण मात्र है। कामन्दकीय नीतिसार के मूल लेखक का प्रामाणिक परिचय अभी तक ज्ञात नहीं हो सका था। प्रो० जायसवाल के अनुसार द्वितीय चन्द्रगुप्त के मन्त्री शिखर स्वामी इसके लेखक थे। लेकिन डॉ० अल्तेकर इसे प्रामाणिक नहीं मानते क्योंकि विशाखदत्त तथा दण्डी ने इसका कोई उल्लेख नहीं किया है। इसमें राजतन्त्रीय पद्धति का पूर्ण विवेचन है लेकिन गणतन्त्र का कोई उल्लेख नहीं है।

शुक्रनीतिसार-

इस काल में ब्रहस्पत्य सूत्र, चाणक्य सूत्र एवं शुक्रनीति पर ग्रन्थ लिखे गये हैं। “शुक्रनीतिसार” ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। महाभारत में इसे एक हजार अध्याय वाला ग्रन्थ कहा गया है। कौटिल्य के मतानुसार शुक्र ने दण्ड नीति को हो एक मात्र विद्या माना है। इसमें राजतन्त्रीय व्यवस्था पर विचार है। दण्डनीति और राष्ट्रनीति से सम्बोधित विषयों पर भी प्रकाश डाला गया है।

बौद्धग्रन्थ-

बौद्धग्रन्थों में आदि ग्रन्थ त्रिपिटिक जातक में जो तत्त्कालीन व्यवस्था के जीवित चित्रित हैं, वे मौर्यकाल से पूर्व तथा बाद तक लिखे गये। बौद्ध ग्रन्थ में राजा के दस कर्त्तव्यों का भी उल्लेख मिलता है जैसे-दानशीलता, नैतिक आचरण, त्याग, सत्य, नम्रता, क्षमा, आदि। उनके कर्तव्यों में न्याय कार्य प्रमुखता दी गई। इस काल में सभा और समिति की उपस्थिति का भी भास होता है।

पुराण-

पुराण साहित्य में समस्त प्राचीन साहित्य सम्मिलित हैं जिनमें भारत के धर्म, इतिहास, आख्यान आदि का वर्णन है। पुराणों का रचना काल स्मृतियों से भी विस्तृत रहा है। पुराणों में राजनीतिक विचार बिखरे हुए हैं। वायुपुराण, अग्निपुराण आदि का राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अधिक महत्त्व है। उनके अनुसार राज्य एक नैतिक संघ है, जिसमें राजा जन कल्याण का सर्वोच्च साधन है। मार्कण्डेय पुराण, विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण आदि में प्राचीन इतिहास का पर्याप्त वर्णन है।

अन्य साहित्य-

इसके अन्तर्गत संस्कृत के अन्य ग्रन्थ, विदेशी लेखकों के ग्रन्थ आते हैं। संस्कृत में पाणिनी का व्याकरण विशाखादत्त का मुद्रा राक्षस, कालिदास का रघुवंश, बाण की कादम्बरी शूद्रक का मृच्छकटिक, प्रबोध चन्द्रोदय, संबंध का वासदत्त, पंचतंत्र, सोमदेव का कथासरित सागर, दण्डी का दशकुमार चरित और बाण का हर्ष चरित उल्लेखनीय है। इनमें राजनीतिक का प्रत्यक्ष वर्णन है।

विदेशी स्त्रोत-

ग्रीक लेखकों में मेगस्थनीज की ‘इंडिका’ जिसमें मौर्यकालीन राजनीतिक नियमों राजाओं का वर्णन है और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से पर्याप्त समानता रखता है।

यूनानी स्रोतों के अतिरिक्त लैटिन सामग्री ने भी भारतीय राजनीति के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सूचना प्रदान की है। प्लिनी ने भारतीय व इटली के राज्यों के सम्बन्धों का विवरण दिया है। रोम के सम्राट आगस्टत्त ने सिन्य तक अपने साम्राज्य का स्वप्न देखा था। इस प्रकार यूनानी साहित्य प्रमाणिक व अप्रामाणिक सामग्री से भरपूर है।

चीनी स्रोतों से भारतीय शासन प्रणालियों का परिचय मिलता है। तथा फाहियान, हिंच, त्सांग, वांग हिनान्तेरी आदि के साहित्य से तत्त्कालीन व्यवस्था अभासित होती है। तिब्बत के साहित्य द्वारा भी यहाँ की राजनीतिक दशाओं का परिचय मिलता है। लेकिन ये सभी विदेशी स्रोत पूर्ण प्रमाणिक नहीं है। तथा अपने तथ्यों में निरन्तरता नहीं रखते हैं।

पुरातत्त्व सम्बन्धी स्रोत

साहित्य के अतिरक्त तीन अन्य पुरातत्त्व सम्बन्धी स्रोत भारतीय शासन पद्धति के अध्ययन के लिए अनिवार्य है जो निम्न है।

(1) शिला लेख,

(2) ताम्र लेख,

(3) मुद्रा लेख।  

प्राचीन काल में शिलालेखों का अभाव है। सम्राट अशोक के पूर्व के शिलालेख नहीं मिलते हैं। सबसे प्राचीन प्राप्य शिलालेख अशोक कालीन ही है। इनसे स्पष्ट है कि सम्राट अशोक ने 279 से 232 ई० पूर्व० तक शासन किया। ई० पू० तीसरी शताब्दी से बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु चट्टानों और स्तम्भों पर राज आदेश खुदवाये गये। इनसे भारत का तत्त्कालीन, राजनीतिक धार्मिक भाषायी दशाओं की जानकारी मिलती है।

ताम्रपत्रों पर अंकित लेखों से भी पर्याप्त जानकारी मिली है। प्रो० अल्तेकर के अनुसार ताम्रपत्र राज्य कवियों द्वारा लिखे जाते थे जिनमें अतिश्योक्ति की भावना बनी रहती थी।

प्राचीन शासकों की मुद्रायें भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है। मुद्राओं के अंकन से गणतन्त्रीय पद्धति का विवरण मिलता है। नगर राज्यों की व्यवस्था का अंकन मिलता है। शिधि, अर्जुनायन, कुगिंणद यौधेय आदि गणतन्त्रों का अस्तित्त्व मुद्रा लेखों से स्पष्ट है। 

Leave a comment