Test Examine

महाभारत काल का युद्ध

विधान भी पूर्णतः नैतिक था। क्षत्रिय यशोपार्जन, वीरगति तथा अपने स्वामी और अपने नेता के लिए युद्ध करते थे। तत्कालीन समय में युद्धकालीन कुछ नैतिक व्यवस्थाएँ थीं। पतित, कायर, स्त्री, स्त्रीनामधेय, नपुंसक, पराजित या घायल व्यक्ति, शरणागत, शस्त्रहीन, कवचहीन आदि पर प्रहार नहीं किया जाता था। युद्ध प्रायः दिन में होते थे एवं सूर्यास्त के बाद युद्ध बन्द कर दिया जाता था। नियमानुसार युद्ध की घोषणा होती थी। आक्रमण या प्रहार करने के पूर्व विरोधी अथवा शत्रु को सूचित करना नैतिक मान्यता थी। विश्वास देकर धोखा करना अथवा घबराहट में डालकर प्रहार करना अथवा छलना अनुचित माना जाता था परन्तु शत्रु-प्रदेश को नष्ट करना अथवा उसे अग्नि से भस्म कर देना नीतिपूर्ण माना जाता था। इसी प्रकार शत्रु की सेना में फूट डालना अथवा द्वेष फैलाकर उसकी शक्ति क्षीण कर देना राजनीति मानी जाती थी। कभी-कभी कूटनीति और छलनीति से भी शत्रु का दमन किया जाता था। महाभारत काल में युद्ध में पराजित व्यक्तिओं को कभी-कभी दास के रूप ४में परिणित कर दिया जाता था। यदि कोई विजेता अपने विरोधी या पराजित व्यक्तियों को कैद कर लेता था, तो वह एक निश्चित अवधि तक उसका दास रहता था। यदि विजेता ऐसे व्यक्ति को अपनी दासता से मुक्त कर देता था तो वह उसे गुरु या पिता के समान ही मानता था।

महाभारत में युद्ध में दुर्योधन ने अनीति, छल-कपट और कूटनीति आदि से अपने शत्रु पांडवों को पराजित करने और उनका सर्वनाश करने के लिए अनेक प्रयास किये। कृष्ण नै द्रोणाचार्य का वध कराने के लिए सत्यवादी युधिष्ठिर से मिथ्या भाषण कराया, कौरवों के सैनिकों तथा सेना अधिकारियों ने छल-कपट से अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु का वध किया। कूटनीति, छलनीति, अनीति के प्रयोग के बाद भी योद्धाओं और सैनिकों के कुछ युद्ध- सम्बन्धी नैतिक नियम थे जिन्हें तत्कालीन योद्धा पूर्णतः मानते और उसका पालन करते तो क्षत्रिय युद्ध करना अपना जातिगत कर्त्तव्य समझते थे और युद्धभूमि में युद्ध करते हुए मृत्यु को प्राप्त करना श्रेष्ठ धर्म मानते थे।

Leave a comment