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बाल गंगाधर तिलक के राजनीतिक विचार

बाल गंगाधर तिलक राजनीतिक चिन्तन में एक यर्थाथवादी राजनेता की भूमिका अदा की। उनके चिन्तन एवं दृष्टिकोण में हमें यथार्थवाद का तत्त्व दृष्टिगत होता है, परन्तु वे मैकियावेली और थामस हाब्स के सदृश तो यथार्थवादी नहीं थे और न ही उन्होंने, प्लेटो, अरस्तू के सदृश सर्वोत्तम राज्य के लक्षणों और सम्भावना का विवेचन ही किया। जीवन में उनका मूल उद्देश्य भारत की राजनीतिक दासता से छुटकारा प्राप्त करना था इस दिशा में एक व्यावहारिक राजनेता के रूप में उनके कार्यकलाप रहे। 

स्वराज्य सम्बन्धी विचार (अवधारणा) 

राजनीतिक क्षेत्र में तिलक की सबसे बड़ी देन ‘स्वराज्य’ की अवधारणा थी। 1916 में उन्होंने सम्पूर्ण भारत को यह मन्त्र प्रदान किया था कि ‘स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है।’ ‘स्वराज्य’ का शब्दार्थ’ अपना राज्य’ है।

स्वराज्य प्राप्ति के साधन या उपाय 

तिलक ने उन साधनों अथवा उपायों का भी उल्लेख किया है जिनके द्वारा स्वराज्य प्राप्त किया जा सकता है। स्वराज्य को नैतिक कर्तव्य मानते हुए उन्होंने कहा था-“स्वराज्य एक अधिकार ही नहीं वरन् एक धर्म भी हैं।” स्वराज्य प्राप्त किया जाता है, प्रार्थना व विजय के द्वारा अंग्रेज स्वराज्य नहीं दे सकते।

भारतीयों को भी स्वराज्य का अधिकार अपने उग्र प्रयत्नों अथवा क्रियात्मक उपायों से प्राप्त करना होगा। स्वराज्य प्राप्ति के जो साधन तिलक ने बताये वे इस प्रकार हैं- 

(1) राष्ट्रीय शिक्षा

(2) स्वदेशी

(3) बहिष्कार

(4) निष्क्रिय प्रतिरोध

1. राष्ट्रीय शिक्षा-

राष्ट्र की उन्नति और अभ्युत्थान के लिये प्रथम महत्त्वपूर्ण साधन शिक्षा है। श्री तिलक इस बात को अपने छात्र जीवन से ही समझते थे और तत्त्कालीन शिक्षा प्रणाली की कमियों तथा दोषों को भली-भाँति जानते थे। अतः उन्हें दूर करने के लिये सर्वप्रथम उन्होंने जैसुइट सम्प्रदाय के ईसाई मिशनरियों की भाँति एक नवीन शिक्षा संस्था बनाने का निश्चय किया। 2 जनवरी, 1880 को उन्होंने पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल की स्थापना की। स्वदेशी आन्दोलन के दिनों में वे महाराष्ट्र में राष्ट्रीय शिक्षा के आन्दोलन को बड़ी तेजी से चलाते रहे।

2. स्वदेशी-

स्वतंत्रता प्राप्ति का द्वितीय साधन स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग और व्यवहार था। लोकमान्य तिलक 1897 ने में महारानी विक्टोरिया के हीरक जयन्ती समारोह के अवसर पर ‘केसरी’ में प्रकाशित अपने तीन लेखों में यह स्पष्ट किया था कि ब्रिटिश शासन ने किस प्रकार भारत के पुराने उद्योग-धन्धों और दस्तकारियों का ह्रास हुआ है।

अतः भारतीयों को स्वयमेव स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग का प्रण लेकर इन उद्योग-धन्धों के विकास में सहायक बनना चाहिये। आयरलैण्ड में आयरिश लोगों ने भी स्वराज्य के लिये अपने सिन फीन आन्दोलन में इसी प्रकार स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया था। श्री तिलक स्वदेशी के प्रयोग से भारत की आर्थिक उन्नति करना चाहते थे, अपने दैनिक जीवन में वे स्वदेशी वस्तुओं का ही व्यापार करते थे।

3. बहिष्कार-

स्वराज्य प्राप्ति का तृतीय साधन विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार या बायकाट था। जनवरी 1907 में इलाहाबाद में एक भाषण देते हुए लोकमान्य तिलक ने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के कार्यक्रम पर बहुत बल दिया था। इस विषय 1906 में कलकत्ता में हुए अधिवेशन में कांग्रेस एक प्रस्ताव भी पास कर चुकी थी। यह साधन स्वदेशी का पूरक था। भारतीयों के लिये न केवल स्वदेशी वस्तुओं का व्यवहार पर्याप्त था, अपितु इसके साथ-साथ विदेशों, विशेषतः इंग्लैण्ड से आने वाली वस्तुओं का बहिष्कार भी आवश्यक था।

4. निष्क्रिय प्रतिरोध (असहयोग का सिद्धान्त)-

स्वराज्य प्राप्ति का चतुर्थ साधन निष्क्रिय प्रतिरोध या असहयोग का सिद्धान्त था। 2 जनवरी, 1907 को अपने नवीन दल के सिद्धान्तों पर लोकमान्य तिलक ने भाषण देते हुए इसका सुस्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन किया था और यह कहा था कि “ब्रिटिश सरकार भारतीयों के सहयोग और सहमति से ही भारत पर शासन कर रही है। यदि हम सरकार को यह सहयोग देना बन्द कर दें तो वह क्षण मात्र के लिये भी कार्य नहीं कर सकती है। इस प्रकार सरकार का प्रतिरोध करना और उसके कानून को स्वीकार न करना निष्क्रिय प्रतिरोध है।

अतः निष्कर्षतयः हम कह सकते हैं कि स्वराज्य प्राप्ति के उपरोक्त उपायों के कारण ही “तिलक जी उग्रवादियों की उपाधि मिली थी।”

राजनीतिक स्वतंत्रता (स्वाधीनता) एवं समाज सुधार सम्बन्धी विचार

तिलक उदारवादियों के समान समाज सुधार की पाश्चात्य परम्परा का अनुसरण नहीं करना चाहते थे। उनका विचार था कि राजनीतिक आन्दोलन के लिये पहले सामाजिक सुधार की आवश्यकता नहीं है बल्कि राजनीतिक स्वाधीनता सामाजिक सुधार का पूर्ववर्ती कार्य है। तिलक ने इस तर्क को अस्वीकार किया कि समाज सुधार राजनीतिक प्रगति और मुक्ति की अपरिहार्य पूर्व शर्त है। वे इस धारण पर डटे रहे कि राजनीतिक अधिकार प्राथमिक तथा निरपेक्ष महत्त्व की वस्तु है और अधिकाधिक राजनीतिक अधिकारों को प्राप्त करना भारत की सर्वोच्च आवश्यकता है।

तिलक के अनुसार समाज सुधार के कार्य में शक्ति व्यय न करके पहले सम्पूर्ण शक्ति राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने के अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य में लगा दी जाये। राष्ट्रीय जागरण पहला कार्य है। राजनीतिक स्वतंत्रता से हमें स्वराज्य प्राप्त होगा और तब सामाजिक सुधार कार्य करना सरल होगा।

सामाजिक सुधारों से पूर्व राष्ट्रीय जागरण की बात करना तिलक की दूरदर्शिता का परिचायक है। उनका यह कहना ठीक था कि यदि विदेशी शासन के रहते हुए सामाजिक सुधारों को प्राथमिकता दी गयी तो ये सुधार भारत की आदर्श परम्पराओं एवं महान् संस्कृति के अनुकूल न होकर पश्चात्य सभ्यता, संस्कृति एवं चकाचाध से प्रभावित होगे। तिलक राजनीतिक आन्दोलन और सामाजिक सुधारों को एक साथ मिलाने के पक्ष में नहीं थे। तिलक के शब्दों में, “मैं अपनी हल करने में रहा। के राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न को के कार्य को अपने हाथों से कर ले सम्पूर्ण शक्ति चाहिये कि हूँ कुछ अन्य लोगों को लें।”

सारांशतः तिलक समाज सुधारों को कानून के माध्यम से क्रियान्वित करने के पक्ष में न थे। वे सामाजिक सुधारों को उचित सामाजिक शिक्षण के माध्यम से क्रियान्वित कराना चाहते थे। वे भारत की प्राचीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक धरोहर को विच्छिन्न नहीं करना चाहते थे।

यह धारणा मिथ्या है कि तिलक पुरानतवादी और रूढ़िवादी थे जिनमें धार्मिक और सामाजिक सुधारों के प्रति कोई अभिरुचि नहीं थी। सत्यता तो यह है कि तिलक पाश्चात्य आधार पर सामाजिक परिवर्तन लाने के विरुद्ध थे। यह सही है कि उन्होंने सामाजिक सुधारों से पहले राजनीतिक सुधारों को प्राथमिकता दी। वे राष्ट्रवादी थे इसलिये उन्होंने राजनीतिक मुक्ति को प्राथमिकता दी। वे इस बात के विरुद्ध थे कि विदेशी नौकरशाही सरकार भारत के सामाजिक और राजनीतिक सुधार के क्षेत्र में हस्तक्षेप करे। वस्तुतः उन्होंने समाज में प्राचीन आदर्शों और

मूल्यों का पक्ष लिया और भारतीयों को पश्चिम का अन्धा भक्त न बनने की चेतावनी दी। तिलक के सामाजिक दर्शन का निचोड़ यही है कि वे सामाजिक परिवर्तन क्रमिक और सावयवी रूप में पसन्द करते थे तथा पश्चिमीकरण की प्रवृत्ति के विरोधी थे।

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