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प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन, पश्चिमी राजनीतिक चिंतन से अत्यन्त प्राचीन है। भारत में राजंतत्रीय और गणतंत्रीय शासन प्रणालियाँ प्रांचीन यूनानी नगर राज्यों की शासन प्रणालियों से भी पहले विकसित हो चुकी थीं। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतकों ने प्राचीन पश्चिमी राजनीतिक चिन्तकों से पहले ही राज्य की नीति और शासन प्रणाली से सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किये थे। भारत के अतीत में जिन राजनीतिक परम्पराओं को व्यवहार एवं विचारों में अपनाया गया उनकी अपनी कुछ विशेषताएँ थीं। प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन प्राचीन काल में निर्विवाद

रूप से मानव सभ्यता के उच्चतम शिखर पर था। उसमें जहाँ एक ओर भौतिक अभिवृद्धि तथा आध्यात्मिक चेतना के दर्शन होते हैं, वहीं सामाजिक राजनीतिक चिन्तन में स्थायित्त्व, परिपक्वता तथा कल्याणकारी स्वमार्ग का दर्शन भी होता है। इसके साथ-साथ राज्य शास्त्र के गम्भीर अनुशीलन, अध्ययन और चिन्तन के फलस्वरूप अनेक राजनीतिक सिद्धान्तों का निर्माण भी देखने को मिलता है। प्राचीन विचारधारा के इन सिद्धान्तों के कुछ विशेषताओं के रूप में व्यक्त किया जा सकता है। जो अग्रलिखित हैं-

(1) राजत्व का दैवी सिद्धान्त-

प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारकों ने राजा को ईश्वर की देन माना है। आचार्य मनु ने राजा की शक्ति और सर्वोच्च सत्ता को प्राप्त करने के लिए दैवी सिद्धान्त को स्वीकार किया है उनके अनुसार राजा का निर्माण आठ लोकपालों के अन्य तत्वों से हुआ है। जिसके कारण राजा में ईश्वरीय गुण और शक्ति का प्रभाव बढ़ जाता है। ईश्वर ने सारे संसार की सुरक्षा के लिए वायु, यम, सूर्य, चन्द्र, वरुण, इन्द्र, अग्नि, कुबेर के श्रेष्ठ गुणों को मिलाकर राजा की सृष्टि की है।

प्रायः सभी प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तकों ने राजा की उत्पत्ति के दैवी सिद्धान्त में विश्वास व्यक्त किया है परन्तु किसी ने भी पाश्चात्य देशों के निरंकुश राजाओं अथवा शासकों की तरह के निरंकुश राजा और उसके निरंकुश शासन की परिकल्पना नहीं की है। सभी ने राजा को धर्म के अधीन बताया है तथा उसे धर्म की रक्षा तथा धर्मानुसार आचरण का निर्देश दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि धर्म ही राज्य को स्थिर रख सकता है अर्थात् धर्मविमुख होने पर राज्य अर्थात् राजा का अन्त हो जाएगा। उन्होंने धर्मविमुख राजा के विरुद्ध विद्रोह तथा यहाँ तक कि उसकी हत्या भी कर देने की अनुमति प्रदान की है।

(2) राजनीतिक और शक्ति-

प्राचीन भारतीय मनीषियों के अनुसार मनुष्य मोह-माया, लोभ व अहंकार के कारण धर्म के मार्ग से विचलित हो जाता है। इसलिए उन पर नियंत्रण रखने और उन्हें धर्म के मार्ग पर चलने के लिए शक्ति का प्रयोग अत्यन्त आवश्यक है। धर्म मानव समाज की अमूल्य निधि है। इसे शक्ति के द्वारा ही सुरक्षित रखा जा सकता है। इसे राजा के द्वारा दिया गया दण्ड भी कहा जाता है। दण्ड के प्रयोग को दण्डनीति कहा गया है जो राजनीति का मुख्य अंग है। राजनीति का सम्बन्ध अर्थशास्त्र तथा राजधर्म से भी है। अर्थशास्त्र के अन्तर्गत मनुष्य धन-सम्पदा का उपार्जन तथा उसकी रक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है। तथा राजधर्म के अन्तर्गत राजा के द्वारा प्रजा को सुख शान्ति प्रदान करना है। प्राचीन मनीषियों के अनुसार सतयुग में सभी लोग पुण्यात्मा थे उस समय कोई भी किसी को कष्ट नहीं देता था। किन्तु कलयुग में मनुष्य के स्वार्थी और लालची होने के कारण सर्वत्र अव्यवस्था फैल गयी। जिस प्रकार से खुले समुद्र में प्रत्येक बड़ी मछली अपने से छोटी मछली को खा जाती है। उसी प्रकार प्रत्येक बलवान व्यक्ति अपने से कमजोर व्यक्ति को सताने लगा। ईश्वर ने संसार में पुनः शांति व्यवस्था, न्याय, सुरक्षा स्थापित करने के लिए धर्म के नियमों का प्रतिपादन किया और उनके पालन के लिए राजा को शक्ति से सुसज्जित किया। इस प्रकार राजा शक्ति के ही प्रजा की रक्षा करता है तथा राजनीति में शक्ति का सम्बन्ध स्पष्ट करता है। आधार पर

(3) राजा के कर्त्तव्य-

प्रचीन भारतीय मनीषियों ने राजा के महत्त्वपूर्ण तथा प्रमुख कर्तव्य बताए हैं। उनके अनुसार राजा को लोक-कल्याण की भावना में अपनी सम्पूर्ण प्रजा में मेल-जोल तथा सद्भाव को स्थापित करना चाहिए जिससे वे सद्भावना से परिपूर्ण होकर राज्य के प्रति निष्ठा बनाए रखें। सुख और शांति के प्रभाव से ही राज्य की प्रजा अपने चारों पुरुषार्थों धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की सिद्धियाँ प्राप्त कर सकें। राजा को राज्य में प्रचलित सभी परम्पराओं, रीति रिवाजों तथा प्रथाओं का आदर करना चाहिए। इस प्रकार राजा और प्रजा दोनों के चरित्र का निर्माण होता है। प्रचीन मनीषियों के अनुसार यदि राजा अपने कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ है तो वह पाप का भागीदार होता है।

(4) राजनीतिक संगठन-

प्रचीन भारतीय मनीषियों के अनुसार राज्य के प्रमुख सात अंग हैं। इसमें राजा को राज्य का शिर, मंत्रियों का राज्य की आंखें, राजा के मित्रों को राजा के कान, राजखजाने को राज्य का मुख, सेना को राज्य का मस्तिष्क, किलों का राज्य की बाँह तथा पुर को राज्य की जंघाएं माना गया है। प्रचीन विचारकों ने राज्य को शक्तिशाली तथा संगठित बनाए रखने के लिए कूटनीति के चार उपायों का वर्णन किया है। इसके अन्तर्गत विरोधियों को समझा बुझा कर घन देकर उन्हें वश में करना चाहिए इन उपायों से यदि विरोधियों पर अधिकार न किया जा सके तो उन्हें दण्ड देकर तथा उनमें फूट डालकर उन्हें कमजोर कर देना चाहिए। जिससे वे राज्य के संगठन में विरोधी न बन सकें। राज्य के संगठन के अन्तर्गत जनता के शासन को व्यवस्थित रूप से चलाने के लिए कुशल, प्रशिक्षित तथा विश्वासपात्र अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। और अनुभवी गुप्तचरों को भी राज्य की ओर से नियुक्ति की जानी चाहिए। राज्य में सुख तथा शांति बनाये रखने के लिए और अपराधियों को दण्डित करने के लिए कठोरतापूर्वक राज्य के नियमों का पालन करना चाहिए।

(5) राज्य तथा राजधर्म-

प्रचीन भारतीय चिंतकों के अनुसार राजा को सामान्य परिस्थितियों में पूर्ण निष्ठापूर्वक प्रजा के हित के लिए कार्य करना चाहिए किन्तु विपरीत परिस्थितियों में राज्य के विद्रोहियों के साथ कठोर दण्ड की नीति का पालन करना चाहिए। उन्हें रोकने के लिए सभी प्रकार के नैतिक तथा अनैतिक साधनों का प्रयोग करना चाहिए। राजा की वाणी मधुर तथा दृष्टि तीखी होनी चाहिए। प्रजा के साथ भेद-भाव पूर्ण व्यवहार नहीं करना चाहिए। विद्रोही राजकुमारों तथा राज-अधिकारियों को भी कठोर दण्ड देना चाहिए। उन्हें समाप्त करने के लिए विष, दवाओं तथा मंत्रों का भी प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा रिक्त राजकोष को भरने के लिए भी समस्त प्रकार के उपाय करने चाहिए। राजा को अनैतिक कार्य आपत्तिकाल में ही करना चाहिए। क्योंकि ऐसी परिस्थितियों में मर्यादा का पालन नहीं किया जा सकता है। पश्चिमी विचारकों ने भी इस सिद्धान्त का समर्थन किया है। 

(6) राज्य अपरिहार्य एवं अनिवार्य है-

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतकों ने सुखी, शांतिमय एवं सुव्यवस्थित सामाजिक जीवन के लिए राज्य को अनिवार्य एवं अपरिहार्य माना है। भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के लिए वे इसे एक अनिवार्य एवं अपरिहार्य साधन मानते थे। उन्हें राज्य के न तो व्यक्तिवादी और न ही अराजकतावादी सिद्धान्त में विश्वास था। इसी के साथ वे राज्य के सर्वाधिकारवाद में भी विश्वास नहीं करते थे। व्यक्ति एवं समाज की भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए वे राज्य के उचित हस्तक्षेप के पक्षधर थे क्योंकि उनका कहना था कि राज्य के हस्तक्षेप के अभाव में अराजकता एवं अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जायेगी। सभी विचारक इस मत के थे कि राज्य के अभाव में जीवन के तीन लक्ष्यों धर्म, अर्थ और काम की प्राप्त संभव नहीं है।

(7) राजा तथा प्रजा के उत्तरदायित्व-

प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतकों के मतानुसार राज्य की समस्त प्रजा को राजा की आज्ञा का पालन करना चाहिए, क्योंकि वह प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करता है तथा सुख व शांति प्रदान करता है। यदि राजा अपने कर्तव्यों को भूल कर प्रजा पर अत्याचार करने लगे तो ऐसे राजा का परित्याग कर देना चाहिए अथवा राजा को पद मुक्त कर देना चाहिए इसके साथ-साथ राजा प्रजा को जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा प्रदान करने के बदले उनसे कर के रूप में कुछ धन प्राप्त करता है। यदि राजा प्रजा के जीवन और उसकी सम्पत्ति की सुरक्षा करने में असफल रहता है। उसे प्रजा से कर लेने का अधिकार नहीं रह जाता है। शासक को प्रजा को विना कष्ट दिये कर वसूल करना चाहिए। जिससे प्रजा को कर कष्टकारी न लगे। और वह उन्हें आसानी से राजा को अदा कर सके। इस प्रकार राजा प्रजा के हित के लिए उससे कर संग्रह करके उसके कल्याण के लिए कार्य करता है और प्रजा भी अपनी सम्पत्ति और जीवन की सुरक्षा के लिए सहर्ष कर प्रदान करती है। जिससे राजा और प्रजा में सद्भावना तथा संगठन बना रहता है।

प्राचीन राजनीतिक चिंतकों को ‘लोककल्याणकारी राज्य’ में विश्वास था। वे राज्य की निरंकुश एवं दमनात्मक प्रवृत्ति के पक्षधर नहीं थे। उसके कल्याणकारी स्वरूप के कारण ही, वे उसे अनिवार्य एवं अपरिहार्य मानते थे। उन्हें उसके केवल लोककल्याणकारी ही नहीं अपितु पितृत्त्व एवं प्रातृत्त्व तथा न्यायपूर्ण, धर्माधारित एवं दण्डधारी स्वरूप में भी आस्था थी।

इस प्रकार प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तकों एवं मनीषियों ने राजा तथा राज्य के शासन के नियमों और शासन की कला का विशेष रूप से वर्णन किया है जिसका अनुसरण करके प्राचीन भारतीय राज व्यवस्था सुख व शांति प्रदान करने वाली बन गयी थी। तथा भारतीय प्रजा नैतिक उन्नति के चरम शिखर पर पहुँच गयी थी। 

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