Test Examine

सबको भूलो खुद पर काम करो। A Powerful Buddhist Story On Self-improvement, Priority And Self Respect

गांव में रहने वाला एक नौजवान लड़का अपने शांत और सरल स्वभाव के लिए पूरे गांव में प्रसिद्ध था उसका स्वभाव इतना सरल और संकोची था कि वह किसी के भी काम को मन नहीं कर पता था। वह सिर्फ एक बार के कहने पर किसी की भी मदद के लिए हमेशा तैयार हो जाता था वह स्वभाव से इतना दयालु था कि उसे किसी की भी दुख और परेशानी देखि नहीं जाती थी। वह जिस प्रकार से भी किसी की मदद कर सकता था वह करने का प्रयास करता था। फिर चाहे किसी को उचित सलाह देनी हो किसी के काम में हाथ बटा कर उसकी मदद करनी हो या फिर रूपों पैसों से सामने वाले की मदद करनी हो वह मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था। कई बार तो वह अपने बहुत ही महत्वपूर्ण कामों को छोड़कर भी सामने वाले की मदद करने चला जाता था लेकिन धीरे-धीरे उसे आभास होने लगा कि, लोग उसके इस सरल स्वभाव का गलत फायदा उठा रहे हैं, लोग उससे अपना काम तो निकलवा लेते हैं लेकिन उसे समाज में उतनी मान सम्मान और प्राथमिकता नहीं मिल रही है। जितनी उसे मिलनी चाहिए उसके घर वाले दोस्त रिश्तेदार और जानने वाले अपने हर छोटे-बड़े काम में उसे मदद के लिए बुला तो लेते हैं लेकिन उसे अपने रोजमर्रा के जीवन में वह प्राथमिकता इज्जत और मान सम्मान नहीं देते जिसके वह लायक है। पिछले कुछ समय से उसे यह बात बहुत परेशान करने लगी थी हालांकि वह अभी लोगों की उतनी ही मदद करता था लेकिन कहीं ना कहीं वह अंदर से बहुत दुखी रहने लगा था। एक दिन ऐसे ही वह अपने घर में बैठा कुछ सोच रहा था कि तभी उसे बाहर से किसी के आने की आहट सुनाई पड़ी उसने दरवाजे की तरफ नजर घुमाई तो देखा कि उसी की उम्र का एक नौजवान बौद्ध भिक्षु भिक्षाटन के लिए खड़ा है। उसे भिक्षु के चेहरे पर असीम शांति और अद्भुत तेज था लड़के ने घर के अंदर से भिक्षा लाकर भिक्षु के भिक्षा पात्र में डाल दी और उनके जाने का इंतजार करने लगा लेकिन वह नौजवान भिक्षु पूरी शांति और एकाग्रता से उसे लड़के के चेहरे की तरफ देख रहा था। अचानक उसने लड़के से पूछ लिया तुम किसी बड़ी चिंता में दिखाई पड़ रहे हो पहले तो लड़के ने भिक्षु के प्रश्न को टालने का प्रयास किया लेकिन फिर उनके बार-बार पूछने और उनके शांत चित्र से प्रभावित होकर लड़के ने अपना दुख बौद्ध भिक्षु को बताना शुरू कर दिया। उसने कहा मैं हर किसी की मदद के लिए तैयार रहता हूं मैं हर किसी के लिए उपस्थित रहता हूं लेकिन लोग मेरी उपस्थिति को महत्व नहीं देते समाज में ना तो मुझे और ना ही मेरी जरूरत को प्राथमिकता दी जाती है। मुझे मेरे अच्छे कामों का श्रेय भी कभी नहीं मिल पाता इतनी मदद करने के बाद भी लोग मेरी उपस्थिति को जानबूझकर नजर अंदाज कर देते हैं। मुझे कभी भी मेरी अच्छी नियत और अच्छे काम के लिए उचित मान सम्मान और श्रेय नहीं दिया जाता । और यह सब मेरे अपने परिवार वालों दोस्तों और रिश्तेदारों के द्वारा किया जाता है जिस वजह से मैं बहुत ही ज्यादा आहत और दुखी हूं। बौद्ध भिक्षु ने उस नौजवान की बात पूरे ध्यान से सुनी और कहा फिर तो तुम्हें मेरे साथ मेरे गुरु के पास चलना चाहिए, आज आश्रम में हमारे गुरु इसी विषय में प्रवचन देने वाले हैं कि बिना मांगे समाज में उचित मान सम्मान और इज्जत कैसे हासिल करें। वह लड़का भिक्षु के साथ उनके आश्रम चलने के लिए तैयार हो जाता है जब तक वह दोनों आश्रम पहुंचते हैं तब तक गुरु के प्रवचन देने का समय भी शुरू हो जाता है। तो वह लड़का पहले से कतार लगाकर बैठे छात्रों के पीछे जाकर बैठ जाता है इसके थोड़ी देर बाद गुरु भी अपना आसन ग्रहण कर लेते हैं गुरु योग ध्यान और दर्शनशास्त्र के साथ साथ मानवी स्वभाव और मनोविज्ञान के भी विशेषज्ञ थे गुरु ने क्षण भर के मौन के बाद अपना प्रवचन शुरू किया उन्होंने कहना शुरू किया क्या आप लोगों ने कभी खुद को ऐसी स्थिति में पाया है। जहां आपको लगा हो कि आप दूसरों के लिए प्राथमिकता नहीं है क्या आपने कभी ऐसे समय का सामना किया है जब आपने बहुत बढ़िया काम किया हो या फिर आपके पास बहुत अच्छी योजना रही हो जिस पर चलकर ही पूरा काम हुआ हो या फिर आपने सच में किसी का बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया हो लेकिन आपको उसका श्रेणी दिया गया मुझे पता है ऐसे पलों का सामना करना बहुत मुश्किल होता है। दुर्भाग्य बस कई बार जब हम सही दिशा में भी काम कर रहे होते हैं ऐसा काम कर रहे होते हैं जो सभी के लिए अच्छा होता है और खुद को दूसरों की मदद के लिए उपलब्ध करा देते हैं लेकिन लोग हमारी उपस्थिति और प्रयासों को उतना महत्व नहीं देते या फिर महत्व न देने का दिखावा करते हैं यहां तक कि जब आप ऐसे लोगों को खुश करने का प्रयास करते हो जो आपको महत्व नहीं देते तो ऐसे प्रयासों के बाद आपको और दुखी मिलता है। निश्चित रूप से ऐसे पर व्यक्ति को अंदर से हिला देने वाले होते हैं और यह स्थिति और भी खराब तब हो जाती है जब ऐसा करने वाला हमारा कोई अपना करीबी हो जैसे परिवार के लोग दोस्त या जीवनसाथी वैसे तो हमें किसी से भी मान सम्मान और पहचान की उम्मीद रखनी ही नहीं चाहिए क्योंकि यह हमारे नियंत्रण के बाहर है और ऐसी उम्मीद रखने से ज्यादातर समय दुख और निराशा ही हाथ लगती है क्योंकि ऐसी उम्मीदें कभी पूरी नहीं होती लेकिन क्या हो अगर मैं कहूं कि ऐसे कुछ तरीके हैं जिनका उपयोग करके आप किसी के भी जीवन की प्राथमिकता बन सकते हो और समाज में वह मान-सम्मान और पहचान हासिल कर सकते हो जिसके आप लायक हो आज के प्रवचन में मैं तुम्हें 9 ऐसे सफल तरीका बताऊंगा जिनका उपयोग करके आप यह निश्चित कर सकते हो कि आप उन लोगों के जीवन की प्राथमिकता बने रहो जिसे आप प्रेम करते हो जिनकी परवाह करते हो या जिनके लिए आप चाहते हो कि आप उनके जीवन की प्राथमिकता बने रहो तो मेरी इन 9 बातों को ध्यान से सुनना पीछे बैठा हुआ नौजवान लड़का पूरे ध्यान से गुरु की बातें सुन रहा था, गुरु ने कहना जारी रखा।

हर परिस्थिति में खुद को कैसे संत रखे

पहला नियम – खुद को खोने का डर पैदा करो यह सबसे शक्तिशाली मनोविज्ञान तकनीक में से एक है। जिसका उपयोग आप किसी के भी जीवन में अपना महत्व बढ़ाने के लिए कर सकते हैं। खुद को खोने का डर पैदा करके आप सामने वाले को मजबूर कर सकते हैं। कि वह आपको भी अपने जीवन में उचित प्राथमिकता दें लोग अक्सर नई चीजों को पाने के लिए उतना उत्साहित नहीं होते जितना जो उनके पास है उसे खोने से डरते हैं इसीलिए अगर आप चाहते हैं कि सामने वाला आपको अपनी प्राथमिकताओं वाली सूची के शीर्ष पर रखें तो उनके दिमाग में तुम्हें खो देने का डर पैदा करो और ऐसा करने के लिए खुद को उनसे भावनात्मक रूप से दूर करना शुरू कर दो अपनी भावनाओं और व्यक्तिगत बातों को उनसे साझा करना बंद कर दो अपना समय और ऊर्जा दूसरे लोगों के साथ भी बांटना शुरू करो यह चीज उन्हें महसूस करवाएगी की अब वह तुम्हारे लिए उतने महत्वपूर्ण नहीं रहे जितने पहले थे। यह एकबहुत ही शक्तिशाली तकनीक है लेकिन इसका उपयोग बहुत ही सावधानी से किया जाना चाहिए क्योंकि अगर आप उनसे बहुत ज्यादा दूरी बना लेते हैं तो हो सकता है कि वह आपको वापस पाने की कोशिश करना ही छोड़ दें इसलिए आपको इस तकनीक का उपयोग बुद्धिमानी से और संतुलन में करना चाहिए ।

दूसरा नियम – अपनी उपस्थिति को कम करो अपने अक्सर देखा होगा कि जो चीज कम मात्रा में होती है उसकी कीमत अपने आप भर जाती है, और यही प्रकृति का भी नियम है। कि जो चीज जितनी कम उपलब्ध होगी वह उतनी ही मूल्यवान बन जाएगी और यही नियम मानवीय संबंधों पर भी लागू होता है इसलिए अगर आप चाहते हैं कि लोग आपकी इज्जत करें और आपकी उपस्थितियों को महत्व दें तो आपको अपनी उपस्थिति को कम करना होगा क्योंकि आप जितना ज्यादा उपस्थित रहेंगे आपकी उपस्थिति का महत्व उतना ही काम होता चला जाएगा और लोग आपको हल्के में लेना शुरू कर देंगे लेकिन इसका मतलब यह नहीं की आपको सिर्फ तभी उपस्थित होना है जब इसमें आपका फायदा हो या फिर आपका कोई काम बन रहा हो बल्कि अगर आपने सामने वाले के हर छोटे-बड़े काम में उपस्थित होने की आदत बना ली है तो अब समय है खुद को प्राथमिकता देने का यह संदेश देने का की उनसे बाहर भी आपकी एक दुनिया है। आपका समय सिर्फ उनके लिए नहीं है और ना ही आप सिर्फ उनका इंतजार कर रहे हैं सिर्फ यह एक आदत सामने वाले की नजरों में आपका समय और उपस्थिति का महत्व कई गुना बढ़ा देगी गुरु ने आगे कहा

10 साल का काम 10 महीने में कैसे करे .

तीसरा नियम– अपने व्यक्तित्व को रहस्यमय बनाएं लोग आम तौर पर गुड और रहस्यमई चीजे की ओर आकर्षित होते हैं एक रहस्य में व्यक्तित्व स्वाभाविक तौर पर सबको आकर्षित करता है और अक्सर लोगों को रिश्तो के क्षेत्र में अधिक जुड़ाव महसूस करता है थोड़ा रहस्यमय होना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। यदि आप चाहते हैं कि आपको प्राथमिकता दी जाए तो तुरंत अपने बारे में सब कुछ बोलने से बचें ज्यादा जानकारी दिए बिना अपने शौक और रुचियां के बारे में संकेत दे प्रश्नों के थोड़ा घूम फिराकर आई स्पष्ट उत्तर दें और अपने वह अपने अतीत के बारे में सब कुछ ना बताएं अपने जीवन को एक खुली किताब की तरह लोगों के सामने ना राखी इसका उद्देश्य सिर्फ दूसरे व्यक्ति को अपने बारे में अधिक जानने के लिए उत्सुक बनाए रखना है। और आप देखेंगे कि समय के साथ वह आपको अपने जीवन में प्राथमिकता के रूप में देखना शुरू कर देंगे।

चौथा नियम – लोगों को खुद पर निवेश करने दें यह एक नाजुक कम है जिसे आपको बुद्धिमानीऔर संयम से उपयोग करना चाहिए क्योंकि हमारा उद्देश्य लोगों को खुद से दूर करना नहीं बल्कि अपनी सही जगह हासिल करना है इस प्रश्न पर विचार करो कि कौन आपको प्राथमिकता के रूप में देखने के लिए अधिक इच्छुक होगा कोई ऐसा व्यक्ति जिसने आप में बहुत अधिक निवेश किया है या कोई ऐसा व्यक्ति जिसने आप में बिल्कुल भी निवेश नहीं किया है। उत्तर स्पष्ट है तो यदि आप चाहते हैं कि कोई आपको प्राथमिकता के रूप में देखें तो आपको उन्हें अपने में निवेश करने की अनुमति देनी होगी यह कई तरीकों से किया जा सकता है उदाहरण के लिए उन्हें अपना समय आप पर निवेश करने दें उनकी भावनाओं को अपने से जुड़ने दिन केवल उन झूठी उम्मीद को बढ़ावा ना दें जिन्हें आप जानते हैं कि आप पूरा नहीं कर पाएंगे साथ ही यह भी दिखाएं कि आपका समय मूल्यवान है हमेशा उपलब्ध न रहे और कभी-कभी उन्हें भी आपका इंतजार करने दे आपका यह व्यवहार सामने वाले को यह संदेश भेजेगा कि आप खाली और फालतू नहीं है। और अगर उन्हें आपका समय और ध्यान चाहिए तो उन्हें भी प्रयास करना पड़ेगा इससे सामने वाला आपको गंभीरता से लगाऔर आपको प्राथमिकता देना शुरू कर देगा लेकिन याद रहे कि इस तकनीक का उपयोग समझदारी से करना होगा इसकी आती ना करें अन्यथा परिणाम आपकी इच्छा के विपरीत हो सकता है।

पांचवा नियम– खुद को और अपनी जरूरत को प्राथमिकता दें इसका मतलब स्वार्थी होना नहीं है। खुद को प्राथमिकता देने का मतलब है स्वयं को ऐसी जगह पर न होने देना जहां आप एक प्राथमिकता नहीं है। उदाहरण के लिए अगर आप जानते हैं कि कोई आपको इतनी इज्जत नहीं दे रहा है। जितनी उसे आपको देनी चाहिए तो फिर ऐसे इंसान से क्यों इतनी नजदीकियां बढ़ाना ऐसे लोगों के बीच रहकर जो आपको अपनी प्राथमिकता मानते हैं और महत्व देते हैं ज्यादा संभावना है कि दूसरे भी आपको उचित सम्मान देना शुरू कर दें और आपका अपनी नजरों में जो आत्म सम्मान बढ़ेगा वह अलग से गुरु ने आगे कहा आप सबका यह समझना जरूरी है। कि आप स्वयं के प्रति दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर सकते आप स्वयं के प्रति केवल खुद की भावनाओं को नियंत्रित कर सकते हैं इसलिए यदि आप किसी के जीवन में प्राथमिकता बनना चाहते हैं तो सुनिश्चित करें कि पहले आप अपने जीवन में प्राथमिकता बन

छठवा नियम– किसी को भी अपने जीवन का केंद्र मत बनाओ किसी को भी अपने दिमाग में इतना बड़ा मत बनाओ कि वह आपके जीवन का केंद्र बिंदु बन जाए कि जब तक वह इंसान आप पर ध्यान ना दे आपकी तारीफ ना करें आपको खुशी नहीं मिलती अगर उसे इंसान ने कह दिया कि आज आप अच्छे लग रहे हैं या आपने यह काम अच्छा किया है तो आप खुश हो जाते हो लेकिन अगर किसी दिन उसी इंसान ने कह दिया कि आप ठीक नहीं हो या आपका यह काम मुझे पसंद नहीं आया तो आप दुखी हो जाते हो अगर आपने इस स्तर तक किसी और को अपने जीवन का नियंत्रण दे रखा है। आपने उसको इतना बड़ा बना रखा है तो खुद को दुखी करने की व्यवस्था अपने खुद कर रखी है क्योंकि आपकी भावनाओं की चाबी उसे व्यक्ति के हाथ में है वह जब चाहे आपको खुश कर सकता है और जब उसका मन करे वह आपको दुखी भी कर सकता है। कोई भी इंसान कभी भी ऐसे व्यक्ति को गंभीरता से नहीं लेता जब उसे पता चल जाता है कि सामने वाला मेरे ध्यान और प्रवाह का भूखा है इसके विपरीत जब लोगों को यह लगने लगता है की आपको उनके ज्ञान की परवाह नहीं है। तो वह आपकी तरफ और आकर्षित होते हैं और समय के साथ आपको और भी महत्व देने लगते हैं

सातवा नियम – हमेशा बातचीत शुरू करने वाला व्यक्ति बना बंद करो अगर आप ऐसे व्यक्ति हैं जो हमेशा खुद सामने वाले से बातचीत की शुरुआत करते हैं तो अपनी इस आदत पर लगाम लगाइए यह नियम कुछ लोगों को अजीब लग सकता है। क्योंकि अगर हम किसी के जीवन में प्राथमिकता बनना चाहते हैं तो क्या हमें बातचीत की शुरुआत करने वाला व्यक्ति नहीं बनना चाहिए तो इसका जवाब है नहीं क्योंकि जब आप हमेशा बातचीत की शुरुआत करने वाले व्यक्ति बन जाते हैं तो सामने वाला आपको हल्के में लेना शुरू कर देता है वह इस बात का आदी हो जाता है कि बातचीत की शुरुआत आप ही करेंगे इसीलिए वह अपनी तरफ से कोई भी प्रयास करना बंद कर देता है। और आपको कम महत्वपूर्ण समझना शुरू कर देता है तो फिर समाधान क्या है समाधान है कि पहले से बातचीत शुरू करना बंद कर दो और परिणाम देखो यदि दूसरा व्यक्ति वास्तव में आपकी परवाह करता है तो वह आपसे संपर्क करने का प्रयास जरुर करेगा ।

आठवां नियम – अपनी खुशी खुद बना अगर आप किसी के जीवन के प्राथमिकता बनना चाहते हैं तो यह सबसे जरूरी है कि आप अपनी खुशी खुद ढूंढे ना कि किसी पर अपनी खुशी के लिए निर्भर करें हालांकि किसी ऐसे व्यक्ति पर अपनी खुशी के लिए निर्भर करना बहुत आसान होता है। जो हमें अच्छा महसूस कराये लेकिन अपनी खुशी के लिए ऐसे व्यक्ति पर निर्भर रहना भविष्य में आपकी निराशा का कारण भी बन सकता है। क्योंकि वह व्यक्ति कभी ना कभी आपसे दूरियां जरूर बनाएगी इसके अलावा भी जब हम खुशी के लिए दूसरों पर निर्भर रहना शुरू कर देते हैं तो हम वास्तव में अपना जीवन नहीं जी रहे होते हैं बल्कि सामने वाले की सोच और प्राथमिकताओं के अनुसार अपना जीवन जी रहे होते हैं। जिससे बाद में पश्चाताप और दुख हो सकता है इसलिए अगर आप चाहते हैं कि कोई आपको अपने जीवन की प्राथमिकता बनाए तो आपको अपनी खुशी खुद तलाश नहीं होगी वह भी अपने अंदर से क्योंकि यह खुशी ना केवल लंबे समय तक रहती है बल्कि यह आपको दूसरों की नजरों में ज्यादा आकर सभी बाराती है क्योंकि जब आप अंदर से खुश होते हैं तो आप ज्यादा संतुलित और आत्मविश्वासी लगते हैं जो लोगों को आपकी तरफ आकर्षित तो करता ही है साथ ही उनकी नजरों में आपकी एक सकारात्मक छवि बनती है। जिससे वह आपको और अधिक महत्व देना शुरू कर देते हैं

नौवां नियम – दूर जाने के लिए हमेशा तैयार रहो जिस व्यक्ति की हम परवाह करते हैं उसे दूर जाने का विचार डरावना लग सकता है लेकिन यह एक महत्वपूर्ण कदम है यह दिखाकर कि आप दूर जाने से नहीं डरते हैं आप यह संदेश भेज रहे हैं कि आप अपनी योग्यता से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे सही व्यक्ति स्वाभाविक रूप से आपको प्राथमिकता के रूप में दिखेगा और आपको अपने जीवन में बनाए रखने का प्रयास करेगा हमेशा याद रखें कि आपकी जिम्मेदारी सिर्फ सही काम करना है। और यही आपके नियंत्रण में है इसलिए आपको सिर्फ इस बात के प्रति जागरूक होना चाहिए कि आपका कार्य खुद के और दूसरों की नजरों में सही है।और उन कार्यों को करके आपको अच्छा महसूस होना चाहिए यह उम्मीद ना करें कि आपको हमेशा आपके अच्छे कार्य का श्रेय दिया जाएगा ऐसा हर बार नहीं होने वाला ।

इन नो नियमों का पालन करो और समय दो लोग स्वाभाविक रूप से आपको इस तरह से देखना शुरू कर देंगे जिसके आप हकदार हैं । अंत में मैं बस इतना ही कहना चाहूंगा कि हम सभी ने ऐसे क्षणों का अनुभव किया है जब हमें उपेक्षित महसूस करवाया गया और हमें उचित प्राथमिकता नहींदी गई हालांकि यह याद रखना भी आवश्यक है कि हर व्यक्ति की जीवन यात्रा अलग है और किसी दूसरे व्यक्ति की प्राथमिकताएं हमारे वास्तविक मूल्य को निर्धारित नहीं कर सकती क्योंकि हम सब अलग हैं इसीलिए किसी के द्वारा की गई उपेक्षा के क्षणों में अपने आत्म सम्मान को ठेस पहुंचाने की बजाय हमें इन पलों का उपयोग अपने व्यक्तिगत विकास और जीवन में आगे बढ़ाने के लिए करना चाहिए सबसे जरूरी बात यह है कि हम दूसरों पर निर्भर ना रहते हुए अपनी खुशी और भलाई का ध्यान रखते हुए खुद को प्राथमिकता दें और जब दूसरे इस बात को देखेंगे कि आपकी पहली प्राथमिकता आप खुद हैं तो वह आपको वह मूल्य देना शुरू कर देंगे जिसके आप हकदार हो और याद रखो जब दूसरे आपको उनकी प्राथमिकता सूची में स्थान न दें तब भी आप खुद को वह प्राथमिकता दे सकते हो और आपको देना भी चाहिए यह स्वार्थ या अहंकार नहीं बल्कि आत्मदया और आत्म सम्मान है ऐसा करके आप खुद के साथ और दूसरों के साथ अच्छे और स्वस्थ रिश्ते बनाए रख सकते हैं अपने लक्ष्य और जरूरत के अनुसार उचित निर्णय ले सकते हैं औरअधिक खुश संतुष्ट और सार्थक जीवन जी सकते हैं इतना कहने के बाद गुरु ने अपना प्रवचन समाप्त किया और वहां से चले गए धीरे-धीरे सारे छात्र भी वहां से चले गए लेकिन वह नौजवान लड़का अभी भी गुरु की बातों में खोया हुआ था उसे अपने प्रश्नों का उत्तर मिल चुका था उसने मन ही मन उसे नौजवान भिक्षु और उसके गुरु का धन्यवाद किया और वहां से चला गया।

Leave a comment