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1857 ई० के विद्रोह के उपरान्त ब्रिटिश नीतियों में हुए संवैधानिक एवं प्रशासनिक परिवर्तन

1857 के विद्रोह के पश्चात् ब्रिटिश नीतियों में परिवर्तन सन् सत्तावन के विद्रोह का यद्यपि पूर्णतया दमन हो गया लेकिन इसने भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को जड़ से हिला दिया। लार्ड क्रोमर ने कहा था, “काश कि अंग्रेज की युवा पीढ़ी भारतीय विद्रोह के इतिहास को पढ़े, ध्यान दे, सीखे और इसका मनन करे। इसमें बहुत से पाठ और चेतावनियाँ निहित हैं।” भारत पर नियंत्रण की विधियाँ यद्यपि परिपक्व हो चुकी थीं, उनको पुनः स्थापित किया गया और उसके उपरान्त समान रूप से प्रत्येक स्थान पर लगाई गईं। प्रतिक्रियावादी और निहित स्वार्थों को अच्छी प्रकार सुरक्षित किया गया और उन्हें प्रोत्साहित किया गया और वे भारत में अंग्रेजी साम्राज्य के स्तम्भ बन गये। “फूट डालो और राज्य करो” की नीति का जानबूझ कर अनुसरण किया गया और यह अंग्रेजी नियन्त्रण का मुख्य आधार बन गई और सैनिक तथा असैनिक प्रशासन में मुख्य पदों पर यूरोपीय नियन्त्रण कड़ा कर दिया गया। विद्रोह के पश्चात् शासन प्रणाली में जो संवैधानिक तथा प्रशासनिक परिवर्तन हुए, वे इस प्रकार हैं-

1. 1858 ई० के भारत सरकार अधिनियम, द्वारा भारतीय प्रशासन का नियन्त्रण कम्पनी से छीनकर ब्रिटिश राजमुकट को सौंप दिया गया। परन्तु जैसा कनिंघम ने कहा था कि यह परिवर्तन “औपचारिक था वास्तविक नहीं”। सर हेनरी रॉलिन्सन जो कम्पनी के एक डाइरेक्टर थे और कम्पनी की समाप्ति के पक्ष में थे। उनके अनुसार भारत में वही पहले जैसा गवर्नर- जनरल, वही पहले जैसे सैनिक और असैनिक प्रशासन चलता रहा। इंग्लैण्ड में इस अधिनियम द्वारा एक भारतीय राज्य सचिव का प्रावधान किया गया और उसकी सहायता के लिए एक 15 सदस्यों की मन्त्रणा परिषद् होनी थी जिसमें से 8 सरकार द्वारा मनोनीत होंने थे और शेष 7 कोर्ट आफ डाइरेक्टर्स द्वारा चुने जाते थे। इस प्रकार पुराने डाइरेक्टर्स ही भारत परिषद् में नियुक्त हो गए। कोई नीति परिवर्तन नहीं हुआ अपितु इस घोषणा में कम्पनी की पुरानी नीतियों के अनुसरण  का ही प्रस्ताव था। 1784 से ही सरकार ने बोर्ड आफ कन्ट्रोल द्वारा भारतीय मामलों में पर्याप्त प्रभाव बना रखा था और वास्तव में सभी प्रमुख मुद्दों पर निर्णायक कथन उन्हीं का होता था। 1858 की घोषणा से दोहरा नियन्त्रण समाप्त हो गया और सरकार ही सीधे भारतीय मामलों के लिए उत्तरदायी हो गई।

2. महारानी की घोषणा के अनुसार, “क्षेत्रों के सीमा विस्तार” की नीति समाप्त कर दी गई और “स्थानीय राजाओं के अधिकार, गौरव तथा सम्मान” को अपने समान ही संरक्षण का विश्वास दिलाया गया। अंग्रेजी प्रजा की हत्या के दोषियों को छोड़कर शेष सभी को क्षमा कर दिया गया। उन्हें साम्राज्य की प्राचीर के रूप में बनाए रखने के सिद्धान्त को अंग्रेजी साम्राज्य का एक मुख्य मूल तत्त्व बना लिया गया। जिन तालुकदारों ने बड़ी संख्या में विद्रोह में भाग लिया था, उनसे राजभक्ति के प्रण लेकर अपनी-अपनी जागीरों में पुनः स्थापित कर दिया गया। इस प्रकार सामन्तवादी और प्रतिक्रियावादी तत्त्व साम्राज्यवाद के विशेष कृपापात्र बन गए।

3. 1858 की घोषणा में विश्वास दिलाया गया था कि “हमारी प्रजा किसी भी जाति अथवा धर्म की क्यों न हो, स्वतन्त्र रूप से और बिना भेदभाव के उन कार्यों के लिए जिनके लिए वह अपनी विद्या, योग्यता तथा ईमानदारी से करने के योग्य हो, हमारी सेवा तथा पदों पर नियुक्त की जायेगी।” इस प्रतिज्ञा को पूर्ण करने के लिए 1861 में भारतीय जनपद सेवा अधिनियम बनाया गया। दुर्भाग्यवश जो विस्तृत नियम इस परीक्षा के लिए बनाए गए उनसे यह सेवा केवल अंग्रेजों के वश में रही।

4. इस विद्रोह के लिए मुख्यतः भारतीय सेना ही उत्तरदायी थी। इसका पूर्णतया पुनर्गठन किया गया और गठन “विभाजन और प्रतितोलन” की नीति पर किया गया। 1861 की “सेना संमिश्रण योजना के अनुसार कम्पनी की यूरोपीय सेना सरकार को हस्तान्तरित कर दी गई। यूरोपीय सैनिकों को समय-समय पर इंग्लैंड भेजकर उनका निरन्तर सुदृढ़ीकरण किया जाता था। यूरोपीय सैनिकों की 1857 से पहले की संख्या जो 40,000 थी अब 65,000 कर दी गई और भारतीय सेना की संख्या जो पहले 2,38,000 थी अब 1,40,000 निश्चित कर दी गई और एक साधारण सूत्र यह बन गया कि बंगाल प्रेसीडेन्सी में यूरोपीय और भारतीय सैनिकों का अनुपात 1:2 का होना चाहिए और मद्रास तथा बंबई प्रेसीडेन्सियों में 1:3 का। इसके अतिरिक्त भारतीय सैनिकों का भारतीय सैनिकों से प्रतितोलन किया जाना चाहिए।

सेना और तोपखाने में ऊँचे पद केवल यूरोपीयों के लिए ही आरक्षित कर दिए गए। 1857 के विद्रोह के पश्चात् पचास वर्षों में एक भी भारतीय “राजआयुक्ति के योग्य नहीं समझा गया। और नए यूरोपीय रंगरूट पुरानी “वाइसराय आयुक्ति” मरितीय पदाधिकारियों से अधिक उत्तम माने जाते रहे। 

5. इस तथ्य को अधिकाधिक रूप में अनुभव किया गया कि इस विद्रोह का एक मूलभूत कारण, शासितों और शासकों के बीच सम्पर्क का न होना था। सर बार्टल फ्रेअर ने अपनी 1860 की प्रसिद्ध टिप्पणी में विधान परिषदों में “स्थानीय तत्त्वों” को सम्मिलित करने का आग्रह किया था। ऐसा विश्वास किया गया कि भारतीयों को विधान कार्य में सहकारी बनाने से शासक भारतीयों की भावनाओं से परिचित हो सकेंगे और भ्रम दूर करने के अवसर मिल सकेंगे। इसी दिशा में एक छोटा-सा प्रयत्न भारतीय परिषद् अधिनियम 1861 द्वारा किया गया।

6. सम्भवतः इस विद्रोह के भावनात्मक प्रभाव सबसे दुर्भाग्यपूर्ण थे। जातीय कटुता इस संघर्ष की सबसे दुष्टतम पक्ष थी। पंच ने अपने व्यंगचित्रों में भारतीयों को उपमानव जीव जो आधा गोरिल्ला और आधा नीग्रो था, के रूप में प्रदर्शित किया जो केवल वरिष्ठ शक्ति द्वारा ही नियन्त्रण में रखा जा सकता था। भारत में साम्राज्यवाद के एजेन्टों ने समस्त भारतीय लोगों को अविश्वसनीय ठहरा दिया और उन्हें अपमान, तिरस्कार और निन्दनीय व्यवहार का भागी बनना बड़ा। जवाहरलाल नेहरू के शब्दों में, “साम्राज्यवाद और एक जाति का दूसरी जाति पर अधिकार बुरा तो है ही और जातीयवाद और भी बुरा है। परन्तु साम्राज्यवाद और जातीयवाद दोनों मिलकर केवल भय की ओर अग्रसर होते हैं और ये उन सब लोगों को जो इससे सम्बन्धित हैं, पतन की ओर ले जाते हैं।” भारत में अंग्रेजों ने एक ‘स्वामी जाति’ की परम्परा बना दी। यह नवीन साम्राज्यवाद का औचित्य ‘श्वेत व्यक्ति का बोझ’ के दर्शन और अंग्रेजों की भारत को सभ्य बनाने की भूमिका द्वारा सिद्ध किया गया। दोनों जातियों के मध्य खाई चौड़ी होती चली गई और यह कभी-कभी राजनैतिक विवादों, प्रदर्शनों और हिंसा के कार्यों में परिवर्तित हो जाती थी।

7. 1857 ई० के विद्रोह ने एक युग का अन्त कर दिया और एक नवीन युग के बीज बोए। प्रादेशिक विस्तार के स्थान पर आर्थिक शोषण का युग आरम्भ हुआ। अंग्रेजों के लिए सामन्तवादी युग का भय सदा के लिए समाप्त हो गया और अंग्रेजी साम्राज्य के लिए नई चुनौती उस प्रगतिशील भारत से ही आई जो उन्नीसवीं शताब्दी के उदारवादी अंग्रेजों और जॉन स्टूअर्टमिल के दर्शन से उत्पन्न हुआ था।

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