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1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के सामाजिक कारण

सामाजिक कारण

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आर्थिक कारण

1. विभिन्न वर्ग-फ्रांसीसी समाज क्रांति के पूर्व सामंती व्यवस्था पर आधरित था। एक वर्ग -धाप्राप्त वर्ग था तथा दूसरा सुविधाविहीन वर्ग सुविधाप्राप्त वर्ग पुनः दो वर्गों में बँटा हुआ था-प्रथम वर्ग अथवा प्रथम इस्टेट में पादरी वर्ग के लोग आते थे और दूसरे वर्ग में सामंत। पहले वर्ग में लगभग एक लाख तीस हजार पादरी थे। दूसरे वर्ग में लगभग 80,000 परिवार या 4,00,000 व्यक्ति थे। इन दोनों वर्गों के व्यक्ति प्रायः सभी करों से मुक्त थे। प्रशासकीय पदों और सेना के उच्च पदों पर अधिकतर उन्हीं में नियुक्ति की जाती थी। फ्रांस की जनसंख्या उस समय 2,50,00,000 थी, लेकिन फ्रांस की कुल भूमि का 40 प्रतिशत भाग इन्हीं वर्गों के सदस्यों के पास था।

2. पादरी वर्ग-फ्रांसीसी पुरातन व्यवस्था में पादरी इस्टेट के सदस्य थे जो रोमन कैथोलिक चर्च के अधिकारी थे। इनके अपने स्वतंत्र संगठन, कानून, न्यायालय और करारोपणे के अधिकार थे। देश की जमीन का पाँचवाँ भाग चर्च के पास था और वह आम जनता से ‘टाइथ्’ वसूलता था। इसकी आमदनी असीमित थी। पादरियों की आमदनी बढ़ गई थी, इसलिए वे विलास में डूबे हुए थे। धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों से इन्होंने अपना मुख मोड़ लिया था। पादरीवर्ग भी दो वर्गों में विभाजित था-उच्च पादरी और निम्न पादरी। उच्च पादरी वर्साय में रहते थे और निम्न पादरियों द्वारा एकत्रित आय से ऐशो-आराम की जिंदगी व्यतीत करते थे। वास्तविक धार्मिक कार्य निम्न पादरियों को करना पड़ता था। निम्न पादरी आम जनता के र साथ गाँवों में रहते थे और उसी वर्ग से आते थे, जिस कारण उनकी परेशानियों से अवगत थे और उनके प्रति सहानुभूति रखते थे। इसी कारण क्रांति के समय निम्न पादरी आम जनता के सदस्यों के साथ मिल गए।

3. सामंतवर्ग-सामंत या अभिजात वर्ग के लोग द्वितीय इस्टेट कहलाते थे। इन्हें कई तरह की सुविधाएँ प्राप्त थीं। सर्वप्रथम उन्हें किसी तरह का कर नहीं देना नहीं देना पड़ता था और सभी उच्च राजकीय पदों पर केवल उन्हीं में से नियुक्ति होती थी। वे फ्रांस की एक चौथाई भूमि के मालिक थे। इस वर्ग में धनी और अमीर दोनों थे किन्तु दोनों समान रूप से किसानों का शोषण करते थे। किसानों से वह तरह-तरह के समांती कर, अन्य देय और बेगारी लेते थे। कुलीनों के पालतू पशु कृषकों के खेत उजाड़ देते थे थे लेकिन उसके विरुद्ध वे बोल नहीं सकते थे। जंगली जानवरों को भी वे नहीं खदेड़ सकते थे; क्योंकि वे सामंतों के शिकार खेलने के काम आते थे। आर्थिक लाभ के लिए सामंत अपनी जागीरों में आटा पीसने की चक्की, शराब बनाने की भट्ठी और तदूर सेंकने की भट्ठी बनाए हुए थे, जिनका उपयोग वहाँ के स्थानीय लोगों को पैसा देकर करना निहायत जरूरी था। खेत बेचने पर किसानों को बिके खेत का पाँचवाँ हिस्सा जागीरदार को देना पड़ता था। बाहर से आने वाली चीजों पर वे कर वसूलते थे। सड़कों और पुलों पर पर वे टॉल टैक्स उगाहते थे।

4. विभिन्न तरह के सामंत सामंतवर्ग भी कई वर्गों में बँटा हुआ था, जिसने कुछ सेना के उच्च अधिकारी थे तो कुछ अन्य न्याय के क्षेत्र में आगे बढ़े हुए थे। सामंतों का एक निम्न वर्ग भी था, जो वास्तव में आम जनता के साथ रहता था और जिसकी आर्थिक स्थिति आम जनता से बहुत अ अच्छी नहीं थी। । लुई चौदहवाँ ने सामंतों की शक्ति कम करने के ख्याल से उन्हें वर्साय में रहने के लिए कहा। परन्तु धीरे-धीरे ये सामंत राजपरिवार का नकल करने लगे और विलासिता में डूब गए। उन्होंने अपने सामंती दायित्त्वों को भी निभाना छोड़ दिया। इसलिए बड़े सामंतों को आम जनता से संपर्क टूट गया और क्रांति के समय वे आम जनता के कोपभाजन हुए। इतना ही नहीं साधारण सामंत, अर्थात् निम्न वर्ग के कुलीन भी बडे सामंतों से नफरत करते थेः क्योंकि वास्तविक सामंती दायित्त्वों का निर्वाह उन्हें करना पड़ता था जबकि टैक्स की बड़ी राशि को बड़े सामंत विलासी जीवन व्यतीत करने के लिए उनसे वसूल लेते थे। निम्न वर्ग के सामंतों की स्थिति किसानों से बहुत अच्छी नहीं थी।

5. सुविधाविहीन वर्ग (किसान) सुविधाविहीन वर्ग को तृतीय इस्टेट कहा जाता था, जिसमें किसान, बुर्जुआ और दस्तकार आते आते थे। थे। फ्रांस का कृषक सामान्य स्थितियों में भी अपनी जरूरत के लिए अन् अन्न पैदा कर लेता था, लेकिन उनमें अधिकांश संख्या भूमिहीनों की थी। देश के अधिकांश भूमि सामंतों के पास थी और उस पर कृषक काम करने के लिए मजबूर थे। चूंकि सामंतों की जरूरतें पूरी हो जाती थीं, इसलिए पैदावार में उन्हें विशेष रुचि नहीं थी। कृषकों की आमदनी का अधिकांश भूमि-कर, धर्म-कर और नमक-कर के रूप में राज्य या सामंतों के पास चला जाता था। करों की असमानता की यह स्थिति थी कि के एक स्थान से दूसरे स्था से दूसरे स्थान के मूल्य य में कभी-कभी तीन गुना फर्क होता था। सामंत और पादरी सामाजिक विशेषाधिकारों के कारण इन करों को देने से मुक्त थे, परिणामतः आम जनता पर कर का बोझ और बढ़ जाता था। तत्कालीन फ्रांस में एक कहावत लोकप्रिय थी, सामंत लड़ता है, पादरी पूजा करा है, और सामान्य जन कर देता है। किसानों की कड़ी मेहनत के फल का अधिकांश उच्च वर्ग के लोग ले लेते थे, इसलिए किसान उनसे नफरत करते थे और चाहते थे कि उनका शोषण रुक जाए। फिर भी फ्रांसीसी किसानों की हाल यूरोप के अन्य देशों के किसानों से अच्छी थी; क्योंकि ये जमीन खरीद रहे थे और उनका मनसूबा ऊंचा हो गया था। । ये महसूस करते थे कि यदि उनका शोषण रुक जाए ए तो ये और अधिक संपन्न बन सकते हैं, अतः इन्होंने क्रांति में अपने स्वार्थों की रक्षा के लिए मध्यमवर्ग का साथ दिया।

6. मध्यम वर्ग (बुर्जआ वर्ग)- फ्रांसीसी समाज का बुर्जआ वर्ग सर्वाधिक प्रबद्ध था जिसमें संपन्न व्यापारी, वकील, लेखक प्राध्यापक, डॉक्टर इत्यादि थे। ये काफी शिक्षित और आर्थिक रूप से सपन्न थे, फिर भी समाज में इनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। नेपोलियन ने सेंट हेलना में सत्य ही कहा था कि क्रांति का मूल कारण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि मध्यमवर्ग की समानता की चाह थी। मध्यमवर्ग के लोग लोग कुलौनों के साथ सामाजिक समता प्राप्त करना चाहते थे तथा उनकी सामाजिक श्रेष्ठता से घ घृणा करते थे। ये व्र क्रांति के नारों, नारों, समानता, स्वतंत्रता एवं भ्रातृत्त्व में समानता पर अधिक जोर देते थे और अपनी सामाजिक स्थिति सामंतों के बराबर करना चाहते थे। उनकी यह अहंमान्यता कि हम कुलीनों से श्रेष्ठ हैं, क्रांति का एक मुख्य कारण था। यह सही है कि उनकी कुछ शिकायतें जायज थीं, जैसे कि उनका आर्थिक और सामाजिक शोषण हो रहा था और यह बात मानी हुई थी कि बिना सामंती व्यवस्था के उन्मूलन के व्यापार एवं उद्योग की तरक्की नहीं होती, फिर भी उनकी समानता पर जोर देना और क्रांति के समय अपने पक्ष में कार्य करवाना उनके निहित स्वार्थों की पुष्टि करता है। 

7. दस्तकार एवं मजदूर वर्ग-फ्रांस के दस्तकारों एवं मजदूरों की स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। फ्रांस में अभी उद्योगों की स्थापना बाल्यावस्था में थी, इसी बीच 1786 ई० में इंग्लैण्ड से फ्रांस की इडेन की संधि हुई और ब्रिटिश सामान को फ्रांस में आने की इजाजत मिल गई। परिणामतः फ्रांसीसी सामान बिकना बंद हो गया और मजदूर बेकार होने लगे। अकाल और पाले के कारण देहाती मजदूरों की स्थिति दयनीय हो गई और रोजी-रोटी की खोज में वे शहर की ओर आने लगे। क्रांति के समय यही बेकार लोग भीड़ में परिवर्तित हो गए और लूटपाट किया करते थेः क्योंकि उनके पास जीविका का कोई साधन नहीं था। दस्तकारों और मजदूरों ने क्रांति के दौरान महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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