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1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के आर्थिक कारण

आर्थिक कारण

1. कर प्रणाली में भेद-फ्रांस की कर प्रणाली अनुचित, घृणित एवं पक्षपातपूर्ण थी। करों का भार निम्न वर्ग पर था। विशेषाधिकारयुक्त वर्ग जो धनी था और कर दे सकता था वह करें से मुक्त था। करों की उगाही ऐसे लोगों के हाथ में थी जो अधिक धन दे सकें। एल०मुकर्जी के अनुसार, “करों की वसूली निद्यतापूर्ण ढंग से की जाती थी।”

2. राजकोष का रिक्त होना-आर्थिक कारणों की वजह से ही क्रान्ति हुई। खजाना खाली हो गया था फ्रांस की सरकार दिवालिया हो गई थी। शाही अपव्यय के कारण फ्रांस की मुद्रा की कीमत घट गई थी।

3. नमक पर कर लेना नमक कर से प्रत्येक व्यक्ति को घृणा थी, सात वर्ष से ऊपर के व्यक्ति को सात पौण्डं नमक वर्ष में खरीदना पड़ता था। इस नियम का उल्लंघन करने वालों व्यक्ति का को कठोर दण्ड दिया जाता था।

4. सरकार के के ऊपर अधिक ऋण भार-सरकार के ऊपर राष्ट्रीय ऋण दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। स्थिति यह हो गई ई थी कि ऋण तो दूर रहा ब्याज देना भी कठिन हो गया था। फ्रांस दिवालिया हो गया था।

5. वाणिज्य एवं व्यापार में ह्रास-फ्रांस का व्यापार दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा था। शराब का व्यापार भी करों के कारण कम हो गया था। उद्योगपतियों से सरकार को कोई विशेष लाभ नहीं था। विभिन्न चुंगी एवं नाप-तौल प्रणाली होने के कारण व्यापार की दशा दिन पर दिन गिरती जा रही थी।

6. जनता का भरपूर शोषण कर वसूल करने का व कार्य ठेके पर दिया जाता था। अतः कर वसूल करने वाले लोग ले लोग निर्देयता से क्र कर वसूल करते थे। आधा भाग राज्यकोष में जमा करते थे और आधा भाग अपनी जेबों में रखते थे। इससे जनता का का शोषण होता था और राज्य को कोई लाभ नहीं था।

उपर्युक्त सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान ‘लुई सोलहवाँ’ न कर सका थ था। इसलिए फ्रांस में क्रान्ति हुई। इस सम्बन्ध में फिशर महोदय ने लिखा है, “ऐसे कार्यों के लिए राजा बिल्कुल अयोग्य था। लुई का व्यक्तिगत, ईमानदारी, धर्मनिष्ठा, सौजन्यता तथा विवेक आदि गुणों से परिपूर्ण था प्रशासकीय कार्यों के लिये वह एकदम अयोग्य था।” 

राजनैतिक कारण

सामाजिक कारण

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