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स्वदेशी आन्दोलन के असफलता के कारण

स्वदेशी आन्दोलन का जिस तीव्रगति से विकास हो रहा था उससे ब्रिटिश साम्राज्यवादी सकते में आ गये, किन्तु 1908 ई० के मध्य तक आन्दोलन शक्तिहीन हो गया। निःसन्देह इसके पीछे कुछ महत्त्वपूर्ण कारण विद्यमान थेः

(1) साम्प्रदायिकता- आन्दोलन का सबसे बड़ा दोष यह था कि यह मुसलमानों के बहुसंख्यक वर्ग को अपने साथ न ले सका। । अंग्रेजों ने साम्प्रदायिकता का जो बीज बो दिया था उसका उन्होंने भरपूर लाभ उठाया। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग का गठन कर मुसलमानों को आन्दोलन को क्षीण बनाने के लिए ढाल के रूप में प्रयोग किया। यही कारण था कि ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने स्वदेशी आन्दोलन विरोधी रवैया अपनाया। आन्दोलन जब चरम पर था तभी अंग्रेजों ने बंगाल में साम्प्रदायिक दंगे भड़काकर इसे क्षीण करने में सफलता प्राप्त की।

(2) कुछ गलत तरीके अंग्रेजों की फूट डालो और शासन करो की नीति को स्वदेशी आन्दोलनकारियों की कतिपय नीतियों ने और अधिक मजबूत रिवाजों व परम्पराओं तथा धार्मिक त्यौहारों से आन्दोलन (अधिक मजबूत कर दिया। पारम्परिक रीति साम्प्रदायिकता के जहर को फैलाने में उठाया। जोड़ने का पूरा लाभ अंग्रेजों ने

(3) सरकार की कठोर एवं दमनपूर्ण नीति-आन्दोलन की समाप्ति के पीछे सरकार द्वारा निर्मम दमनपूर्ण रवैया अपनाया जाना भी था। सरकार ने सार्वजनिक प्रदर्शन, सुभाओं एवं प्रेस पर प्रतिबन्ध लगाए। वारीसल सम्मेलन (1906 ई०) में सरकार का कठोर रवैया उसके दमन चक्र का स्पष्ट प्रमाण है।

(4) कांग्रेस में आपसी फूट एवं नेतृत्त्व का अभाव-स्वदेशी आन्दोलन को गम्भीर चोट कांग्रेस के नेताओं की आपसी फूट ने भी प्रदान की। कांग्रेस के उग्रवादी नेता जिसमें लाल, बाल एवं पाल विशेष उल्लेखनीय थे ने स्वदेशी आन्दोलन को स्वराज्य प्राप्ति तक ले जाने का प्रयास किया। कांग्रेस के उदारवादी नेता इस नई विचारधारा को संघर्ष से नहीं जोड़ना चाहते थे। वे स्वदेशी आन्दोलन को बहिष्कार तक ही सीमित रखने के पक्षपाती थे। इस फूट का लाभ सरकार ने उठाया और दमन चक्र में और अधिक तेजी कर दी। तिलक को 6 16 माह का कारावास लाला लाजपत राय को निर्वासन दे दिया गया। विपिन चन्द्र पाल ने राजनीति से सन्यास ले लिया। इस प्रकार अब आन्दोलन नेतृत्त्वविहीन हो गया।

(5) प्रभावी संगठन का अभाव- स्वदेशी आन्दोलन में संगठन का भी अभाव था। जो भी त्रीके अपनाए गए उन्हें अनुशासित ढंग से कार्यक्रम का रूप नहीं प्रदान किया गया जिससे आन्दोलन का अन्त हो गया।

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