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स्वदेशी आन्दोलन का महत्त्व, उपयोगिता एवं प्रभाव

यह सर्वथा सत्य है स्वदेशी आन्दोलन 1908 ई० के मध्य तक समाप्त अवश्य हो गया किन्तु इस आन्दोलन के महत्त्व से इन्कार नहीं किया जा सकता। इस आन्दोलन ने जीवन के लगभग समस्त पहलुओं पर अपना गम्भीर प्रभाव डाला। आन्दोलन ने जनमत को तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आन्दोलन‌कारियों ने आन्दोलन के प्रसार के लिए जो परम्परागत तरीके अपनाए उससे आन्दोलन देश के कोन कोने में फैल गया। ल गया। आत्मनिर्भरता एवं आत्मशक्ति को सम्बल मिला। 

अब ग्रामों में सामाजिक एवं आर्थिक सुधारों के महत्त्व के विषय में सोचा जाने लगा। सामाजिक कुरीतियों पर इस आन्दोलन ने प्रबल आघात किया। देश में राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना हुई। अगस्त 1906 ई० में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद का गठन हुआ। अब आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी उद्योगों की आवश्यकता को बल मिला। देश में कारखानों की स्थापना हुई।

आन्दोलन का गम्भीर प्रभाव सांस्कृतिक क्षेत्र में भी पड़ा। बंगाल साहित्य विशेष रूप से काव्य के विकास की दृष्टि से तो स्वदेशी आन्दोलन का काल स्वर्णकाल सिद्ध हुआ। यही नहीं, आन्दोलन ने समाज के प्रत्येक वर्ग को राजनीतिक विचारधारा से अवगत कराने का प्रयत्न किया। निःसन्देह यह तो स्वीकार करना ही होगा कि स्वदेशी आन्दोलन उपनिवेशवाद के विरुद्ध प्रथम सशक्त आन्दोलन था। यह राष्ट्रीय आन्दोलन की नींव सिद्ध हुआ।

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