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मनु द्वारा राज्य के सप्तांग सिद्धांत

‘मनु’ स्मृति में राज्य की प्रकृति का विस्तार से उल्लेख किया गया है। मनु के अनुसार जगत् का स्वरूप सावयव है अर्थात् मनु ने सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का स्रोत विराट पुरुष के अंगों से माना है और इसी क्रम में उन्होंने सावयव सिद्धान्त में आस्था प्रकट की है। मनु के अनुसार जिस प्रकार अनेक अवयवों से सृष्टि की उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार राज्य की उत्पत्ति में भी अनेक अवयवों का समिश्रण है। मनु ने राज्य के सात अंग बतलाये हैं तथा इनकी तुलना मानव शरीर से की है। इस प्रकार मनु राज्य के सावयव सिद्धान्त को मानते हैं। मनु आगे लिखते हैं राज्य एक ऐसा सावयव है जिसका निर्माण सात भिन्न अवयवों के संयोग से हुआ है। जो अग्रलिखित हैं-

मनु द्वारा प्रस्तुत राज्य के आवश्यक तत्त्व (अंग)

(सावयवी अथवा सप्तांग सिद्धान्त )

प्राचीन भारतीय चिन्तक मनु ने अपने राजनीतिक चिन्तन के अन्तर्गत राज्य के सात तत्त्वों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार राज्य सात तत्त्व (अंग) इस प्रकार है-

(1) स्वामी (राजा)

(2) आमात्य (मंत्री)

(3) जनपद

(4) दुर्ग अथवा पुर

(5) कोष (राजकोष)

(6) दण्ड अथवा सेना

(7) मित्र अथवा सुहृद।

यहाँ यह बात उल्लेखनीय है उन्होंने राज्य और शासन में अन्तर का ध्यान नहीं दिया है। प्रचीन मनीषी मनु ने शासन के अवयवों अर्थात् अंगों को राज्य के अंग के रूप में सम्बोधित किया है। मनु द्वारा वर्णित राज्य के सप्त अंगों में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान स्वामी अथवा राजा का है। वह प्राचीन भारतीय शासन का केन्द्र बिन्दु तथा राज्य का पर्याय है। उसी के अन्तर्गत राज्य का सप्तांग सिद्धान्त गति करता है। 

(1) राजा अथवा स्वामी-

‘मनु’ ने अपने राजनीतिक विचारों के अन्तर्गत राजा (स्वामी) को ‘राज्य’ के पर्यायवाची के में प्रस्तुत किया है। रूप समाज में अराजकता और अव्यवस्था की भयंकर स्थिति हो जाने पर पर ईश्वर ने पृथ्वी पर ‘राजा’ को पैदा किया। इस प्रकार राजनीतिक व्यवस्था अर्थात् राज्य की उत्पत्ति हुई। ‘मनु’ का ‘राजा’ शासन का केन्द्रबिन्दु है तथा समस्त शासनिक और प्रशासनिक शक्तियाँ उसी में निहित एवं केन्द्रित हैं परन्तु वह निरंकुश नहीं है उन्होंने उसे धर्म और कानून के अन्तर्गत रखा। है अर्थात् उनका उल्लंघन उल्लंघन और इनकी उपेक्षा नहीं कर सकता है। प्रजा की रक्षा और उसका कल्याण करना उसका लक्ष्य और कर्तव्य है। अपने इस कर्तव्य की भी उपेक्षा करने की उसे छूट नहीं है। उसे केवल धर्म, कानून और कर्तव्य के माध्यम से ही नहीं अपितु उचित प्रशिक्षण के माध्यम से भी निरंकुश होने से रोका गया है।

(2) आमात्य एवं मंत्री-

‘मनु’ ने राज्य के सप्तांग में ‘मंत्रियों’ अर्थात् मंत्रिपरिषद् को दूसरा महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया है। कोई भी राजा अथवा शासक राज्य के कार्यों को अकेले सत्यापित करने में सक्षम और सफल नहीं हो सकता है। ‘मनु’ भी सत्य से अवगत तथा उन्होंने इसकी उपेक्षा नहीं की। है। यही कारण है। कि उन्होंने ‘राजा’ के बाद मंत्रिपरिषद् को दूसरा आवश्यक और महत्त्वपूर्ण अंग माना है। उन्होंने मंत्रियों की संख्या के निर्धारण तथा उनकी नियुक्ति करने का अधिकार राजा को दिया है। उन्होंने कुलीन, शास्त्रों के ज्ञाता, वीर, शास्त्रास्त्र के संचालन में निपुण और परीक्षित व्यक्तियों को ही मंत्री बनाने का सुझाव दिया है। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा है कि जिस विभाग का वह विशेषज्ञ हो, उसी का उसे मंत्री बनाना चाहिए। उन्होंने कहा है कि राजा को मंत्रियों की अलग-अलग और इसके बाद संयुक्त रूप में राय जानकर कार्य करना चाहिए। उसे उनके साथ निष्कपट व्यवहार और उनका विश्वास करना चाहिए। उसे उनके साथ गुप्त स्थान पर मंत्रणा करनी और उसे गुप्त रखना चाहिए। ऐसा करने वाला राजा सदैव सफल रहता है। ‘मनु’ ने मंत्रिपरिषद् के संघटन में प्रधानमंत्री के पद की व्यवस्था की है जिसे उन्होंने मुख्य आमात्य को संज्ञा प्रदान की है, यद्यपि उन्होंने मंत्रियों की संख्या के निर्धारण का अधिकार ‘राजा’ को दिया है तथापि उनके अनुसार सात अथवा आठ की संख्या उचित है। उन्होंने नियुक्ति का अधिकार राजा को दिया है परन्तु इसी के साथ यह भी कहा है कि यह कार्य प्रतियोगिता के माध्यम से होना चाहिए। इससे भ्रष्टाचार आदि को बढ़ावा नहीं मिलेगा।

(3) जनपद-

पाश्चात्य राजनीतिक दार्शनिकों की तरह भारतीय चिंतकों ने भी भूमि और जनसंख्या को राज्य का आवश्यक तत्त्व माना है परन्तु उन्होंने इन दोनों को अलग-अलग न रखकर एक ही में रखा उन्हें ‘जनपद’ की संज्ञा दी। जनपद का आकार क्या होना चाहिए, इसके बारे में उन्होंने किसी निश्चित भू-भाग एवं जनसंख्या की बात नहीं कही है परन्तु उन्होंने उसकी सभी दृष्टियों से आत्मनिर्भरता पर बल दिया है।

(4) दुर्ग अचया पुर-

भारतीय चिंतकों ने सुदृढ़ दुर्गयुक्त राजधानी (पुर) को राज्य के चौथे आवश्यक तत्व के रूप में प्रस्तुत करते हुए उसे ‘जनपद’ के मध्य में निर्मित करने के लिए कहा है। उनकी धारणा है कि जिस जनपद के पास सुदृढ़ दुर्ग होगा, उसे पराजित करना सरल नहीं होगा। उन्होंने केवल सुदृढ् दुर्ग बनाने की ही नहीं नहीं आं अपितु राजधानी को सभी दृष्टियों से आत्मनिर्भर बनाने की भी सलाह दी है।

(5) कोष (राजकोष) 

राज्य के संचालन में राज्यकोष की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, इस तथ्य से ‘मनु’ भी पूर्णत: अवगत थे अतः उन्होंने इसकी आवश्यकता पर अधिकाधिक बल दिया है। उन्होंने बलि (विभिन्न प्रकार के कर), शुल्क तथा दण्डकर (जुर्माना) को राज्य की आय का पमुख और महत्त्वपूर्ण साधन माना है। इसमें भी सबसे अधिक महत्त्व उन्होंने करों को दिया है। राज्य के आर्थिक साधन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा है कि राजा को बगुले की तरह अर्थ का संचय करना चाहिए क्योंकि शासन-प्रशासन के संचालन के लिए इसकी अत्यन्त आवश्यकता है। जहाँ तक करों का प्रश्न है, उन्होंने अनेक करों का उल्लेख किया है परन्तु इसी के साथ यह भी कहा है कि राजा को कम से कम कर लगाने चाहिए तथा करारोपण इस प्रकार होना चाहिए कि गरीबों को कम से कम तथा धनवानों पर अधिक से अधिक भार पड़े तथा ब्रह्मचारियों, वानप्रस्थियों से कर नहीं लेना चाहिए। राजा को करों की कड़ाई से वसूली करनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि कर न देने तथा कर की वसूली न करने से राज्य का विनाश हो जाता है। कर की वसूली और उसका उपयोग जनता के कल्याण तथा राष्ट्र को सम्पन्न बनाने के लिए होना चाहिए।

(6) दण्ड अथवा सेना-

‘मनु’ ने अपने राजनीतिक विचारों के अन्तर्गत ‘दण्ड’ पर भी विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। उन्होंने राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत ‘दण्ड’ को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हुए इसे राज्य की ‘सर्वोच्च शक्ति’ के रूप में लिया है। इसके बल पर ही वह अपनी राजशक्ति का प्रयोग करता है। ‘मनु’ ने इसे राज्य की ‘सम्प्रभु शक्ति’ के प्रतीक के रूप में लिया है। यह एक ऐसी शक्ति है जिसके बिना सामाजिक व्यवस्था और राज्य एक क्षण भी नहीं चल सकता है। सभी मर्यादाएँ नष्ट हो जायेंगो तथा राज्य में अव्यवस्था की स्थिति पैदा हो जायेगी। यह सभी मनुष्यों का रक्षक है तथा भय से ही लोग स्वधर्म का पालन करते हैं। इससे राज्य की सम्पत्ति की रक्षा और उसमें वृद्धि होती है। इसके बल पर राज्य स्वयं निर्भर होकर कार्य करता है तथा प्रजा को निर्भय बनाता है। यह मनुष्य की आसुरी प्रवृत्ति को नियंत्रित कर उसमें दैवी प्रवृत्ति का संचार करता है जिसके फलस्वरूप वह शुद्ध मन से कार्य तथा धर्म का पालन करता है। यहाँ ‘धर्म’ से उनका तात्पर्य वर्णाश्रम धर्म है। वह केवल मनुष्यों की ही नहीं अपितु सभी प्राणियों की रक्षा तथा उनके भोग के अनुकूल व्यवस्था करता है।

‘दण्ड’ को सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान बताते हुए उन्होंने कहा है कि इसका सोच- समझकर पालन करना चाहिए। निर्दोष व्यक्तियों को दण्ड नहीं देना चाहिए अन्यथा इसे देने वाला पाप का भागी होता है। राजा की इस शक्ति के प्रयोग करने वालों पर कड़ी निगरानी और कठोर नियंत्रण रखना चाहिए ताकि वे इसका दुरुपयोग न करने पाये। परिस्थितियों तथा अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार दण्ड की व्यवस्था होना चाहिए। मनु ने सेना को राज्य का महत्त्वपूर्ण तत्त्व माना है। उसे ‘दण्ड’ की भी संज्ञा दी गयी है। सभी चिंतकों ने राज्य की सुरक्षा के लिए शक्तिशाली सैन्यबल को आवश्यक माना है। उन्होंने इसे राज्य के आवश्यकता तत्त्व तत्त्व के रूप में इसलिए प्रस्तुत किया है कि पर्याय सैन्य शक्ति के अभाव में कोई भी राज्य अपनी रक्षा नहीं कर सकता है। किसी ने सैन्य बल के चार-पैदल, घुड़सवार, हाथी तथा रथ पर सवार सैनिक तो किसी ने पाँच अंग माने हैं। उन्होंने इन चारों के अतिरिक्त नौसेना को भी इसमें शामिल किया है। कुछ ने सेना के आठ अंगों का भी उल्लेख किया है।

(7) मित्र अथवा सुहृद-

उन्होंने मित्र (सुहृद) को सातवाँ आवश्यक तत्त्व माना है। एकाधिक विचारकों ने तो इसे सेना से भी अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार मित्र ऐसा हो जो तत्काल सहायता के लिए आगे आये तथा जिससे सम्बन्ध विच्छेद की कोई अशंका न हो।

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है, मनु द्वारा प्रस्तुत राज्य के सात अंगों का प्राचीन भारतीय चिन्तक बृहस्पति, शुक्र, कौटिल्य आदि ने अपने ग्रन्थों में वर्णन किया। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है राज्य के कार्य एवं स्वरूप की दृष्टि से ये तत्त्व अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी हैं। इन तत्त्वों में एक के भी अभाव में राज्य की व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। 

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