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बंग-भंग आन्दोलन

ब्रिटिश शासन की भारत विरोधी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक नीतियों के परिणाम स्वरूप उसके विरुद्ध उत्पन्न हो रही प्रबल उग्र राष्ट्रीयता की भावना के मध्य लार्ड एल्गिन द्वितीय के पश्चात् लार्ड कर्जन भारत के वायसराय होकर आये। वह अपने पूर्ववर्ती लार्ड लेंस डाउन एल्गिन द्वितीय से भी अधिक अनुदारवादी, अदूरदर्शी और भारत विरोधी थे। वह भारतियों को ही अत्यन्त हेय अथवा घृणा की दृष्टि से देखते तथा उनके प्रति उनका दृष्टिकोण एवं व्यवहार अत्यन्त ही अविश्वासपूर्ण और अपमान जनक था। यही कारण था वह उच्च पदों पर भारतीयों की नियुक्ति के घोर विरोधी थे। उनकी यह दुर्भावनापूर्ण मान्यता थी की सत्य में भारतीयों का प्राबल्य होता है इतना ही नहीं वह उन्हें मूर्ख और असभ्य मानते थे। इस पूर्वाग्रह तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की गतिविधियों (उदारवादी गतिविधियों तक को) और राष्ट्रीय चेतना कुचल देने के संकल्प के साथ उन्होंने वाइसराय का पदभार ग्रहण किया। शासन की बागडोर सम्भालते ही उन्होंने अपनी भारत विरोधी राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक नीतियों के माध्यम से भारतीयों पर अपना दमनचक्र प्रारम्भ किया जो ब्रिटिश साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुआ। गोखले जी के अनुसार उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के लिए वही किया, जो औरंगजेब ने मुगल साम्राज्य के लिए किया। उनके द्वारा 1905 में किया गया बंगाल विभाजन उनके दमनचक्र का ही एक अंग था। 

भारत में राष्ट्रीयता की भावना कुचल देने हेतु उन्होंने केन्द्रीकरण, समाचारपत्रों की स्वतंत्रता के हनन और अन्य दमनकारी नीतियों के साथ-साथ हिन्दू मुसलमानों में फूट डालने और उनमें कटुता और वैमनस्यता की भावना पैदा करने की नीति का भी अवलम्बन किया। इसके अन्तर्गत ही उन्होंने 1905 में बंगाल विभाजन जैसा मूर्खतापूर्ण कार्य किया जिसका ब्रिटिश साम्राज्य पर घातक प्रभाव पड़ा तथा जिसने भारत में उग्रराष्ट्रीयता की भावना प्रबल बनाने में उल्लेखनीय योगदान किया। उनके इस मूर्खता एवं अदूरदर्शितापूर्ण कार्य से न केवल बंगाल अपितु पूरे भारत में असन्तोष की प्रबल लहर दौड़ गयी। इसके विरोध में अकेले बंगाल में एक हजार सभाएँ हुई। बंगाल विभाजन की तिथि 16 अक्टूबर 1905 को पूरे देश में राष्ट्रीय शोक दिवस मानया गया।

विभाजन के पूर्व बंगाल- 

इसके पूर्व कि हम बंगाल विभाजन की सरकारी उद्देश्यों और उसके परिणामों की समीक्षा करें हमें विभाजन पूर्व बंगाल के स्वरूप पर प्रकाश डाल लेना चाहिए। उस समय बंगाल में केवल बंगालभाषी ही नहीं अपितु आज के बिहार में उड़ीसा के क्षेत्र भी शामिल थे। शासन और प्रशासन की दृष्टि से वह बहुत ही बड़ा प्रान्त था। तत्त्क्तकालीन चटगाँव, ढाका और मैमनसिंह उसके मुस्लिम बहुल क्षेत्र थे। राष्ट्रीय चेतना की दृष्टि से यह प्रान्त बहुत ही जागृत था। वाइसराय होकर आते ही लार्ड कर्जन ने इसमें राष्ट्रीय चेतना एवं एकता की भावना कुचल देने का निश्चय किया। इसके लिए उन्होंन हिन्दू मुसलमानों को अलग कर देने और उनमें कटुता की भावना पैदा करने के उद्देश्य से बंगाल विभाजन की योजना बनायी जो 16 अक्टूबर को कार्यान्वित की गयी।

बंगाल विभाजन के उद्देश्य

यों तो प्रत्यक्ष रूप में लार्ड कर्जन ने घोषणा की कि सुशासन एवं सुव्यवस्था की स्थापना ही बंगाल विभाजन लक्ष्य है परन्तु रन्तु उनकी यह घोषणा धूर्तता और दुर्भावना से भरी थी। । यदि सचमुच यही उसका लक्ष्य होता तो उन्होंने चटगाँव, ढाका और मैमनसिंह जैसे मुस्लिम बहुत क्षेत्रों तो असम में मिलाने के बजाय बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करने की कार्रवाई की होती। उस समय चटगाँव और ढाका में मुसलमानों की सभाओं में उनके द्वारा किये गये भाषण से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सुशासन नहीं अपितु राष्ट्रीय चेतना कुचलने के लिए हिन्दू मुसलमानों को अलग करना उनका लक्ष्य था। जहाँ तक बंगाल विभाजन के उद्देश्यों का प्रश्न है, हम उन्हें दो भागों में विभक्त कर,सकते हैं-(1) प्रत्यक्ष अथवा घोषित (2) अप्रत्यक्ष अथवा अघोषित।

प्रत्यक्ष अथवा घोषित उद्देश्य 

तत्त्कालीन बंगाल प्रान्त क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा था। उसमें आज के पश्चिमी बंगाल (बंगाल) और पूर्वी बंगाल (बंगलादेश) सहित बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र भी शामिल थे। विस्तृत क्षेत्र एवं व्यापक जनसंख्या के कारण उसमें सुव्यवस्थित ढंग से शासन संचालन में कठिनाई का अनुभव होना स्वाभाविक था। सुशासन एवं सुव्यवस्था को ही लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन का प्रत्यक्ष लक्ष्य घोषित किया परन्तु विवेचना से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनकी यह घोषणा धूर्ततापूर्ण आश्चर्यजनक और अपमानजनक थी। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इसे आश्चर्यचकित जनता पर बम गिरने की संज्ञा दी। उन्होंने इसे अपमान एवं उपहास तथा बंगलाभाषी जनता की बढ़ती हुई चेतना पर भीषण प्रहार कहा। डॉ० जकारिया ने भी इसकी कटु आलोचना करते हुए इसे नितान्त धूर्ततापूर्ण कहा। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि घोषित उद्देश्य मात्र दिखावटी था क्योंकि यदि ऐसा न होता तो लार्ड कर्जन ने चटगाँव डिवीजन में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को ही केवल बंगाल से अलग न किया होता। यदि उन्होंने सुशासन की दृष्टि से यह कदम उठाया होता तो उन्हें बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करना चाहिए था। यही उनके शासन और बंगाल की जनता के लिए उपयुक्त एवं न्यायसंगत होता। 

अप्रत्यक्ष अथवा अघोषित लक्ष्य

वास्तविकता तो यह है कि लार्ड कर्जन ने सुशासन नहीं अपितु एकाधिक अप्रत्यक्ष उद्देश्यों के लिए बंगाल विभाजन का कदम उठाया जिनकी उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से घोषणा नहीं की। इसके पीछे दो अप्रत्यक्ष उद्देश्य थे-(1) हिन्दू मुसलमानों में फूट एवं कटुता पैदा करना, (2) बंगाल की जनता की राष्ट्रीय चेतना कुचलना। लार्ड कर्जन अनुदारवादी और पूर्णतः भारत विरोधी थे। वह यहाँ किसी भी प्रकार राष्ट्रीय चेतना को जागृति (सहन) करने के लिए तैयार नहीं थे। अपने पूर्ववर्ती लार्ड लैंसडाउन और लार्ड एल्गिन (द्वितीय) से भी आगे बढ़कर वह राष्ट्रीय चेतना को कुचल देने के लिए कृत संकल्प थे। अन्य अनुदारवादी अंग्रेज शासकों की तरह वह भी इस मत के थे कि हिन्दू मुस्लिम एकता भंग किये बिना भारत में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना कुचली नहीं जा सकती है। हिन्दू मुसलमानों की एकता भंग तथा उनमें कटुता पैदा करने के लिए ही उन्होंने बंगाल के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को असम में मिलाकर मुस्लिम बहुल प्रान्त की स्थापना करने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, उन्होंने मुसलमानों की सभाओं में साम्प्रदायिक भाषण देकर बंगाल विभाजन का औचित्य प्रतिपादित किया तथा उनके मन में हिन्दुओं के प्रति अविश्वास, घृणा और कटुता की भावना पैदा की। ए.सी. मजूमदार के अनुसार उन्होंने मुसलमानों की सभाओं में साफ-साफ कहा कि केवल प्रशासकीय सुविधा ही नहीं अपितु प्रान्त बनाना भी बंगाल विभाजन का उद्देश्य है। उन्हें हिन्दुओं से अलग करने के लिए ही उन्होंने यह भी कहा कि मैं एक मुस्लिम प्रान्त बैनाना चाहता हूँ जहाँ इस्लाम के अनुयायियों का बोलबाला हो।

हिन्दू मुसलमानों को अलग करने की लार्ड कर्जन की नीति निरुद्देश्य नहीं थी। भारत, विशेष रूप से बंगाल में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना को कुचल देना तत्त्कालीन ब्रिटिश शासन की प्रमुख नीति थी। ब्रिटिश शासक तो अब उदारवादियों की संवैधानिक कार्रवाईयाँ तक सहन करने को तैयार नहीं थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में तेजी से पनप रही उग्रवादी प्रवृत्ति को तो वे किसी भी कीमत प्र सहन नहीं कर सकते थे। भारत और भारतीयों के प्रति घृणा एवं कटुता की भावना रखने वाले अनुदारवादी लार्ड कर्जन राष्ट्रीय चेतना को कुचलकर ब्रिटिश शासन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ही यहाँ वाइसराय बनाकर भेजे गये थे। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने इस मुख्य उद्देश्य की पूर्ति की योजना बनानी शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को भंग करना सबसे आवश्यक समझा और इसीलिए उन्होंने बंगाल को विभक्त कर मुस्लिम बहुल प्रान्त बनाने की योजना बनायी। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय चेतना को कुचल देने के लिए हिन्दू मुसलमानों को अलग करने के उद्देश्य से लार्ड कर्जन ने सुशासन के नाम पर बंग-भंग की अपनी धूर्ततापूर्ण कार्रवाई की जो • ब्रिटिश शासन के लिए चुनौती तथा राष्ट्रीय चेतना के लिए वरदान सिद्ध हुई।

बंगाल विभाजन की कार्रवाई तथा उसके विरुद्ध प्रतिक्रिया 

लार्ड कर्जन ने 16 अक्टूबर 1905 को अपनी इस योजना की मूर्तरूप दिया। चटगाँव डिवीजन के दो बड़े जिले ढाका और मैमन सिंह को असम में मिलाकर पूर्वी बंगाल के नाम एक • ऐसे मुस्लिम बहुल प्रान्त का निर्माण किया गया जिसमें स्वयं लार्ड कर्जन के अनुसार मुसलमानों को वह एकता प्राप्त होती जो उन्हें मुस्लिम बादशाहों एवं सूबेदारों के राज्य में कभी प्राप्त नहीं थी। उनकी इस र्कावाई के विरुद्ध पूरे देश में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। बंगाल में तो यह तीव्रतम थी। इसके विरुद्ध पूरे देश में ब्रिटिश सरकार के पास काफी संख्या में ज्ञापन भेजकर बंग-भंग न करने की माँग की गयी। बंगाल तो इससे सर्वाधिक क्षुब्ध, रुष्ट और मर्माहत था। सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने इसे आश्चर्यचकित जनता पर बम गिरना कहा। उन्होंने कहा कि हमें अपमानित, हमारा उपहास तथा हमसे धोखा किया गया। उन्होंने इसे बंगलाभाषी जनता के भविष्य के लिए संकट तथा उसकी बढ़ती हुई चेतना पर भीषण प्रहार की संज्ञा दी। उनका यह मर्मभेदी उद्‌गार केवल उनका ही नहीं अपितु पूरे बंगाल का था। यहाँ तक कि ब्रिटिश शासन को वरदान मानने वाले उदारवादियों ने भी इसके विरुद्ध तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनके नेता गोखले जी ने कहा कि ऐसे शासन का उदाहरण ढूँढ़ने के लिए हमें औरंगजेब का इतिहास पढ़ना पड़ेगा।

बंगाल विभाजन के विरुद्ध उभड़े रोष के कारण बंगाल में जो तीव्र आन्दोलन प्रारम्भ हुआ, वह शीघ्र ही पूरे देश में फैल गया। चारों तरफ सभाओं, हड़तालों और प्रदर्शनों के आयोजन का सिलसिला शुरू हो गया। अकेले बंगाल में एक हजार सभाएँ हुई हजार व्यक्तियों ने हस्ताक्षर कर ब्रिटिश पार्लियामेण्ट के पास प्रार्थनापत्र भेज इसका विरोध किया। 15 अक्टूबर 1905 को राष्ट्रीय शोक दिवस मानाय गया। भारतीयों की इन तीखी प्रतिक्रियाओं का ब्रिटिश शासन पर न तो कोई असर पड़ा और न इसका कोई परिणाम ही निकला। लार्ड कर्जन ने तो इसके विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन को बनावटी और कुछ स्वार्थी तत्त्वों के मस्तिष्क की उपज कहा। पूरे विरोध की उपेक्षा कर बंगाल विभाजन की योजना कार्यान्वित कर दी गयी।

बंगाल विभाजन के परिणाम

लार्ड कर्जन की बंगाल विभाजन की धूर्तता एवं मूर्खतापूर्ण कार्रवाई ब्रिटिश शासन के लिए घातक सिद्ध हुई। उन्होंने भारत में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना कुचल देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया परन्तु अनुकूल नहीं अपित प्रतिकूल परिणाम निकला। इस कदम ने भारतीयों के मन में यह विश्वास दृढ़ कर दिया कि ब्रिटिश शासन उनके हितों का विरोधी है। इसने भारतीय राजनीति के उदारवादी राष्ट्रीय चेतना का वर्चस्व समाप्त करने तथा उग्रवादी आन्दोलन को प्रबल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। स्वयं उदारवादियों के नेता गोखले जी ने कहा कि बंगाल विभाजन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न जनरोष चिरस्मरणीय रहेगा। इसने उग्रवादी आन्दोलन को बल प्रदान किया, उससे राष्ट्रीय चेतना को एक नयी मोड़ मिली। भारतीय जनता का मन संवैधानिक आन्दोलन से हट स्वदेशी और स्वराज्य प्राप्ति की तरफ मुड़ गया। जहाँ एक तरफ बंगाल विभाजन ने राष्ट्रीय चेतना को एक नयी मोड़ दी वहीं दूसरी तरफ उसने हिन्दू-मुसलमानों की एकता भंग एवं उनके बीच कटुता पैदा करने की ब्रिटिश शासन, विशेष रूप से लार्ड कर्जन की योजना को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। विश्लेषण से यह बात साफ हो जाती है कि बंगाल विभाजन की नींव डाल दी। संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन के परिणाम का एक पक्ष उज्ज्वल तथा दूसरा अन्धकारमय था। जहाँ एक तरफ सही प्रभावकारी चेतना की जागृति हुई, वहीं दूसरी तरफ इससे हिन्दू मुसलमानों के के बीच साम्प्रदायिकता की भावना का बीजारोपण भी हुआ। 

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