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बंगाल विभाजन के परिणाम

लार्ड कर्जन की बंगाल विभाजन की धूर्तता एवं मूर्खतापूर्ण कार्रवाई ब्रिटिश शासन के लिए घातक सिद्ध हुई। उन्होंने भारत में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना कुचल देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया परन्तु अनुकूल नहीं अपित प्रतिकूल परिणाम निकला। इस कदम ने भारतीयों के मन में यह विश्वास दृढ़ कर दिया कि ब्रिटिश शासन उनके हितों का विरोधी है। इसने भारतीय राजनीति के उदारवादी राष्ट्रीय चेतना का वर्चस्व समाप्त करने तथा उग्रवादी आन्दोलन को प्रबल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान किया। स्वयं उदारवादियों के नेता गोखले जी ने कहा कि बंगाल विभाजन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न जनरोष चिरस्मरणीय रहेगा। इसने उग्रवादी आन्दोलन को बल प्रदान किया, उससे राष्ट्रीय चेतना को एक नयी मोड़ मिली। भारतीय जनता का मन संवैधानिक आन्दोलन से हट स्वदेशी और स्वराज्य प्राप्ति की तरफ मुड़ गया। जहाँ एक तरफ बंगाल विभाजन ने राष्ट्रीय चेतना को एक नयी मोड़ दी वहीं दूसरी तरफ उसने हिन्दू-मुसलमानों की एकता भंग एवं उनके बीच कटुता पैदा करने की ब्रिटिश शासन, विशेष रूप से लार्ड कर्जन की योजना को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। विश्लेषण से यह बात साफ हो जाती है कि बंगाल विभाजन की नींव डाल दी। संक्षेप में हम यही कह सकते हैं कि बंगाल विभाजन के परिणाम का एक पक्ष उज्ज्वल तथा दूसरा अन्धकारमय था। जहाँ एक तरफ सही प्रभावकारी चेतना की जागृति हुई, वहीं दूसरी तरफ इससे हिन्दू मुसलमानों के के बीच साम्प्रदायिकता की भावना का बीजारोपण भी हुआ। 

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