Test Examine

बंगाल विभाजन के उद्देश्य

यों तो प्रत्यक्ष रूप में लार्ड कर्जन ने घोषणा की कि सुशासन एवं सुव्यवस्था की स्थापना ही बंगाल विभाजन लक्ष्य है परन्तु रन्तु उनकी यह घोषणा धूर्तता और दुर्भावना से भरी थी। । यदि सचमुच यही उसका लक्ष्य होता तो उन्होंने चटगाँव, ढाका और मैमनसिंह जैसे मुस्लिम बहुत क्षेत्रों तो असम में मिलाने के बजाय बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करने की कार्रवाई की होती। उस समय चटगाँव और ढाका में मुसलमानों की सभाओं में उनके द्वारा किये गये भाषण से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सुशासन नहीं अपितु राष्ट्रीय चेतना कुचलने के लिए हिन्दू मुसलमानों को अलग करना उनका लक्ष्य था। जहाँ तक बंगाल विभाजन के उद्देश्यों का प्रश्न है, हम उन्हें दो भागों में विभक्त कर,सकते हैं-(1) प्रत्यक्ष अथवा घोषित (2) अप्रत्यक्ष अथवा अघोषित।

प्रत्यक्ष अथवा घोषित उद्देश्य तत्त्कालीन बंगाल प्रान्त क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा था। उसमें आज के पश्चिमी बंगाल (बंगाल) और पूर्वी बंगाल (बंगलादेश) सहित बिहार एवं उड़ीसा के क्षेत्र भी शामिल थे। विस्तृत क्षेत्र एवं व्यापक जनसंख्या के कारण उसमें सुव्यवस्थित ढंग से शासन संचालन में कठिनाई का अनुभव होना स्वाभाविक था। सुशासन एवं सुव्यवस्था को ही लार्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन का प्रत्यक्ष लक्ष्य घोषित किया परन्तु विवेचना से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि उनकी यह घोषणा धूर्ततापूर्ण आश्चर्यजनक और अपमानजनक थी। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने इसे आश्चर्यचकित जनता पर बम गिरने की संज्ञा दी। उन्होंने इसे अपमान एवं उपहास तथा बंगलाभाषी जनता की बढ़ती हुई चेतना पर भीषण प्रहार कहा। डॉ० जकारिया ने भी इसकी कटु आलोचना करते हुए इसे नितान्त धूर्ततापूर्ण कहा। संक्षेप में हम यह कह सकते हैं कि घोषित उद्देश्य मात्र दिखावटी था क्योंकि यदि ऐसा न होता तो लार्ड कर्जन ने चटगाँव डिवीजन में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को ही केवल बंगाल से अलग न किया होता। यदि उन्होंने सुशासन की दृष्टि से यह कदम उठाया होता तो उन्हें बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग करना चाहिए था। यही उनके शासन और बंगाल की जनता के लिए उपयुक्त एवं न्यायसंगत होता। 

अप्रत्यक्ष अथवा अघोषित लक्ष्य-वास्तविकता तो यह है कि लार्ड कर्जन ने सुशासन नहीं अपितु एकाधिक अप्रत्यक्ष उद्देश्यों के लिए बंगाल विभाजन का कदम उठाया जिनकी उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से घोषणा नहीं की। इसके पीछे दो अप्रत्यक्ष उद्देश्य थे-(1) हिन्दू मुसलमानों में फूट एवं कटुता पैदा करना, (2) बंगाल की जनता की राष्ट्रीय चेतना कुचलना। लार्ड कर्जन अनुदारवादी और पूर्णतः भारत विरोधी थे। वह यहाँ किसी भी प्रकार राष्ट्रीय चेतना को जागृति (सहन) करने के लिए तैयार नहीं थे। अपने पूर्ववर्ती लार्ड लैंसडाउन और लार्ड एल्गिन (द्वितीय) से भी आगे बढ़कर वह राष्ट्रीय चेतना को कुचल देने के लिए कृत संकल्प थे। अन्य अनुदारवादी अंग्रेज शासकों की तरह वह भी इस मत के थे कि हिन्दू मुस्लिम एकता भंग किये बिना भारत में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना कुचली नहीं जा सकती है। हिन्दू मुसलमानों की एकता भंग तथा उनमें कटुता पैदा करने के लिए ही उन्होंने बंगाल के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों को असम में मिलाकर मुस्लिम बहुल प्रान्त की स्थापना करने का प्रयास किया। इतना ही नहीं, उन्होंने मुसलमानों की सभाओं में साम्प्रदायिक भाषण देकर बंगाल विभाजन का औचित्य प्रतिपादित किया तथा उनके मन में हिन्दुओं के प्रति अविश्वास, घृणा और कटुता की भावना पैदा की। ए.सी. मजूमदार के अनुसार उन्होंने मुसलमानों की सभाओं में साफ-साफ कहा कि केवल प्रशासकीय सुविधा ही नहीं अपितु प्रान्त बनाना भी बंगाल विभाजन का उद्देश्य है। उन्हें हिन्दुओं से अलग करने के लिए ही उन्होंने यह भी कहा कि मैं एक मुस्लिम प्रान्त बैनाना चाहता हूँ जहाँ इस्लाम के अनुयायियों का बोलबाला हो।

हिन्दू मुसलमानों को अलग करने की लार्ड कर्जन की नीति निरुद्देश्य नहीं थी। भारत, विशेष रूप से बंगाल में तेजी से बढ़ती हुई राष्ट्रीय चेतना को कुचल देना तत्त्कालीन ब्रिटिश शासन की प्रमुख नीति थी। ब्रिटिश शासक तो अब उदारवादियों की संवैधानिक कार्रवाईयाँ तक सहन करने को तैयार नहीं थे। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में तेजी से पनप रही उग्रवादी प्रवृत्ति को तो वे किसी भी कीमत प्र सहन नहीं कर सकते थे। भारत और भारतीयों के प्रति घृणा एवं कटुता की भावना रखने वाले अनुदारवादी लार्ड कर्जन राष्ट्रीय चेतना को कुचलकर ब्रिटिश शासन को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से ही यहाँ वाइसराय बनाकर भेजे गये थे। पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने इस मुख्य उद्देश्य की पूर्ति की योजना बनानी शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता को भंग करना सबसे आवश्यक समझा और इसीलिए उन्होंने बंगाल को विभक्त कर मुस्लिम बहुल प्रान्त बनाने की योजना बनायी। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि राष्ट्रीय चेतना को कुचल देने के लिए हिन्दू मुसलमानों को अलग करने के उद्देश्य से लार्ड कर्जन ने सुशासन के नाम पर बंग-भंग की अपनी धूर्ततापूर्ण कार्रवाई की जो • ब्रिटिश शासन के लिए चुनौती तथा राष्ट्रीय चेतना के लिए वरदान सिद्ध हुई।

Leave a comment