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जयप्रकाश नारायण के सामाजिक विचार

जय प्रकाश नारायण के समाजवादी एवं सर्वोदयी विचारक के रूप में सत्ता के। विकेन्द्रीकरण, निर्वाचन प्रणाली में सुधार तथा दल विहीन लोकतन्त्र के विचारों

महात्मा गाँधी जय प्रकाश जी को समाजवाद का सबसे बड़ा भारतीय विद्वान् मानते थे। समाजवादी होने के नाते जय प्रकाश ने इस बात को स्पष्ट किया कि सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में व्याप्त असमानता का मुख्य कारण यह है कि कुछ लोगों का उत्पादन के साधनों पर अधिक नियंत्रण है और बहुसंख्यक लोग उनसे वंचित हैं। इसलिये उनका आग्रह था कि समाज ऐसी व्यवस्था करे जिससे मनुष्य की शक्ति और क्षमताओं को निष्फल करने वाली आर्थिक बाधायें दूर हो सकें। वे सामाजिक तथा आर्थिक समानता के समर्थक थे। उनके समाजवाद का उद्देश्य सम्पूर्ण समाज का सामंजस्यपूर्ण तथा सन्तुलित विकास है। 

समाजवाद की स्थापना उत्पादन के साधनों का समाजीकरण करके ही किया जा सकता है। समाजवाद ही विशाल जनसमुदाय के आर्थिक शोषण की क्रूर प्रक्रिया का अन्त कर सकता है। जय प्रकाश नारायण ने कराची कांग्रेस में में मूल अधिकारों से सम्बन्धित प्रस्ताव की आलोचना की थी। वे भूमिकर को घटाने, व्यय को कम करने तथा उद्योगों के राष्ट्रीयकरण के पक्ष में थे। मूल आर्थिक तथा सामाजिक समस्या यह थी कि जनता के शोषण का अन्त कैसे किया जाये। यह तभी सम्भव था जबकि जनता अपने प्रयत्नों से राजनीतिक तथा आर्थिक जीवन पर नियंत्रण स्थापित कर लेती है। 1934 ई० में जय प्रकाश नारायण ने अनुभव किया कि समाजवाद ही भारत की स्वाधीनता का आधार बन सकता है। 1940 ई० में उन्होंने रामगढ़ कांग्रेस में एक प्रस्ताव रखा जिसका आशय था कि बृहत उत्पादन-संस्थाओं पर सामूहिक स्वामित्व तथा नियंत्रण स्थापित किया जाये। उन्होंने आग्रह किया कि भारी परिवहन, जहाजरानी, खनन तथा भारी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जाय।

जय प्रकाश नारायण के अनुसार समाजवाद उन प्रमुख मूल्यों के विरुद्ध नहीं है जिनका भारतीय संस्कृति ने पोषण किया। वस्तुओं को मिल बाँटकर उपभोग करना भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है, इसलिए यह आरोप हास्यापद है कि समाजवाद का सिद्धान्त पश्चिम से लिया गया है। इसमें सन्देह नहीं है कि समाजवाद के व्यवस्थित आर्थिक सिद्धान्तों का निरूपण पश्चिम में हुआ किन्तु उसका मूल आदर्शवाद भारतीय संस्कृति का ही अंग है।

जय प्रकाश नारायण ग्राम जीवन के पुनर्संगठन के पक्ष में थे। वे चाहते थे कि गाँवों को स्वायत्त तथा स्वावलम्बी इकाइयाँ बनाया जाय। इसके लिये भूमि सम्बन्धी कानूनों में आमूल सुधार करने की आवश्यकता थी। भूमि पर किसान का स्वामित्त्व होना चाहिए। जयप्रकाश नारायण ने सहकारी खेती का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि ‘वास्तविक समाधान यह है कि उन सभी निहित स्वार्थों का उन्मूलन किया जाये जिनसे किसी भी रूप में भूमि जोतने वालों का शोषण होता है, किसानों के सभी ऋण को निरस्त कर दिया जाय, जोतों को एकत्र करके सहकारी और सामूहिक फार्मों की तथा राजकीय और सहकारी ऋण-व्यवस्था तथा हाट- व्यवस्था और सहकारी उद्योगों की स्थापना की जाये।’ जे० पी० का विचार था कि एशिया की मुख्य आर्थिक समस्या कृषि पुनर्निर्माण की है। उत्पादन के साधनों का समाजीकरण करना निश्चित रूप से अति आवश्यक है।

जय प्रकाश नारायण सर्वोदयी विचारक के रूप में

जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि आरम्भ में जय प्रकाश मुख्यतया समाजवादी थे लेकिन धीरे-धीरे वे एक सर्वोदयी नैता बन गये। सर्वोदयी विचारक के रूप में उनकी प्रमुख देन दलविहीन लोकतंत्र की विचारधारा है। श्री जय प्रकाश केवल वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के दोषों की ओर ही संकेत नहीं करते, वरन् उनको दूर करने के लिए भी सुझाव देते हैं। सार्वजनिक मामलों में नागरिकों सहित सक्रिय भाग लेने के कारण जय प्रकाश ‘भागीदार लोकतंत्र दलविहीन लोकतंत्र’ आदि की संज्ञा दी। जीने इस व्यवस्था को

1. सत्ता का विकेन्द्रीयकरण-

जयप्रकाश स्वशासी एवं आत्मनिर्भर ग्राम समाजों को नवीन ‘सावयवी लोकतंत्र’ की आधारभूत इकाइयाँ मानते थे। शासन सत्ता को हमारे लाखों गाँवों में वितरित किया जाना चाहिये, स्थानीय स्वशासन की एक स्वस्थ एवं सुदृढ़ स्थापना की जानी चाहिये। जय प्रकाश पंचायती राज की स्थापना का स्वागत करते थे परन्तु यह जयप्रकाश जी के ग्राम राज्य के आदर्श से बहुत दूर हैं।

जय प्रकाश की धारणा थी कि ग्राम राज्य का आदर्श का तभी साक्षात्कार किया जा सकता है जब सम्पूर्ण राजनीतिक सत्ता का प्रयोग ग्रामवासी स्वयं करे और जनता द्वारा प्रशासन का यही सिद्धान्त जिला तथा प्रान्त के स्तर पर व्यवहृत किया जाना चाहिये। जय प्रकाश ने इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिये।

(i) सम्पूर्ण योजना की आधारशिला ग्राम सभा को बनाया जाना चाहिए ग्राम पंचायत को नहीं।

(ii) जनता को समुचित शिक्षा दी जानी चाहिए।

(iii) राजनीतिक दलों को किसी भी स्तर पर पंचायतों के चुनावों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

(iv) उच्चतर स्तरों पर ग्राम सभाओं तथा पंचायतों को वास्तविक सत्ता हस्तांतरित की

जानी चाहिए। वास्तविक सत्ता प्राप्त करने का साधन नहीं बनाया जाना चाहिए। (v) प्रत्येक स्थानीय निकाय के पास अपने कार्यों को करने के लिए पर्याप्त वित्तीय साधन होने चाहियें। पंचायतों को सत्ता प्रदान करने से तब तक कोई लाभ नहीं होगा जब तक कि धन के ऊपर सरकार का अधिकार है।

2. निर्वाचन प्रणाली में सुधार 

दलविहीन इस लोकतंत्र की योजना में हमें दो महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त देखने को मिलते हैं। पहला सिद्धान्त यह है कि इसके अन्तर्गत दलीय राजनीति तथा निर्वाचन की कार्यपद्धति के स्थान पर सामुदायिक सर्वसम्मति को अपनाना है। बहुसंख्यकों के निर्णय के स्थान पर मतैक्य के सिद्धान्त को प्रतिष्ठित करना। दूसरा सिद्धान्त है अप्रत्यक्ष नाम निर्देशन की प्रणाली को कार्यान्वित करना। उदाहरण के लिए थाना पंचायत के सदस्यों को उस थाने की ग्राम पंचायतों के सदस्य चुनेंगे, न न कि उस थाने के सब निवासी। इस प्रकार जिला पंचायत में सम्पूर्ण जिले की निवासी सामूहिक रूप से भाग नहीं लेंगे। चुनाव केवल जिले के थाना पंचायतों के सदस्य करेंगे। प्रान्तीय तथा केन्द्रीय प्रशासकों अथवा प्रान्तीय और केन्द्रीय विधान सभा के सदस्यों का निर्वाचन भी अप्रत्यक्ष नाम निर्देशन के सिद्धान्त के आधार पर ही होगा। इस प्रकार प्रान्त तथा केन्द्र के स्तर पर अप्रत्यक्ष निर्वाचन के सिद्धान्त को बड़े पैमाने पर क्रियान्वित किया जायेगा।

अप्रत्यक्ष नाम निर्देशन अथवा अप्रत्यक्ष निर्वाचन का यह सिद्धान्त दो दृष्टियों से दोषपूर्ण है। इसका प्रथम मुख्य दोष यह है कि यह व्यक्तियों की नैतिक तथा राजनैतिक गरिमा को कम करता है। व्यावहारिक दृष्टि से इसका दोष यह है कि विभिन्न पंचायतों को चुनने में भारी उलझनों और झंझटों का सामना करना पड़ेगा।

दलविहीन शासन प्रणाली-

जय प्रकाश ऐसे समाज की स्थापना चाहते थे जो दलों के रोग से विमुक्त होगा। वह वर्तमान संसदीय राजनीति में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हैं।जयप्रकाश वर्तमान संसदीय लोकतंत्र में निम्नलिखित दोष देखते हैं-

(अ) राजनीतिक शक्ति की प्राप्ति से उत्पन्न भ्रष्टाचार तथा कुत्सित आचरण।

(ब) सर्वत्र व्यापक आर्थिक तथा सामाजिक असमानता।

(स) अधिक से अधिक उपभोग सामग्री को प्राप्त करने की प्रतियोगितामूलक उत्कण्ठा जिससे अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक सन्तुलन बिगड़ता है।

(द) भारतीय संसदीय लोकतंत्र का मुख्य दोष यह है कि इस प्रणाली को बाहर से आयात किया गया है। इसीलिए वह देश की जनता के स्वाभाविक प्रेम तथा कथित भक्ति को आकृष्ट करने में असफल रही है।

दलविहीन लोकतंत्र की धारणा निस्संदेह बहुत आकर्षक है, परन्तु कठिनाई यह है कि विधानसभा तथा लोकसभा के सदस्यों के चुनाव में राजनीतिक दलों की भूमिका को समाप्त करना अत्यन्त दुष्कर है। दलविहीन लोकतंत्र ग्राम स्तर पर सम्भव प्रतीत होता है, किन्तु राज्य तथा राष्ट्रीय स्तरों पर नहीं।

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