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North South Dialogue in Hindi

North South

उत्तर दक्षिण संवाद नए अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के स्थापना की विकासशील देशों की माँग  के सन्दर्भ में जब विकसित देशों ने अपनी नीति में परिवर्तन की बात सोची तब उनके तथा पिछड़े एवं विकासशील देशों  के बीच विश्व के आर्थिक ढाँचे में परिवर्तन के लिए जो विभिन्न सम्मेलनों एवं मंचों के माध्यम से विचार-विमर्श शुरू हुए, उन्हें उत्तर दक्षिण संवाद (North South Dialogue) की संज्ञा दी गई।

विकसित देशों के लिए ‘उत्तर’ शब्द का प्रयोग इसलिए किया गया या किया जाता कि भूगोलवेत्ताओं ने पूरी पृथ्वी को जिन दो गोलाद्धों- ‘उत्तर’ एवं ‘दक्षिण’ में विभक्त किया है, उनमें से पहले अर्थात् ‘उत्तर’ के अन्तर्गत विकसित संयुक्त राज्य अमेरिका और सभी यूरोपीय देश आते हैं। आज भी अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पर इसी गोलार्द्ध के इन विकसित देशों का वर्चस्व एवं प्रभाव बना हुआ है। आज अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में ‘उत्तर’ शब्द का विकसित देशों के पर्यायवाची के रूप में प्रयोग किया जाता है। दक्षिणी गोलार्द्ध के अन्तर्गत एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील, पिछड़े एवं गरीब देश आते हैं। ‘उत्तर’ समृद्ध, विकसित और शोषक तथा ‘दक्षिण’ पिछड़े, गरीब, शोषित एवं विकासशील देशों का गोलार्द्ध है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि इन गोलाद्ध में आने वाले साम्यवादी देशों को ‘उत्तर’ और ‘दक्षिण’ की परिभाषा में शामिल नहीं किया गया।

उत्तर पूँजीवादी व्यवस्था वाले देशों का द्योतक है। दक्षिण से तात्पर्य उन देशों से है जो मिश्रित अर्थव्यवस्था अर्थात् अर्द्धपूँजीवादी एवं अर्द्धसमाजवादी ढाँचे के अन्तर्गत अपना औद्योगिक एवं आर्थिक विकास करना चाहते हैं। ये वे देश हैं जो सोवियत संघ के पतन के पूर्व तक अपने साथ ‘समाजवाद’ शब्द जोड़कर पूँजीवादी प्रणाली के विकास में विश्वास करते थे। रूस में साम्यवादी व्यवस्था के अंत के साथ ही उन्होंने ‘समाजवाद’ अथवा ‘समाजवादी व्यवस्था’ के स्थान पर ‘उदारीकरण’ की रट लगानी शुरू कर दी है।

इन पिछड़े और विकासशील देशों की कुल जनसंख्या विश्व आबादी की लगभग 74 प्रतिशत है जबकि विकसित देशों का जनसंख्या अनुपात लगभग 26 प्रतिशत ही है। विकसित देश जनसंख्या का इतना कम अनुपात होते हुए भी विश्व के कुल उत्पादन का 78 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पाते हैं जबकि पिछड़े एवं गरीब विकासशील राष्ट्र केवल 21 प्रतिशत या उससे थोड़ा ही अधिक पाते हैं।

दक्षिण गोलार्द्ध के उन विकाशील देशों की ‘नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था‘ को स्थापना की जोरदार माँग ने 60 के दशक में ही विकसित देशों को उनसे उस पर विचार-विमर्श के लिए बाध्य कर दिया। सन् 1964 से 1967 के बीच ‘गेट समझौते’ (व्यापार एवं प्रशुल्क सम्बन्धी सामान्य समझौते) के अन्तर्गत विकासशील देशों के निर्यात में वृद्धि के लिये अनेक सुझावों पर विचार-विमर्श हुए परन्तु कोई ठोस नतीजा सामने नहीं आया। उसी समय से विकसित देशों को इस माँग ने जोर पकड़ना शुरू किया है कि विकसित देश आर्थिक सहायता देने के बजाय उनके निर्यात को रियायतें देकर उसके अधिक से अधिक विस्तार का मार्ग प्रस्तुत करें।

सन् 1970 का दशक प्रारम्भ होते ही विकासशील देशों ने अपना पिछड़ापन और अपनी गरीबी दूर करने हेतु अपने औद्योगिक एवं आर्थिक विकास के लिए न्याय और लोकतांत्रिक सिद्धान्तों एवं आदर्शों के आधार पर ‘नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के स्थापना की जोरदार माँग शुरू कर दी। उसके दबाव के कारण मई, 1974 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा ने अपने विशेष अधिवेशन में ‘नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था‘ के स्थापना की घोषणा और उससे सम्बन्धित कार्यक्रम का एक प्रस्ताव पारित किया। उसके बाद विकासशील देशों ने ‘अंकटाड सम्मेलन तथा निर्गुट शिखर सम्मेलनों’ आदि में भी नयी अन्तर्राष्ट्रीय अथव्यवस्था के स्थापना की जोरदार माँग उठायी।

विकसित देशों ने इस बात का अनुभव करना शुरू कर दिया कि विकासशील देशों की उचित माँगों एवं उनकी इच्छा की बहुत दिनों तक उपेक्षा नहीं की जा सकती है। उन्होंने यह भी देखा कि विकासशील देशों की गिरती आर्थिक स्थिति उनकी अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव डाल रही है तथा वह भविष्य में उसके लिए घातक सिद्ध होगी। उन्होंने यह भी अनुभव करना शुरू किया कि अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सम्बन्धों में सन्तोषजनक सुधार का न होना विश्व शान्ति के लिए भी घातक होगा।

अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने भी सन् 1985 की अपनी रिपोर्ट में विकासशील देशों के निर्यात विस्तार के लिए विकसित देशों से आर्थिक संरक्षण तथा व्यापार सम्बन्धी प्रतिबन्धों के समाप्ति की सिफारिश की। उसने उसमें चेतावनी दी कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में राष्ट्रों के बीच सहयोग को भारी आघात पहुँचेगा। उसने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार क्षेत्र hi उदार बनाना विकसित राष्ट्रों का विशेष दायित्त्व है। अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में सुधार तथा परिवर्तन के लिए पड़ने वाले इन दबावों ने विकसित और विकासशील देशों के बीच विचार- विमर्श की जो पृष्ठभूमि तैयार की उसके सन्दर्भ में अनेक उत्तर-दक्षिण संवाद हुए, जैसे पेरिस सम्मेलन 1975-76), ब्रांट आयोग (1977), कानकुन सम्मेलन (1981), उरुग्वे वार्ता (1986-93), पृथ्वी सम्मेलन (1992) तथा अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन (1993)। जब तक अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था विकासशील देशों के इच्छानुसार नया रूप नहीं धारण कर लेगी तब तक इस प्रकार के संवाद चलते रहेंगे।

पेरिस सम्मेलन (1975-77) – Paris Conference (1975-77) –

संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में सन् 1974 में स्वीकृत प्रस्ताव के बाद से ही अमेरिका ने विकसित और विकासशील देशों के बीच आर्थिक सहयोग के बारे में विचार-विमर्श के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाने की पहल शुरू कर दी। उसके प्रयास से दिसम्बर 1975 में इस प्रकार के सम्मेलन का आयोजन प्रारम्भ हुआ जो कतिपय व्यवधानों के बीच लगभग 18 महीने तक चला। इसके आयोजन में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री डॉ० हेनरी किसिंगर की विशेष रुचि और उनका महत्त्वपूर्ण हाथ रहा। अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग सम्मेलन के नाम से अभिभूत यह सम्मेलन जून, 1977 में समाप्त हुआ।

इसमें 8 विकसित तथा 19 विकासशील देशों ने भाग लिया। इसमें विकसित और समृद्ध उत्तरी गोलार्द्ध के देशों ने पिछड़े एवं विकासशील देशों के आर्थिक विकास के लिए सहायता एवं रियायतों से सम्बन्धित कतिपय कार्यक्रमों की घोषणा की। उन्होंने उनकी तेल सम्बन्धी आवश्यकताओं के कारण उनका बढ़ता खर्च सन्तुलित करने के लिए खाद्यान्नों का भाव स्थिर रखने में उनकी सहायता करने हेतु एक विशेष कोष की स्थापना की। 

ब्रांट आयोग (1977)- Brandt Commission (1977)-

अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग की दिशा में प्रयास के लिए 1975-77 के बीच आयोजित पेरिस सम्मेलन की विफलता के बाद विश्व बैंक में तत्कालीन अध्यक्ष राबर्ट मैकनामारा के इस प्रस्ताव के आधार पर कि अन्तर्राष्ट्रीय विकास की समस्याओं के समाधान के लिए एक गैर सरकारी आयोग की स्थापना की जाय, दिसम्बर 1977 में जर्मनी के पूर्व चांसलर बिली ब्रांट की अध्यक्षता में इस प्रकार के आयोग का गठन हुआ। उस आयोग में विश्व के सभी भागों के विकसित और विकासशील देशों के प्रतिनिधि सदस्य थे। भारत के प्रतिनिधित्व प्रसिद्ध भारतीय अर्थशास्त्री डॉ० एल.के. झा ने किया। उसकी पहली बैठक दिसम्बर, 1977 में जर्मनी की राजधानी बोन में हुई जिसमें सामाजिक विकास की समस्याओं के बारे में दो प्रतिवेदन स्वीकृत किये गये। पहला प्रतिवेदन ‘उत्तर-दक्षिण के अस्तित्त्व के लिए कार्यक्रम’ (North-South A Programme for Survival) तथा दूसरा ‘सामान्य संकट’ (Common Crisis) से सम्बन्धित था।

उक्त आयोग ने उत्तर-दक्षिण संवाद अर्थात् विकसित और विकासशील देशों के बीच अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग पर विचार-विमर्श को बढ़ावा देने के लिए वस्तु व्यापार, विकासशील देशों को विदेशी ऋण देने, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा सुधार, तकनीकी हस्तान्तरण, बहुराष्ट्रीय निगमों, समुद्री कानून तथा बहु-उद्देशीय व्यापार के बारे में सात सुझाव दिये।

कानकुन सम्मेलन (1981) –  Cancun Conference (1981) 

समृद्ध विकसित तथा पिछड़े एवं गरीब विकासशील देशों अर्थात् उत्तर एवं दक्षिण के बीच संवाद के रास्ते में आने वाले व्यवधान दूर कर उसके लिए उचित वातावरण तैयार करने हेतु मैक्सिको के राष्ट्रपति की पहल पर उनके देश के कानकुन नगर में अक्टूबर 1981 में भारत सहित 22 देशों का एक लघु शिखर सम्मेलन हुआ जिसमें विकासशील राष्ट्रों ने अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक को बदलती परिस्थितियों के अनुरूप दायित्त्व निर्वहन के योग्य बनाने  के निमित्त उनके ढाँचे में व्यापक परिवर्तन करने की जोरदार माँग की।

उरुग्वे वार्ता 1986 – 1983 Uruguay talks 1986 – 1983

इसके तत्वाधान में सितम्बर, 1986 में दक्षिण अमेरिकी देश उरुग्वे के ‘पुन्ताडेल इस्ते’ नगर में विकसित और विकासशील देशों का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में अपेक्षित सुधार करने के लिए आठवीं सम्मेलन हुआ जिसमें एक सौ देशों ने भाग लिया। उसे विचार-विमर्श कर दिसम्बर 1990 तक अपनी रिपोर्ट दे देने के लिए चार वर्ष का समय दिया गया। इस अवधि में वह उसे प्रस्तुत नहीं कर सका तथा उसने विचार-विमर्श करने और अपनी रिपोर्ट देने के लिए 3 वर्ष का और समय लिया। 

कुल सात वर्ष की अवधि में ‘गेट’ देशों की हुई सात बैठकों के बावजूद अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार सम्बन्धी कतिपय व्यवस्थाओं के बारे में आम सहमति की स्थिति नहीं पैदा ही सकी।

गैट समझौते के अन्तर्गत मूलतः उद्योगों में निर्मित वस्तुओं के व्यापार के बारे में ही नियम बनाने की व्यवस्था है। उसमें कृषिजन्य वस्तुओं के व्यापार के सम्बन्ध में नियम बनाने का प्रावधान नहीं है। उरुग्वे सम्मेलन में मूलभूत व्यवस्था के क्षेत्र का विस्तार कर उसमें इन चार नयी बातों पर विचार-विमर्श का भी समावेश किया गया (1) व्यापार सम्बन्धी निवेश उपाय (2) बौद्धिक सम्पत्ति सम्बन्धी व्यापार, (3) सेवाओं के क्षेत्र में व्यापार, (4) कृषि विकासशील देश परम्परागत क्षेत्र के विस्तार के पक्षधर नहीं थे। विकसित देशों ने अपने वर्चस्व और प्रभाव का प्रयोग कर उसमें नये आयाम जोड़वा दिये।

पृथ्वी सम्मेलन (1992) Earth Summit (1992)

विश्व पर्यावरण की समस्या पर विकसित और विकासशील देशों के बीच विचार-विमर्श के लिए ब्राजील की राजधानी ‘रियो द जेनेरो’ में 3 से 14 जून 1992 तक ‘पृथ्वी शिखर सम्मेलन’ हुआ जिसमें दोनों ही पक्षों के राष्ट्रों ने एक दूसरे पर पर्यावरण दूषित करने का दोषारोपण किया। विकसित देशों ने आरोप किया कि अपनी गरीबी और जनसंख्या की समस्या के कारण विकासशील देश अपने वनों की कटाई कर विश्व पर्यावरण को दूषित कर रहे हैं। विकासशील देशों ने दोषारोपण किया कि विकसित देश अपने असीमित अपव्यय के लिए ऊर्जा स्रोतों का अतिदोहन कर पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं।

इस सम्मेलन में कार्बन डाई आक्साइड और मिथेन जैसी गैसों के उत्सर्जन, वनों की कटाई पर प्रतिबन्ध, जनसंख्या विस्फोट और संसाधनों के उपयोग के अनुपात तकनीकी हस्तान्तरण एवं तकनीकी विकास के उपयोग, पर्यावरण में सुधार पर धन व्यय करने और उसके लिए नयी संस्था बनाने तथा पर्यावरण प्रदूषण के लिए दोषी पक्ष जैसी बातों पर दोनों पक्षों ने विरोधाभासी विचार प्रकट किये। विश्व पर्यावरण प्रदूषण के लिए उन्होंने एक दूसरे को उत्तरदायी ठहराया।

अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन (1993)- International Human Rights Convention (1993)-

विकसित देशों ने मानवाधिकार उल्लंघन के नाम पर विकासशील देशों के आन्तरिक मामलों में अप्रत्यक्षतः हस्तक्षेप तथा उनकी आर्थिक एवं राजनीतिक सम्प्रभुता पर छिपा प्रहार करने के षड्यंत्रयुक्त उद्देश्य के साथ संयुक्त राष्ट्रसंघ के तत्वाधान में अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार सम्मेलन के आयोजन का प्रयास किया। वह जून, 1993 में आस्ट्रिया की राजधानी वियना में आयोजित हुआ। उसमें विकसित राष्ट्रों, विशेषतः अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोपीय देशों ने विश्व में मानवाधिकार के उल्लंघन से सम्बन्धित घटनाओं की जाँच के • लिए मानवाधिकार आयुक्त नियुक्त करने का प्रस्ताव किया जिसका विकासशील राष्ट्रों ने यह कहकर जोरदार विरोध किया कि इस प्रकार का कार्य उनके आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप होगा।

मूल्यांकन- Evaluation-

उत्तर और दक्षिण के मध्य विभिन्न सम्मेलनों के रूप में जो संवाद हुए, वे नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करने में सफल नहीं रहे क्योंकि विकसित राष्ट्र विकासशील देशों के शोषण करने की अपनी षड्यंत्रकारी नीयत से अपने आप को मुक्त नहीं कर पाये। वे आर्थिक सहायता की लालच तथा विकासशील राष्ट्रों के बीच फूट को बढ़ावा देकर उनका शोषण जारी रखना चाहते हैं। जब तक उनकी इस प्रवृत्ति एवं नीयत का अन्त नहीं होगा तब तक विश्व के सभी देशों को खुशहाल बनाने वाली नयी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना नहीं हो पायेगी।

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