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अम्बेडकर के राजनीतिक एवं  सामाजिक विचार |

  

अम्बेडकर के सामाजिक विचार एक सामाजिक विचारक और समाज व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन का समर्थन करने वाले विचारक डॉ० अम्बेडकर थे। उनका सामाजिक विचार दलितोद्धार एवं सामाजिक समानता पर आधारित था। डॉ० अम्बेडकर दलितों के मसीहा थे वे अपने राजनीतिक जीवन के प्रारंभ से लेकर अपने जीवन के अन्तिम समय तक सामाजिक न्याय एवं दलितोद्धार के लिए संघर्ष करते रहे। उन्हें जाति-पाँत, ऊँच-नीच के भेदभाव से घृणा थी। उनके सामाजिक विचारों को अग्रलिखित बिन्दुओं के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है-

परिचय

Dr. BR Ambedkar का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश में हिन्धू महार जाती में हुआ था | उस समय उच नीच जाती का बहुत ही चरम सीमा पेर भेद भाव था | अम्बेडकर भी एक नीच जाती के थे तो इनके साथ भी बहुत ही भेद भाव हुआ क्योकि उच्च जाती वाले इनकी जाती को अछूत जाती का समझते थे |
अपने संघर्षो की बदौलत अम्बेडकर एक प्रसिद्ध राजनितिक नेता, दार्शनिक , लेखक , अर्थशास्त्री ,न्यायवादी , बहु- भाषाविद , धर्म दर्शन के विद्वान् और एक समाज सुधारक थे , जिन्होंने भारत में अस्पर्श्यता और सामजिक असमानता के उन्मूलन के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया |

 भीमराव अंबेडकर ने समाज के लिए क्या किया जाने –

1. जाति प्रथा और हिन्दू सामाज के परम्परागत विधान पर कठोर प्रहार – 

डॉ० अम्बेडकर से पूर्व जितने भी दलितोद्धारक हुए उनमें अधिकांश वर्णव्यवस्था या जाति-व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं, वे तो केवल उच्च जातियों के जातीय अहंकार और विभिन्न जातियों के बीच ऊँच-नीच की भावना का विरोध करते हैं। जिन व्यक्तियों और सम्प्रदायों द्वारा जाति- व्यवस्था का विरोध किया गया है, उनका विरोध भी एक नरम विरोध मात्र है, उस विरोध में कोई आक्रोश नहीं है। डॉ० अम्बेडकर ने इस बात पर बल दिया कि चार वर्णों पर आधारित सामाजिक ढाँचे की हिन्दू योजना ने ही जाति-व्यवस्था और अस्पृश्यता को जन्म दिया है, जो असमानता का एक अमानवीय और चरम रूप है। अतः अस्पृश्यों की समस्याएँ किसी छोटे- मोटे उपचार से हल नहीं हो सकती, उनके लिए तो क्रान्तिकारी सामाजिक हल की आवश्यकता है और वह क्रान्तिकारी सामाजिक हल जाति-व्यवस्था को सम्पूर्ण रूप में अस्वीकार करना ही हो सकता है।

डॉ० अम्बेडकर के अनुसार प्रारम्भ में जाति प्रथा नहीं थी। समाज के कुछ स्वार्थी लोगों ने, जो ऊँचे स्तर के थे, कमजोर लोगों से उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती काम कराना प्रारम्भ कर दिया। इन कमजोर लोगों को शिक्षा प्राप्त करने, व्यापार करने, धन इकट्ठा करने और हथियार रखने से वंचित कर दिया, जिससे वे विरोध न कर सकें और अपनी दासता दूर न कर सकें। इस प्रकार जातिवाद को अपनाकर शूद्रों को अपंग कर दिया गया।

हिन्दूओं की परम्परागत व्यवस्था ‘मनुस्मृति के आधार पर चलती है। अतः डॉ० अम्बेडकर ‘मनुस्मृति’ को अन्याय की जड़ मानते थे। डॉ० अम्बेडकर के नेतृत्व में अनेक बार ‘मनुस्मृति’ को जलाने का जो कार्य किया गया, उसके औचित्य को समझ पाना कठिन है, लेकिन तथ्य यह है कि उनका यह कार्य हिन्दूओं की परम्परागत व्यवस्था के विरुद्ध गहरे आक्रोश का परिचायक है। डॉ० अम्बेडकर कहा करते थे कि ‘मनुस्मृति’ ने अछूतों का सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक तथा राजनीतिक शोषण करके उन्हें दासता दी है।

2. छुआछूत के खिलाफ लड़ी लड़ाई

डॉ० अम्बेडकर जानते थे कि अछूतों की वर्तमान स्थिति के लिए स्वयं अछूत वर्ग भी उत्तरदायी है। अतः उन्होंने इस बात पर बल दिया कि अछूतों द्वारा अपनी बुरी आदतों और हीनता की भावना का त्याग कर आत्मसम्मानपूर्ण जीवन की ओर प्रवृत्ति होना चाहिए। उन्होंने अनेक पत्रों में लेख लिखकर और अपने भाषणों में इस बात पर बल दिया कि अछूतों को माँगना छोड़ देना चाहिए, झूठ बोलना बंद कर देना चाहिए, मुर्दा जानवर खाना छोड़ देना चाहिए तथा इन सबके अतिरिक्त हीनता की भावना का त्याग कर श्रेष्ठ जीवन की ओर प्रवृत्त होना चाहिए। अछूतों में स्वतन्त्रता, समानता और स्वाभिमान से जीवन बिताने की इच्छा होनी चाहिए और इसके लिए उनके सुझाव थे- 

(1) अछूत संगठित हो,  (2) शिक्षित हो, और  (3) अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करें। उन्होंने अछूतों को सरकारी नौकरियों में जाने, जंगल तथा खेती की भूमि प्राप्त करने की शिक्षा दी।

डॉ० अम्बेडकर जानते थे कि दलितों की स्थिति में सुधार के लिए दलित स्त्रियाँ अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। 20 मार्च, 1927 को महद में आई हुई स्त्रियों को सम्बोधित करते हुए डॉ० अम्बेडकर ने कहा- “कभी मत सोचो कि तुम अछूत हो। साफ-सुथरे हो। जिन तरह के कपड़े सवर्ण स्त्रियाँ पहनती हैं, तुम भी पहनो। यह देखों कि वे साफ हैं।” उन्होंने कहा, “यदि तुम्हारे पति और लड़के शराब पीते हैं तो उन्हें खाना मत दो। अपने बच्चों को स्कूल भेजो। शिक्षा जितनी जरूरी पुरुषों के लिए है, उतनी ही स्त्रियों के लिए भी आवश्यक है। यदि तुम लिखना पढ़ना जान जाओ तो बहुत उन्नति होगी, जैसी तुम होंगी, वैसे ही तुम्हारे बच्चे बनेंगे। अच्छे कार्यों की ओर अपना जीवन मोड़ दो। तुम्हारे बच्चे इस संसार में चमकते हुए होंगे।”

3. अछूतों को सभी सार्वजनिक स्थानों के प्रयोग का अधिकार-

डॉ० अम्बेडकर ने इस बात पर बल दिया कि मन्दिर, कुएँ और तालाब आदि मनुष्य मात्र के लिए सुलभ होने चाहिए। अछूतों को इनका उपयोग न करने देना अनुचित है। उन्होंने अपने साथियों से सामाजिक कुएँ व तालाबों का उपयोग जबरदस्ती करने का आग्रह किया। आवश्यक हो जाने पर उन्होंने इसके लिए सत्याग्रह भी किया।

डॉ० अम्बेडकर ने हिन्दुओं के व्यवहार में परिवर्तन लाने पर बल दिया और कहा कि यह सत्याग्रह हिन्दुओं का हृदय परिवर्तन करने के लिए है। ‘मन्दिर प्रवेश’ से सम्बन्धित विधेयक पर बोलते हुए उन्होंने ‘केन्द्रीय सभा’ में कहा था- “धर्म, जो अपने को मानने वालों के बीच में पक्षपात करता है, धर्म नहीं है। किसी भी गलत बात को धर्म के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता। धर्म व दासता का कोई स्थ नहीं है।” उन्होंने महार वेतन कानून का विरोध भी किया, जो महाराष्ट्र के महारों के लिए ‘बन्धुआ मजदूरी और दासता’ की व्यवस्था करता था। डॉ० अम्बेडकर ने समता सैनिक दल की स्थापना की।

4. दलितों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व- 

डॉ० अम्बेडकर ने सदैव इस बात पर बल दिया। ब्रिटिश शासन द्वारा प्रारम्भ किये गये साम्प्रदायिक प्रतिनिधित्व के अन्तर्गत जिस प्रकार कि मुसलमानों, ईसाइयों और पंजाब के सिक्खों को पृथक् प्रतिनिधित्व की स्थिति प्राप्त है, उसी प्रकार दलितों को भी ऐसा ही पृथक् प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए, जिसमें दलितों के प्रतिनिधि केवल दलितों द्वारा ही चुने जायें। पहले और दूसरे गोलमेज सम्मेलन में उन्होंने दलितों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व पर ही सबसे अधिक बल दिया था और महात्मा गाँधी के साथ उनका विरोध सबसे अधिक प्रमुख रूप से इसी बात पर था। महात्मा गाँधी का कहना था कि ‘दलित वर्ग’ हिन्दू समाज का एक अविभाज्य अंग है और ऐसी किसी भी स्थिति को स्वीकार नहीं किया जा सकता जिससे हिन्दू समाज का विघटन हो। डॉ० अम्बेडकर दलितों के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व के आधार पर एक बड़ी राजनीतिक शक्ति का रूप देना चाहते थे और उन्होंने सन् 1932 के ‘पूना समझौते पर हस्ताक्षर परिस्थितियों के दबाव के कारण ही किये थे।

5. दलितों की स्थिति में सुधार के कानूनी उपाय-

डॉ० अम्बेडकर का विचार था कि ‘मनुस्मृति’ के आधार पर भारत के अछूतों पर जो कानूनी पाबन्दियाँ लगी हुई है, वे कानून से ही दूर की जा सकती हैं। पुरानी स्मृतियाँ उस समय का कानून थीं। जिसे समाज और राज्य के द्वारा लागू किया गया, अब उनके प्रभाव को राज्य के कानून द्वारा ही दूर किया जाना चाहिए। प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था को अपनाने के नाते भारत के सभी नागरिकों को कानून की दृष्टि से समानता का अधिकार तो स्वाभाविक रूप से प्राप्त होता ही है, अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक समानता की व्यवस्था और अनुच्छेद 17 में अस्पृश्यता को कानून की दृष्टि में अपराध घोषित करने की जो व्यवस्था की गई है और संविधान में ही अनुसूचित जातियों तथा जन-जातियों के लिए आरक्षण की जो व्यवस्था की गयी है, उसमें डॉ० अम्बेडकर का प्रभाव भी एक तत्व रहा होगा। डॉ० अम्बेडकर 1930 से ही इस बात पर जोर देते रहे कि दलित वर्ग के सदस्यों को विकास के लिए विशेष सुविधाएँ दी जानी चाहिए। ‘सन् 1930 में स्टारटे कमेटी’ के एक सदस्य के रूप में भी उन्होंने निम्न सिफारिशें की थीं- 

(i) दलित छात्रों के वजीफों की संख्या बढ़ायी जाय। (ii) उनके लिए छात्रावासों की व्यवस्था की जाय। (iii) उन्हें कारखानों, रेलों की कार्यशालाओं तथा अन्य ट्रेनिंग के लिए वजीफे दिये जायें। (iv) विदेश में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए वजीफा दिया जाय। (v) इन सभी कार्यों की देखभाल के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया जाय।

6. धर्म परिवर्तन- 

डॉ० अम्बेडकर दलितों के लिए सम्मानपूर्ण जीवन चाहते थे और जब उन्होंने समझा कि दलित जब तक हिन्दू हैं, तब तक उनके लिए सम्मानपूर्ण जीवन बिता पाना सम्भव नहीं है, तब उन्होंने दलितों के धर्म परिवर्तन की बात सोची। बौद्ध धर्म में उन्होंने समानता का सनेदश पाया और सन् 1956 में 5 लाख व्यक्तियों के साथ उन्होंने बौद्ध धर्म को अपना लिया। इस धर्म परिवर्तन का उद्देश्य दलित वर्ग को अपनी एक अलग पहचान और एक सम्मानपूर्ण स्थिति प्रदान करना ही था।

डॉ० अम्बेडकर दलित समाज के लिए संघर्ष करने वाले अदभुत योद्धा थे। बीसवीं शताब्दी में भारत के दलित वर्ग के लिए उन्होंने जो कुछ किया, उसका अन्य कोई उदाहरण नहीं है। इसी आधार पर उन्हें दलितों का मसीहा कहा जाता है। डॉ० वी० पी० वर्मा ने अम्बेडकर के व्यक्तित्व और कार्यों की तुलना अमरीका के महान् नीमो नेता पाल राबसन से की है, जिसने अमरीका के श्वेत बहुमत के विरुद्ध समस्त नीमो जाति के आक्रोश को व्यक्त किया।

डॉ० अम्बेडकर के रानीतिक विचार Indian Political Thinker BR Ambedkar 

डॉ. अम्बेडकर के प्रमुख राजनैतिक विचारों का विवेचन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया गया है-

1. भाषायी राज्यों के सम्बन्ध में डॉ० अम्बेडकर के विचार-

डॉ० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक Thoughts on Linguistic State’ (1955) में भाषायी राज्यों के सम्बन्ध में अपने विचारों को स्पष्ट करते हुए कहा है-“भाषायी प्रांतों के निर्माण से लोकतन्त्र अधिक अच्छी प्रकार से क्रियान्वित होता है। एक भाषायी प्रान्त में मिश्रित प्रान्त की तुलना में सामाजिक एकजुटता अधिक अच्छी प्रकार बनी रहती है। भाषायी प्रांतो के निर्माण से तो खतरा नहीं है किन्तु खतरा इस बात से अवश्य है कि प्रत्येक प्रान्त की एक ही भाषा को सरकारी काम-काज की भाषा बना दिया जाये।”

उनके अनुसार यदि क्षेत्रीय भाषाओं को राज्य भाषा बना दिया गया तो प्रत्येक प्रान्त में ऐसी संकुचित संस्कृति का विकास होगा जिसकी परिणति अन्ततोगत्वा भारत की एकता को खण्डित करने में होगी।

 उन्होंने भाषायी राज्य के समर्थन में दो तर्क दिए। पहला, इससे लोकतन्त्र का क्रियान्वयन आसान होगा और दूसरा, इससे जातीय और सांस्कृतिक तनावों को दूर किया जा सकेगा। उनके अनुसार प्रादेशिक भाषा के स्थान पर हिन्दी को सरकारी काम-काज की भाषा बनाया जाना चाहिए और जब तक हिन्दी का समुचित विकास नहीं होता तब तक अंग्रेजी को कार्य करने दिया जाय।

2. लोकतन्त्र सम्बन्धी विचार- 

अम्बेडकर के अनुसार, “लोकतन्त्र शासन का ऐसा रूप तथा पद्धति है जिसमें बिना रक्त बहाए क्रान्तिकारी, सामाजिक और आर्तिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है।” वे लोकतन्त्र की संसदीय पद्धति के समर्थक व प्रशंसक थे।

लेकिन उनका कहना था कि बिना सामाजिक तथा आर्थिक लोकतन्त्र के राजनीतिक लोकतन्त्र सफल नहीं हो सकता। संसदीय लोकतन्त्र की सहायता के लिए वे सामाजिक तथा आर्थिक समानता, सुदृढ़ विपक्षी दल, स्थायी सिविल सेवा तथा संवैधानिक नैतिकता को आवश्यक शर्त मानते थे। 

3. राज्य सम्बन्धी विचार 

अम्बेडकर राज्य को समाज सेवा का एक साधन मानते थे। यद्यपि वे जानते थे कि राज्य सभी महत्त्वपूर्ण कार्यों का संपादन करता है यहाँ तक कि सामाजिक आर्थिक परिवर्तन कर नीतन व्यवस्था की स्थापना का कार्य भी राज्य ही करता है तथापि वह सर्वशक्तिमान और निरंकुश नहीं है, बल्कि समाज सेवा का एक साधन है। 

4. अधिकार सम्बन्धी विचार-

अम्बेडकर व्यक्ति के कुछ अधिकारों के पीछे संवैधानिक उपचारों का प्रावधान आवश्यक मानते थे। इसके साथ ही साथ वे अधिकारों के पीछे सामाजिक और नैतिक स्वीकृति भी आवश्यक माते थे। उनके शब्दों में-“यदि मौलिक अधिकारों का समुदाय द्वारा विरोध होता है तो कोई भी कानून, न्यायालय और संसद उनकी रक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि कानून व्यक्तियों की भावनाओं की प्रतिच्छाया होता है।”

5. राजनीतिक स्वतन्त्रता और राष्ट्रीय एकीकरण सम्बन्धी विचार- 

डॉ० अम्बेडकर प्रारम्भ से ही देश और राजनीतिक स्वतन्त्रता के समर्थक थे। अपने शोध प्रबन्ध “The Evolution of Provincial Finance in the British India” में उन्होंने दो सिद्धान्त प्रतिपादित किए थे-

 (i) प्रत्येक देश में सामाजिक शोषण तथा अन्याय व्याप्त है, तथा

(ii) इसका अर्थ यह नहीं कि उस देश को राजनीतिक शक्ति प्राप्त न हो।

यद्यपि उनका काँग्रेस व गाँधीजी की पद्धतियों से विरोध था, लेकिन वे स्वतन्त्रता के विरोधी नहीं थे। कुछ विद्वानों ने उनके 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के विरुद्ध प्रचार करने पर उनके राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के प्रति दृष्टिकोण पर आपत्ति की थी, लेकिन उनका यह विरोध, वास्तव में देश की स्वतन्त्रता के लिए अपनायी जाने वाली रणनीति और व्यूह-रचना के मतभेद से सम्बन्धित था।

डॉ० अम्बेडकर उतने ही राष्ट्र-भक्त थे जितने कि नेहरू आदि। और देश के विभाजन के सम्बन्ध में उनका विचार भी वही था जिसे कुछ महीनों बाद नेहरू और रपटेल ने अपनाया था। यह विचार था – “यदि भारत की राजनीतिक समस्या का अन्य कोई विकल्प नहीं है, तो हमें पाकिस्तान स्वीकार करना ही होगा।” प्रारम्भ में वे देश के विभाजन के विरोधी थे, लेकिन बाद में उन्होंने इसको स्वीकृति दे दी। डॉ० अम्बेडकर ने इस सम्बन्ध में यह भी प्रस्ताव किया था कि भारत के सभी मुसलमान पाकिस्तान तथा पाकिस्तान के सभी हिन्दू भारत स्थानान्तरित हो जायें, जिससे कोई झगड़ा और खून खराबा न हो, लेकिन उनकी इस बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।

सन् 1947 में उन्होंने देशी रियासतों को परामर्श देते हुए कहा था कि “रियासतों को अपनी प्रभुसत्ता भारतीय संघ में मिला देनी चाहिए।” इस प्रकार स्पष्ट है कि डॉ० अम्बेडकर देशभक्त थे। तथा वे राष्ट्रीय एकीकरण के पक्षधर थे।

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